उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
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बशीर बद्र साहब के इंतकाल के बाद सोशल मीडिया पर जिस शिद्दत से उन्हें याद किया गया और श्रद्धांजलि दी गई; उनके शेर कोट किए गए, इसके वे हकदार भी थे, बल्कि कहें तो इससे ज्यादा के हकदार थे.
कम से कम तीन पीढ़ियों को जिस शख्स के शेरों ने इज़हार ए मोहब्बत का शऊर दिया, मोहब्बत और ज़िंदगी के मानी समझाए, जिनके अनगिनत शेर मुहावरों में ढल गए, उन्हें जितना भी याद करें कम है.
लेकिन इसी सोशल मीडिया पर उनके जनाजे में सिर्फ 20 लोगों के शामिल होने की खबर भी चली. हालांकि बाद में पता चल गया कि ये झूठ है, लेकिन इस बहाने शायरों, अदीबों और साहित्यकारों की समाज में हैसियत और सम्मान को लेकर भी खूब चर्चा चली.
यहां यह भी कि बशीर बद्र साहब के स्टैंड और उनकी राजनैतिक वैचारिक-पक्षधरता को लेकर भी सोशल मीडिया दो खेमों में बंटा दिखाई दिया.
इसमें कौन सही और कौन गलत है, मैं इसमें नहीं जाना चाहता और अब जब बशीर बद्र साहब हमारे बीच नहीं हैं तो जाने की जरूरत भी नहीं है. मेरे लिए तो उनकी शायरी मायने रखती है और शायद उनपर उठने वाले सवालों का जवाब भी.
उनकी एक ही ग़ज़ल के दो शेरों में कई सारे सवालों के जवाब हैं भी-
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती
कौन साँप रखता है उस के आशियाने में
हिंदुस्तान और हिंदुस्तान के बाहर कई सारे मुशायरों में उन्होंने यह ग़ज़ल पढ़ी और उन्हें खूब दाद भी मिली. ऐसे ही एक मुशायरे का ये ऑडियो है.
सुनिए, गुनिए और समझिए बशीर बद्र साहब को
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