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3 जुलाई 2026, शुक्रवार – कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी
3 जुलाई 2026 को आषाढ़ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी है, जिसे कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन सूर्योदय से चंद्रदर्शन तक व्रत रखा जाता है और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है।
पौराणिक कथा प्राचीन समय में राजा महीजित नामक एक धर्मात्मा राजा थे। उनके राज्य में सुख-समृद्धि थी, लेकिन उन्हें संतान प्राप्त नहीं थी। दुःखी होकर उन्होंने ऋषियों से उपाय पूछा। ऋषियों ने ध्यान लगाकर बताया कि पूर्व जन्म में राजा से एक अनजाने में ऐसा कर्म हुआ था, जिसके कारण उन्हें संतान-सुख नहीं मिल रहा था। उन्होंने राजा को संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर भगवान गणेश की आराधना करने का उपदेश दिया। राजा और उनकी रानी ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया। भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उन्हें योग्य पुत्र का वरदान मिला। तभी से संकष्टी चतुर्थी को सभी संकटों का नाश करने वाला व्रत माना जाता है।
कृष्णपिङ्गल गणपति का महत्व इस संकष्टी पर भगवान गणेश के कृष्णपिङ्गल स्वरूप की पूजा की जाती है। यह स्वरूप नकारात्मकता, भय और विघ्नों का नाश करने वाला माना जाता है। भक्त मानते हैं कि इस दिन की उपासना से जीवन के संकट दूर होते हैं और बुद्धि, सफलता तथा मानसिक शांति प्राप्त होती है।
पूजा-विधि प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें। भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। दूर्वा, लाल पुष्प, मोदक और लड्डू अर्पित करें। "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र का जप करें। गणेश अथर्वशीर्ष या संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें। रात्रि में चंद्रदर्शन के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।
दान इस दिन मोदक, गुड़, तिल, फल, अन्न और वस्त्र का दान शुभ माना जाता है। आध्यात्मिक संदेश संकष्टी चतुर्थी हमें सिखाती है कि श्रद्धा, संयम और भगवान गणेश की भक्ति से जीवन के बड़े से बड़े विघ्न भी दूर हो सकते हैं। यह दिन नए कार्यों में सफलता, बुद्धि और शुभारंभ का आशीर्वाद प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। 🙏🐘
King Janak Part 2 | राजा जनक की महिमा | सीता स्वयंवर सभा में क्या हुआ महर्षि विश्वामित्र का मिथिला में आगमन, राजमहल में सीता स्वयंवर सभा की शुरुआत से लक्ष्मणजी की क्रोधी वाणी तक जहाँ राजा जनक पुरे धैर्य के साथ लक्ष्मण जी को देख रहें हैं।
चंद्रवंशी पुरुरवा के बाद जो वंश आगे बढ़ा वह पुरुवंशी कहलाये। आगे चलकर इसी वंश से कुरुवंश, वृष्णिवंश और यदुवंश निकले।
पुरुरवा और उर्वशी की कथा का वर्णन करते हुए शताब्दियों बाद पाण्डुपुत्र अर्जुन उर्वशी के प्रणय याचना को ये कहते हुए ठुकरा देते हैं कि वे उनके पूर्वज पुरुरवा की पत्नी थी इसी कारण वे उनके लिए माता सामान है। अर्जुन के द्वारा इस प्रकार अपमानित होने पर उर्वशी उसे नपुंसक होने का श्राप दे देती है। हालाँकि बाद में ये श्राप अर्जुन के काम ही आता है जब उन्हें अज्ञातवास बिताना होता है। इस बारे में अर्जुन कहते हैं कि माता द्वारा क्रोध में दिया गया श्राप भी पुत्रों का भला ही करता है।
देवी तारा के गोद में नन्हा दिव्य बालक है। वह असमंजस में हैं। पास में खड़े चन्द्रमा, देवगुरु बृहस्पति, ब्रह्माजी और अन्य देवता तारा से प्रश्न करते हैं यह किसका पुत्र है ? ब्रह्मण्ड में उसी समय एक गंभीर प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ, उस बालक का वास्तविक पिता कौन है? तारा पहले से ही बृहस्पति की पत्नी थीं, और अब यह बालक सोम से संबंधित माना जा रहा था। यही कारण था कि इस जन्म ने देवताओं के मध्य एक सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण विवाद को जन्म दिया।
Read More... cosmicharmony.in/https-cosmicharmony-in-बध-क-जनम/
चन्द्रमा ने एकान्त स्थान पाते ही उसके केशों को अशक्ति भाव से पकड़ लिया। तारा भी चन्द्रमा के रूप और कान्ति को देखकर कामार्त हो गयी. बृहस्पति तारा की विरहाग्नि से संतप्त होकर, निरन्तर तारा की चिन्ता करने लगे। देवगुरु बृहस्पति द्वारा बार-बार प्रार्थना और याचना करने के बाद भी चन्द्रमा ने तारा को नहीं लौटाया। Read More.... cosmicharmony.in/https-cosmicharmony-in-चनदरमतर-वव…
“गीता कही नहीं गई थी, वह अर्जुन के भीतर प्रकट हुई थी और जो भीतर प्रकट होता है, वह समय में नहीं, समय के पार घटता है।”
गीता का संवाद आंतरिक और टेलीपैथिक केवल कल्पना नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक परंपरा से मेल खाती है। लेकिन इसे केवल “टेलीपैथी” तक सीमित करना थोड़ा छोटा कर देना होगा। यह चेतना का संप्रेषण (Transmission of Consciousness) था, जहाँ गुरु और शिष्य के बीच शब्दों से परे ज्ञान प्रवाहित हुआ।
cosmicharmony.in/भगवद्गीता-कही-गई-या-प्रकट/
“गीता कही नहीं गई थी, वह अर्जुन के भीतर प्रकट हुई थी और जो भीतर प्रकट होता है, वह समय में नहीं, समय के पार घटता है।”
गीता का संवाद आंतरिक और टेलीपैथिक केवल कल्पना नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक परंपरा से मेल खाती है। लेकिन इसे केवल “टेलीपैथी” तक सीमित करना थोड़ा छोटा कर देना होगा। यह चेतना का संप्रेषण (Transmission of Consciousness) था, जहाँ गुरु और शिष्य के बीच शब्दों से परे ज्ञान प्रवाहित हुआ। cosmicharmony.in/भगवद्गीता-कही-गई-या-प्रकट/
Katha Lok
3 जुलाई 2026, शुक्रवार – कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी
3 जुलाई 2026 को आषाढ़ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी है, जिसे कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन सूर्योदय से चंद्रदर्शन तक व्रत रखा जाता है और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है।
पौराणिक कथा
प्राचीन समय में राजा महीजित नामक एक धर्मात्मा राजा थे। उनके राज्य में सुख-समृद्धि थी, लेकिन उन्हें संतान प्राप्त नहीं थी। दुःखी होकर उन्होंने ऋषियों से उपाय पूछा।
ऋषियों ने ध्यान लगाकर बताया कि पूर्व जन्म में राजा से एक अनजाने में ऐसा कर्म हुआ था, जिसके कारण उन्हें संतान-सुख नहीं मिल रहा था। उन्होंने राजा को संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर भगवान गणेश की आराधना करने का उपदेश दिया।
राजा और उनकी रानी ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया। भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उन्हें योग्य पुत्र का वरदान मिला। तभी से संकष्टी चतुर्थी को सभी संकटों का नाश करने वाला व्रत माना जाता है।
कृष्णपिङ्गल गणपति का महत्व
इस संकष्टी पर भगवान गणेश के कृष्णपिङ्गल स्वरूप की पूजा की जाती है। यह स्वरूप नकारात्मकता, भय और विघ्नों का नाश करने वाला माना जाता है। भक्त मानते हैं कि इस दिन की उपासना से जीवन के संकट दूर होते हैं और बुद्धि, सफलता तथा मानसिक शांति प्राप्त होती है।
पूजा-विधि
प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
दूर्वा, लाल पुष्प, मोदक और लड्डू अर्पित करें।
"ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र का जप करें।
गणेश अथर्वशीर्ष या संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें।
रात्रि में चंद्रदर्शन के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।
दान
इस दिन मोदक, गुड़, तिल, फल, अन्न और वस्त्र का दान शुभ माना जाता है।
आध्यात्मिक संदेश
संकष्टी चतुर्थी हमें सिखाती है कि श्रद्धा, संयम और भगवान गणेश की भक्ति से जीवन के बड़े से बड़े विघ्न भी दूर हो सकते हैं। यह दिन नए कार्यों में सफलता, बुद्धि और शुभारंभ का आशीर्वाद प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। 🙏🐘
3 days ago | [YT] | 4
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Katha Lok
https://youtu.be/1g_Ep2jh5mA
King Janak Part 2 | राजा जनक की महिमा | सीता स्वयंवर सभा में क्या हुआ
महर्षि विश्वामित्र का मिथिला में आगमन, राजमहल में सीता स्वयंवर सभा की शुरुआत से लक्ष्मणजी की क्रोधी वाणी तक जहाँ राजा जनक पुरे धैर्य के साथ लक्ष्मण जी को देख रहें हैं।
3 days ago | [YT] | 4
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Katha Lok
1 week ago | [YT] | 1
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Katha Lok
सही प्रश्नों की शक्ति
cosmicharmony.in/सही-प्रश्नों-की-शक्ति/
आध्यात्मिकता केवल पूजा-पाठ का नाम नहीं है। आध्यात्मिकता तब शुरू होती है जब मनुष्य अपने भीतर झाँककर प्रश्न करता है –
मैं कौन हूँ?
मैं केवल शरीर हूँ या उससे भी अधिक कुछ हूँ?
जीवन का अंतिम उद्देश्य क्या है?
मृत्यु के बाद क्या?
सुख होने पर भी मन खाली क्यों रहता है?
1 month ago | [YT] | 4
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Katha Lok
cosmicharmony.in/तुलसी-और-शालग्राम-की-महिम/
1 month ago | [YT] | 2
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Katha Lok
cosmicharmony.in/पुरूरवा-और-उर्वशी-की-अमर-प/
चंद्रवंशी पुरुरवा के बाद जो वंश आगे बढ़ा वह पुरुवंशी कहलाये। आगे चलकर इसी वंश से कुरुवंश, वृष्णिवंश और यदुवंश निकले।
पुरुरवा और उर्वशी की कथा का वर्णन करते हुए शताब्दियों बाद पाण्डुपुत्र अर्जुन उर्वशी के प्रणय याचना को ये कहते हुए ठुकरा देते हैं कि वे उनके पूर्वज पुरुरवा की पत्नी थी इसी कारण वे उनके लिए माता सामान है। अर्जुन के द्वारा इस प्रकार अपमानित होने पर उर्वशी उसे नपुंसक होने का श्राप दे देती है। हालाँकि बाद में ये श्राप अर्जुन के काम ही आता है जब उन्हें अज्ञातवास बिताना होता है। इस बारे में अर्जुन कहते हैं कि माता द्वारा क्रोध में दिया गया श्राप भी पुत्रों का भला ही करता है।
1 month ago | [YT] | 0
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Katha Lok
बुध का जन्म
देवी तारा के गोद में नन्हा दिव्य बालक है। वह असमंजस में हैं। पास में खड़े चन्द्रमा, देवगुरु बृहस्पति, ब्रह्माजी और अन्य देवता तारा से प्रश्न करते हैं यह किसका पुत्र है ? ब्रह्मण्ड में उसी समय एक गंभीर प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ, उस बालक का वास्तविक पिता कौन है? तारा पहले से ही बृहस्पति की पत्नी थीं, और अब यह बालक सोम से संबंधित माना जा रहा था। यही कारण था कि इस जन्म ने देवताओं के मध्य एक सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण विवाद को जन्म दिया।
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1 month ago | [YT] | 2
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Katha Lok
चन्द्रमा ने एकान्त स्थान पाते ही उसके केशों को अशक्ति भाव से पकड़ लिया। तारा भी चन्द्रमा के रूप और कान्ति को देखकर कामार्त हो गयी.
बृहस्पति तारा की विरहाग्नि से संतप्त होकर, निरन्तर तारा की चिन्ता करने लगे।
देवगुरु बृहस्पति द्वारा बार-बार प्रार्थना और याचना करने के बाद भी चन्द्रमा ने तारा को नहीं लौटाया।
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1 month ago | [YT] | 2
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Katha Lok
“गीता कही नहीं गई थी, वह अर्जुन के भीतर प्रकट हुई थी और जो भीतर प्रकट होता है, वह समय में नहीं, समय के पार घटता है।”
गीता का संवाद आंतरिक और टेलीपैथिक केवल कल्पना नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक परंपरा से मेल खाती है। लेकिन इसे केवल “टेलीपैथी” तक सीमित करना थोड़ा छोटा कर देना होगा। यह चेतना का संप्रेषण (Transmission of Consciousness) था, जहाँ गुरु और शिष्य के बीच शब्दों से परे ज्ञान प्रवाहित हुआ।
cosmicharmony.in/भगवद्गीता-कही-गई-या-प्रकट/
2 months ago | [YT] | 2
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Katha Lok
“गीता कही नहीं गई थी, वह अर्जुन के भीतर प्रकट हुई थी और जो भीतर प्रकट होता है, वह समय में नहीं, समय के पार घटता है।”
गीता का संवाद आंतरिक और टेलीपैथिक केवल कल्पना नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक परंपरा से मेल खाती है। लेकिन इसे केवल “टेलीपैथी” तक सीमित करना थोड़ा छोटा कर देना होगा। यह चेतना का संप्रेषण (Transmission of Consciousness) था, जहाँ गुरु और शिष्य के बीच शब्दों से परे ज्ञान प्रवाहित हुआ।
cosmicharmony.in/भगवद्गीता-कही-गई-या-प्रकट/
2 months ago | [YT] | 1
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