जंगल में खड़ा पलाश का वृक्ष अपने चमकीले नारंगी फूलों से ऐसा लगता था मानो खुद आग की लपट हो। एक दिन सचमुच जंगल में आग लग गई। चारों ओर धुआं और लपटें फैल गईं। जानवर भागने लगे और पेड़ जलने लगे, लेकिन पलाश अपने स्थान पर अडिग खड़ा रहा। उसके फूल आग में भी चमकते रहे, जैसे हिम्मत का संदेश दे रहे हों। कुछ ही समय में लोग आए और आग बुझाई। जंगल भले ही झुलस गया, पर पलाश फिर खिला। उसने सबको सिखाया कि कठिन समय में भी साहस और उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।
मेवाड़ के महाराणा रायमल के समय मांडू के सुल्तान गयासुद्दीन ने चित्तौड़गढ़ पर हमला कर दिया, तब उडणा राजकुमार के नाम से प्रसिद्ध कुँवर पृथ्वीराज ने भरे दरबार में सौगंध खाई कि "8 पहर के भीतर गयासुद्दीन को बंदी बनाकर लाऊँगा"
दिन भर की लड़ाई के बाद कोई नतीजा नहीं निकला और रात होने पर दोनों फौजें अपने-अपने डेरों में चली गई। कुंवर पृथ्वीराज ने अपना वचन पूरा करने के लिए चालाकी से रात के वक्त 500 मेवाड़ी बहादुरों के साथ बादशाही डेरों पर हमला कर दिया।
इस अफरा-तफरी के बीच कुंवर पृथ्वीराज गयासुद्दीन तक पहुँचने में सफल रहे और गयासुद्दीन के गले पर कटारी अड़ा दी, लेकिन तभी बादशाही सिपाहियों ने उनको घेर लिया।
कुंवर पृथ्वीराज ने गयासुद्दीन से कहा कि "अगर ज़िन्दा रहना है, तो बेहतर होगा कि कुल बादशाही फौज पीछे हट जावे"
तब गयासुद्दीन ने फौज को पीछे हटने का हुक्म दिया और कुंवर पृथ्वीराज गयासुद्दीन को दुर्ग में ले आए, जहां उसे एक माह तक बंदी रखा गया।
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महाराजा उदय सिंह मारवाड़ के राजा थे, जिन्हें मोटा राजा भी कहा जाता है। उनका जन्म 13 जनवरी 1538 को जोधपुर में हुआ था। वे राव मालदेवजी के पुत्र थे और उनकी माता रानी झालीजी स्वरूप कँवरजी थीं
उदय सिंह ने 1583 से 1595 तक मारवाड़ पर शासन किया। उन्होंने मुगल बादशाह अकबर के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे और उनकी सेना में भी सेवा की। उनकी सबसे प्रसिद्ध बेटी जगत गोसाई की शादी मुगल बादशाह जहाँगीर से हुई थी, जो बाद में शहजादा सलीम के नाम से जाने गए। यह शादी 1586 में हुई थी और इससे मारवाड़ और मुगल साम्राज्य के बीच संबंध और भी मजबूत हुए
उदय सिंह की इस शादी ने उन्हें मुगल साम्राज्य में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया और उनके वंशजों को भी इसका लाभ मिला। उनके नाती शाहजहाँ ने भी मुगल साम्राज्य पर शासन किया
उदय सिंह का निधन 10 जुलाई 1595 को लाहौर में हुआ था। उनकी मृत्यु के बाद, उनके पुत्र सुर सिंह ने मारवाड़ की गद्दी संभाली
इस महल को देखकर आप एक दृश्य की कल्पना करें। अकबर के आक्रमण के समय 23 फरवरी, 1568 ई. की रात्रि को चित्तौड़गढ़ दुर्ग के इस महल में आमेट के रावत पत्ताजी चुंडावत की माता सज्जन कंवर, 9 पत्नियों, 5 पुत्रियों व 2 छोटे पुत्रों व कई क्षत्राणियों ने जौहर किया। एक के बाद एक अग्नि में स्वयं को झोंकते रहे और अपने सम्मान की रक्षा की।
किले से विशाल धुएं का गुब्बार जब अकबर ने देखा तो उसे समझ न आया कि किले में हो क्या रहा है, तभी राजा भगवानदास कछवाहा ने कहा कि "ये जौहर की आग है, जिसका अर्थ है कि कल सुबह किले के राजपूत द्वार खोलकर केसरिया करेंगे"
गढ़कुंडार के क़िले का निर्माण चंदेलों ने करवाया था, पृथ्वीराज चौहान दिल्ली की सहायता से इसे जीत कर अपने मित्र खंगार जो गुजरात में जूनागढ़ से आए थे उनकों देखभाल के दिया था, बाद में बुंदेलाओ का शासन रहा है।
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जंगल में खड़ा पलाश का वृक्ष अपने चमकीले नारंगी फूलों से ऐसा लगता था मानो खुद आग की लपट हो। एक दिन सचमुच जंगल में आग लग गई। चारों ओर धुआं और लपटें फैल गईं। जानवर भागने लगे और पेड़ जलने लगे, लेकिन पलाश अपने स्थान पर अडिग खड़ा रहा। उसके फूल आग में भी चमकते रहे, जैसे हिम्मत का संदेश दे रहे हों। कुछ ही समय में लोग आए और आग बुझाई। जंगल भले ही झुलस गया, पर पलाश फिर खिला। उसने सबको सिखाया कि कठिन समय में भी साहस और उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।
3 months ago | [YT] | 0
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मेवाड़ के महाराणा रायमल के समय मांडू के सुल्तान गयासुद्दीन ने चित्तौड़गढ़ पर हमला कर दिया, तब उडणा राजकुमार के नाम से प्रसिद्ध कुँवर पृथ्वीराज ने भरे दरबार में सौगंध खाई कि "8 पहर के भीतर गयासुद्दीन को बंदी बनाकर लाऊँगा"
दिन भर की लड़ाई के बाद कोई नतीजा नहीं निकला और रात होने पर दोनों फौजें अपने-अपने डेरों में चली गई। कुंवर पृथ्वीराज ने अपना वचन पूरा करने के लिए चालाकी से रात के वक्त 500 मेवाड़ी बहादुरों के साथ बादशाही डेरों पर हमला कर दिया।
इस अफरा-तफरी के बीच कुंवर पृथ्वीराज गयासुद्दीन तक पहुँचने में सफल रहे और गयासुद्दीन के गले पर कटारी अड़ा दी, लेकिन तभी बादशाही सिपाहियों ने उनको घेर लिया।
कुंवर पृथ्वीराज ने गयासुद्दीन से कहा कि "अगर ज़िन्दा रहना है, तो बेहतर होगा कि कुल बादशाही फौज पीछे हट जावे"
तब गयासुद्दीन ने फौज को पीछे हटने का हुक्म दिया और कुंवर पृथ्वीराज गयासुद्दीन को दुर्ग में ले आए, जहां उसे एक माह तक बंदी रखा गया।
पोस्ट लेखक :- तनवीर सिंह सारंगदेवोत
4 months ago | [YT] | 0
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4 months ago | [YT] | 0
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महाराजा उदय सिंह मारवाड़ के राजा थे, जिन्हें मोटा राजा भी कहा जाता है। उनका जन्म 13 जनवरी 1538 को जोधपुर में हुआ था। वे राव मालदेवजी के पुत्र थे और उनकी माता रानी झालीजी स्वरूप कँवरजी थीं
उदय सिंह ने 1583 से 1595 तक मारवाड़ पर शासन किया। उन्होंने मुगल बादशाह अकबर के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे और उनकी सेना में भी सेवा की। उनकी सबसे प्रसिद्ध बेटी जगत गोसाई की शादी मुगल बादशाह जहाँगीर से हुई थी, जो बाद में शहजादा सलीम के नाम से जाने गए। यह शादी 1586 में हुई थी और इससे मारवाड़ और मुगल साम्राज्य के बीच संबंध और भी मजबूत हुए
उदय सिंह की इस शादी ने उन्हें मुगल साम्राज्य में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया और उनके वंशजों को भी इसका लाभ मिला। उनके नाती शाहजहाँ ने भी मुगल साम्राज्य पर शासन किया
उदय सिंह का निधन 10 जुलाई 1595 को लाहौर में हुआ था। उनकी मृत्यु के बाद, उनके पुत्र सुर सिंह ने मारवाड़ की गद्दी संभाली
4 months ago | [YT] | 0
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1943 ई. में डूंगरपुर के महारावल लक्ष्मण सिंह जी अहाड़ा चांदी का तुलादान करते हुए
4 months ago | [YT] | 0
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इस महल को देखकर आप एक दृश्य की कल्पना करें। अकबर के आक्रमण के समय 23 फरवरी, 1568 ई. की रात्रि को चित्तौड़गढ़ दुर्ग के इस महल में आमेट के रावत पत्ताजी चुंडावत की माता सज्जन कंवर, 9 पत्नियों, 5 पुत्रियों व 2 छोटे पुत्रों व कई क्षत्राणियों ने जौहर किया। एक के बाद एक अग्नि में स्वयं को झोंकते रहे और अपने सम्मान की रक्षा की।
किले से विशाल धुएं का गुब्बार जब अकबर ने देखा तो उसे समझ न आया कि किले में हो क्या रहा है, तभी राजा भगवानदास कछवाहा ने कहा कि "ये जौहर की आग है, जिसका अर्थ है कि कल सुबह किले के राजपूत द्वार खोलकर केसरिया करेंगे"
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गढ़कुंडार के क़िले का निर्माण चंदेलों ने करवाया था, पृथ्वीराज चौहान दिल्ली की सहायता से इसे जीत कर अपने मित्र खंगार जो गुजरात में जूनागढ़ से आए थे उनकों देखभाल के दिया था, बाद में बुंदेलाओ का शासन रहा है।
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कोटा के महाराव उम्मेद सिंह जी हाड़ा (शासनकाल 1889-1940)
4 months ago | [YT] | 0
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10 months ago | [YT] | 1
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