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मैं सनातन हूँ
🌸 श्रीमद्भागवत की पावन कथा — भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा 🌸
📖 शास्त्र प्रमाण:
श्रीमद्भागवत महापुराण — दशम स्कन्ध, अध्याय 80–81
भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र सुदामा एक विद्वान, जितेन्द्रिय और संतोषी ब्राह्मण थे। वे अत्यंत निर्धन थे। उनके वस्त्र पुराने और फटे हुए थे तथा उनकी पत्नी भी अभाव में जीवन व्यतीत करती थीं।
एक दिन सुदामा जी की पत्नी ने उनसे कहा—
“स्वामी! साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण आपके मित्र हैं। वे ब्राह्मणों के भक्त और शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं। आप उनके पास जाइए। वे आपकी निर्धनता देखकर अवश्य सहायता करेंगे।”
पत्नी के आग्रह पर सुदामा जी द्वारका जाने के लिए तैयार हुए। उन्होंने पूछा—
“मैं अपने मित्र के लिए भेंट में क्या लेकर जाऊँ?”
तब उनकी पत्नी पड़ोस के ब्राह्मणों से चार मुट्ठी चिउड़े माँगकर लाईं और उन्हें एक पुराने वस्त्र में बाँधकर सुदामा जी को दे दिया।
जब सुदामा जी द्वारका पहुँचे और भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आते देखा, तब भगवान अपने पलंग से तुरंत उठ खड़े हुए। वे आगे बढ़कर सुदामा जी से प्रेमपूर्वक मिले और उन्हें अपनी भुजाओं में भर लिया।
अपने प्रिय मित्र को देखकर भगवान श्रीकृष्ण के नेत्रों से प्रेम के आँसू बहने लगे। उन्होंने सुदामा जी को अपने आसन पर बैठाया, स्वयं उनके चरण धोए और बड़े आदर से उनकी सेवा की।
भगवान ने सुदामा जी से पूछा—
“मित्र! तुम मेरे लिए घर से क्या भेंट लाए हो?”
सुदामा जी अपने थोड़े-से चिउड़ों को देने में संकोच कर रहे थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं उनकी पोटली ले ली और प्रेम से कहा—
“मेरे भक्त यदि प्रेमपूर्वक थोड़ा-सा भी अर्पित करते हैं, तो वह मेरे लिए बहुत हो जाता है।”
भगवान ने आनंदपूर्वक एक मुट्ठी चिउड़े खाए। जब वे दूसरी मुट्ठी लेने लगे, तब देवी रुक्मिणी ने उनका हाथ रोक लिया।
सुदामा जी ने भगवान से अपनी निर्धनता दूर करने के लिए कुछ भी नहीं माँगा। अगले दिन वे भगवान से विदा लेकर अपने घर लौट गए।
मार्ग में वे भगवान के प्रेम और अपने सौभाग्य का चिंतन करते रहे।
जब वे अपने घर पहुँचे, तो वहाँ अपनी टूटी हुई झोपड़ी के स्थान पर सुंदर महल देखकर आश्चर्यचकित रह गए। उनकी पत्नी दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित थीं।
तब सुदामा जी समझ गए कि यह सब भगवान श्रीकृष्ण की कृपा है। भगवान ने बिना माँगे ही अपने भक्त के मन का दुःख जान लिया और उनकी दरिद्रता दूर कर दी।
🌼 इस कथा का संदेश 🌼
भगवान को हमारी धन-दौलत या बहुमूल्य वस्तुओं की आवश्यकता नहीं है। वे भक्त के द्वारा प्रेम और श्रद्धा से अर्पित की गई छोटी-सी भेंट को भी सहर्ष स्वीकार करते हैं।
जो बिना माँगे अपने भक्त के हृदय की पीड़ा समझ लें और उस पर कृपा करें—वही भगवान हैं।
🙏 जय श्रीकृष्ण 🙏
📖 संदर्भ:
श्रीमद्भागवत महापुराण
दशम स्कन्ध — अध्याय 80 एवं 81
श्रीकृष्ण–सुदामा मिलन प्रसंग
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2 days ago | [YT] | 1
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मैं सनातन हूँ
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3 days ago | [YT] | 1
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मैं सनातन हूँ
भागवत महापुराण में अनेक सुंदर और भक्तिपूर्ण कथाएँ हैं। आज मैं आपको “भगवान श्रीकृष्ण और फल बेचने वाली” की छोटी-सी, भावपूर्ण कथा देता हूँ। यह कथा भक्ति में प्रेम और समर्पण का बहुत सुंदर संदेश देती है।
🍎 भगवान श्रीकृष्ण और फल बेचने वाली
एक दिन बालक श्रीकृष्ण नंद भवन के आँगन में खेल रहे थे। तभी बाहर से एक फल बेचने वाली की आवाज आई—
“फल ले लो… मीठे-मीठे फल ले लो…”
छोटे कन्हैया ने उसकी आवाज सुनी तो उनके मन में फल लेने की इच्छा हुई। उन्होंने देखा कि घर के बड़े लोग अनाज देकर वस्तुएँ लेते हैं। इसलिए वे अपनी छोटी-छोटी हथेलियों में अनाज के कुछ दाने भरकर फल वाली की ओर दौड़ पड़े।
लेकिन बालकृष्ण की नन्ही उँगलियों के बीच से अधिकतर अनाज रास्ते में ही गिर गया। जब वे फल वाली के पास पहुँचे, तब उनकी हथेली में केवल कुछ दाने ही बचे थे।
भगवान ने भोलेपन से अपनी छोटी-सी हथेली आगे कर दी और कहा—
“मुझे फल दे दो।”
फल बेचने वाली ने बालकृष्ण के सुंदर मुख और उनकी निष्कपट मुस्कान को देखा। उसका हृदय प्रेम से भर गया। उसने यह नहीं सोचा कि अनाज बहुत कम है। उसने प्रेमपूर्वक कन्हैया की दोनों हथेलियाँ फलों से भर दीं।
बालकृष्ण प्रसन्न होकर फल लेकर घर चले गए।
जब फल वाली अपनी टोकरी लेकर आगे बढ़ने लगी, तो उसने अनुभव किया कि उसकी टोकरी अचानक बहुत भारी हो गई है। उसने टोकरी नीचे रखकर देखा तो आश्चर्यचकित रह गई—
उसकी पूरी टोकरी बहुमूल्य रत्नों और मणियों से भर चुकी थी।
जिसने भगवान को थोड़े-से फल प्रेम से दिए थे, भगवान ने उसकी झोली अनमोल धन से भर दी।
परंतु उसका सबसे बड़ा धन वे रत्न नहीं थे। उसका सबसे बड़ा सौभाग्य यह था कि उसने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन किए और प्रेमपूर्वक उनकी सेवा की।
🌸 कथा का संदेश
भगवान यह नहीं देखते कि हमने उन्हें कितना दिया है; वे देखते हैं कि हमने उन्हें किस भाव से दिया है।
जब मनुष्य बिना किसी स्वार्थ के प्रेम और श्रद्धा से भगवान को कुछ अर्पित करता है, तो भगवान उसके छोटे-से समर्पण को भी अनंत कृपा में बदल देते हैं।
भगवान को वस्तु का मूल्य नहीं, भक्त का भाव प्रिय होता है।
यह सुंदर प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कंध, अध्याय 11 में वर्णित है।
3 days ago | [YT] | 2
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मैं सनातन हूँ
I just hyped this amazing creator @SwamiRupeshwaranand
2 months ago | [YT] | 0
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