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Bernie Sanders, अमेरिका के वरिष्ठ सीनेटर, इस बयान में वेनेज़ुएला में अमेरिकी सैन्य दख़ल का कड़ा विरोध करते हैं।
वह इसे अमेरिकी संविधान और अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन तथा तेल-आधारित साम्राज्यवाद बताते हैं।
उनका तर्क है कि अमेरिका को दूसरे देशों को “चलाने” के बजाय अपनी आंतरिक सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।
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5 months ago (edited) | [YT] | 2

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Happy New Year 2026

5 months ago | [YT] | 3

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बिहार चुनाव नवंबर में दो चरणों में 6 और 11 को होगी । और वोट की गिनती 14 को होगी ।

8 months ago | [YT] | 2

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योजना के नाम पर बिहार में वोट खरीदी

8 months ago | [YT] | 2

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चरित्र पर प्रहार की राजनीति ; आजादी से पहले और अभी तक

भारत में राजनीति की शुरुआत को महाजनपद काल से माना जा सकता है। आगे चलकर 16 मुख्य महाजनपदों में मगध आगे बढ़ा और मगध पर नन्द वंश काबिज हुआ । इसी काल में चाणक्य भी थे जिन्होंने नन्द वंश के अंतिम राजा (धनानंद) को हटाने के लिए चरित्र पर प्रहार की नीति प्रारम्भ किया । धनानंद को विलास भोगी राजा कहा गया जो मदिरा पी कर सत्ता पर काबिज था।

यह वाक्य भी बिहार की धरती पर शुरू हुई जो पहले पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था । आज फिर से प्रशांत किशोर,जिन्हें राजनीति का चाणक्य कहा जाता है, ने चरित्र प्रहार की नीति को शुरू किया है। एनडीए के नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप प्रशांत किशोर के द्वारा लगाया गया है जिससे बिहार की राजनीति में खलबली मच गई है।

कब हुई शुरुआत चरित्र प्रहार की राजनीति ?

इसका इतिहास तो प्राचीन काल और मध्य काल में भी था लेकिन हम यहां आधुनिक काल का उदाहरण पर बात करेंगे। देश आजाद नहीं हुआ था । भारत पर अंग्रेज का शासन था और 1857 की क्रांति ने अपना कमाल दिखा दिया था । कुछ ही समय बाद स्थिति बदलनी शुरू हुई और अंग्रेज पर दबाव बढ़ने लगा परिणामस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई।

वैसे तो इसके स्थापना के समय ही द्वंद थे लेकिन ये द्वंद वैचारिक और सैद्धांतिक थे , व्यतिगत नहीं थे। ऐसे सैद्धांतिक और वैचारिक विरोध की प्रवृति कांग्रेस में बनी रही जब तक कांग्रेस का विभाजन नरम दल और गरम दल के रूप में नहीं हुआ था। जैसे ही गरम दल और नरम दल बना और आधुनिक राजनीति में व्यक्तिगत द्वंद शुरू हो गया । व्यतिगत टिपण्णी शुरू हो गई । यहां से चारित्र प्रहार की राजनीति की बीज को बोया गया । इस दौर में तिलक को उपद्रवी और कट्टर कहा गया वहीं नरम दल के नेताओं को कमजोर और अंग्रेज का भक्त कहा गया ।

1939 में चरित्र प्रहार का साफ झलक

बात 1938 की थी जब सुभाष जी कांग्रेस के अध्यक्ष निर्विरोध बन गए। लेकिन 1939 में अध्यक्ष पद के लिए विवाद शुरू हो गया और नेताजी को इस्तीफ़ा देना पड़ गया। गांधी जी नरम दल के थे और सुभाष जी गरम प्रवृति के जिसके कारण गांधी जी किए और को अध्यक्ष बनवाना चाह रहे थे लिखने 1939 में फिर से सुभाष जी चुनाव जीत गए। लेकिन चुनाव के बाद गांधी और नेहरू समूह के लोगों ने सुभाष जी पर तानाशाही प्रवृति का आरोप लगाया और सुभाष जी इस्तीफा दे दिए ।

वहीं इस समय अंग्रेज के द्वारा गांधी और सुभाष जी पर भी व्यतिगत आरोप मढ़ा गया । गांधी को अंग्रेज में पाखंडी साधु कहा और सुभाष को हिटलर का सार्थक। इसके अलावा भी कई उदाहरण है आजादी से पहले की लेकिन कहानी लंबी नहीं होनी चाहिए ।

स्वतंत्रता के बाद चरित्र की राजनीति

स्वतंत्रता के बाद नेहरू जी प्रधान मंत्री बने लेकिन इनके काल में राजनीति नीति आधारित हुई और ना के बराबर ही व्यक्तिगत आलोचना और आरोप देखने को मिलता है ।लेकिन नेहरू जी के मृत्यु के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधान मंत्री बने तो उनके ऊपर व्यक्तिगत हमला हुआ और उनके चरित्र पर सवाल खड़ा किया गया। शास्त्री जी को कमजोर और नेहरू की बराबरी नहीं करने वाला कहा गया।

आगे चलकर इंदिरा की काल आई और इंदिरा ने गरीबी हटाओ की नारा लाई और चुनाव जीती लेकिन विपक्ष ने उनपर करारा हमला किया और कहा इंदिरा जनता को बहकाने वाली और तानाशाही प्रवृति वाली है। जब देश में आपातकाल 1975- 77 में लगा तो इंदिरा ने विपक्ष के नेताओं को देश विरोधी और अराजकता फैलाने वाला कही। वहीं विपक्ष ने पूर्ण व्यक्तिगत आरोप मढ़ा और कहा कि इंदिरा गांधी तानाशाही है और लोकतंत्र की दुश्मन है। 1977 के चुनाव में व्यक्तिगत छवि मुद्दा अग्रगणी था ।

इंदिरा गांधी के मृत्यु के बाद राजीव गांधी सत्ता में आए लेकिन जल्द ही उनको भी चरित्र की राजनीति में शामिल किया गया । जैसे ही इनके काल में बोफोर्स घोटाला हुआ तो वी पी सिंह ने राजीव गांधी को भ्रष्टाचारी कहकर चरित्र हनन का अभियान चलाया और यहीं से व्यक्तिगत ईमानदारी को हथियार बनाने की शुरुआत हुई।

नरसिंह राव पर भी भ्रष्टाचार और घोटाला का आरोप लगाया गया । बात यहीं तक नहीं रुकी अटल बिहारी बाजपेई को आरएसएस का मुखौटा कहा गया।

चारित्र की राजनीति मनमोहन काल में चरम पर

व्यक्तिगत आरोप की चरम सीमा मनमोहनजी के काल में पहुंच गई और यह काल था 2004- 14। इस दौर में मनमोहन जी को कई तरह के आरोप लगाए गए। मनमोहनजी को कमजोर प्रधानमंत्री के अलावा मौन मोहन भी कहा गया। लेकिन विपक्ष यही तक नहीं रुके और उनको रिमोट कंट्रोल से चलने वाला तक कह दिया।

मनमोहन जी के कम बोलने के स्वभाव को बहुत को राजनीति में उछाला गया और प्रोपेगंडा चला गया जिसका फायदा विपक्ष को मिला।

नरेंद्र मोदी ; सांप्रदायिक मूर्ति

2014 में देश में सत्ता परिवर्तन हुई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और अभी भी है । इनके ऊपर भी चरित्र की राजनीति की जाल को बुना गया । इनको विपक्ष के द्वारा तानाशाह कहा जाता है । वहीं इसके अलावा उन पर आरोप लगाया जाता है कि नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक और पूंजीपतियों का दोस्त है ।

2014 से नेहरू चारित्र का खेल

2014 से भाजपा के द्वारा नेहरू के चरित्र को खंगाला गया और खूब टिप्पणी किया गया। यहां ताकि की संसद में राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव के भाषण में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा नेहरू के चरित्र को खुले तौर पर बात की गई और उनके चारित्र पर सवाल खड़ा किया गया ।

निष्कर्ष

चरित्र की राजनीति कोई नई बात नहीं है । एक लंबी इतिहास है और ढ़ेर सारा उदाहरण पर हुआ है । आज बिहार में वही दोहराया जा रहा है प्रशांत किशोर के द्वारा। ये सही राजनीति की दृष्टिकोण से सही भी है लेकिन तब जब चरित्र का हनन सही में हुए घटना पे हो तो जैसे आज बिहार में सम्राट चौधरी का सबूत के साथ चारित्र उछाला गया है। वहीं अगर चरित्र की राजनीति नेहरू के चरित्र को बिना तर्क के उछाल के हो तो यह लोकतंत्र के लिए सही नहीं है क्योंकि चारित्र की राजनीति प्रोपेगंडा बहुत ही आसानी से लोगों के दिल में घर करती है।

8 months ago (edited) | [YT] | 1

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वोट चोरी का दावा समावेशी लेकिन कार्य अपवर्जित

भारत में लोकतंत्र को बचाने के लिए कांग्रेस के द्वारा वोट चोरी के मुद्दे को उठाया गया जो काफी गंभीर मालूम होती है। 18 सितंबर को फिर से राहुल गांधी के द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस किया गया और सबूत के साथ फिर से चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए गए है। इसकी चर्चा हरके जगह हो रही है । सभी न्यूज चैनलों पर इस मुद्दे पर खुल कर चर्चा हो रही है जो स्वाभाविक भी है ।लेकिन इस मुद्दे को समझने की कोशिश की जाय तो कहीं न कहीं कांग्रेस इस काम में अधूरी नजर आती है और यह अधूरापन महागठबंधन को कमजोर करेगी।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिर्फ कांग्रेस क्यों ?

वोट चोरी का मामला जो एक पूरे भारत का मुद्दा है लेकिन जब भी प्रेस कॉन्फ्रेंस किया जाता है उसमें सिर्फ कांग्रेस की उपस्थिति होती है । 2024 के चुनाव के वक्त एनडिए को हराने के लिए इंडिया महागठबंधन बनाया गया जिसमें कुल 37 राजनीतिक पार्टी शामिल है। इन सभी राजनीतिक पार्टी में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों शामिल है।  अहम बात यह है कि ये सभी पार्टी बहुत सारे राज्यों की जनता के प्रतिनिधि के रूप में हैं लेकिन जब भी प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है तो इंडिया महागठबंध की अनुपस्थिति होती है जो दर्शाती है कि गठबंधन सिर्फ चुनाव के लिए हैं चुनाव के बाद के मुद्दे के लिए नहीं है।
हालांकि जब वोटर अधिकार यात्रा शुरू किया गया बिहार से तो उसमें तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन और उत्तर प्रदेश से अखिलेश यादव भी नजर आए लेकिन ये दो लोग पूरे इंडिया महागठबंधन को नहीं पूरा करते हैं।

सभी राजनीतिक दलों की अनुपस्थिति होने के पीछे कुछ कारण भी है। सबसे पहला कारण है राहुल गांधी के छवि को ठीक करना और बड़ा करना । एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते है वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी अकेले प्रेस कॉन्फ्रेंस में रहते है। यह सोचा समझा निर्णय है जो सिर्फ राहुल गांधी और कांग्रेस को सहायता प्रदान करती नजर आ रही है। दूसरा मुख्य कारण है कांग्रेस अपनी छवि खुद ठीक करने में लगी है । भाजपा के द्वारा जो भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाते हैं उसको शायद ठीक करने की कोशिश है।

इसके अलावा वोटर अधिकार यात्रा में सभी दलों का हिस्सा न लेना बताता है कि महागठबंधन उतनी ताक़तवर नहीं है जितनी होनी चाहिए । क्योंकि सभी दलों को अनुपस्थिति नकारात्मक संदेश भेजता है जनता के बीच। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम ये बताते है कि महागठबंधन का असर जनता के बीच था।

यात्रा भारत केंद्रित नहीं

बिहार में इस यात्रा की शुरुआत की गई जो सिर्फ और सिर्फ बिहार चुनाव केंद्र को प्रदर्शित करता है क्योंकि इस यह यात्रा 16 दिनों की थी जिसमें 1300 किलोमीटर तय किया गया सिर्फ और सिर्फ बिहार में ही । इसका फायदा भी महागठबंधन को मिला है। हाल ही में वोट वाइव्स की रिपोर्ट में महागठबंधन को लोगों ने दूसरा स्थान दिया है और वहीं मुख्यमंत्री किसको बनना चाहिए उसमें तेजस्वी यादव को पहला स्थान दिया गया है ।
यह यात्रा भारत जोरो यात्रा का दूसरा रूप नहीं ले पाई। वैसे लोकतंत्र की गंभीरता को समझा जाय वोट चोरी के चश्मे से तो यह कहा जा सकता है कि इस यात्रा को पूरे भारत में हरेक राज्य में महागठबंधन से जुड़े सभी दलों के द्वारा होनी चाहिए थी लेकिन दुर्भाग्य वश नहीं हो पाई ।
हालांकि इस यात्रा की आवाज़ मीडिया के द्वारा पूरे देश में पहुंची है लेकिन यह यात्रा बिहार तक सीमित रह कर लोकतंत्र को बचाने का कार्य पूरा करने शायद असफल हो गई है। वोट चोरी सिर्फ किसी एक राज्य का मामला नहीं है जो सिर्फ बिहार में कर के छोर दिया गया है। अगर महागठबंधन की योजना हो की बिहार चुनाव के बाद पूरे भारत में वोटर अधिकार यात्रा किया जाय तो यह एक अच्छा कदम होगा ।







अभयजीत कुमार सिंह

9 months ago | [YT] | 2

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लोकलुभावन योजना चुनाव से पहले लोकतंत्र के लिए खतरा है

बिहार में चुनाव का माहौल है ऐसे में राजनीतिक दलों के द्वारा अपने अपने प्रयास किए जा रहे हैं। एक तरफ जनसूरज पार्टी विरोधी दलों का काला चिट्ठा खोल रही है वहीं महागठबंधन के द्वारा वोटर अधिकार यात्रा के बाद बिहार अधिकार यात्रा चलाया जा रहा है। ऐसी स्थिति में एनडीए का चुप रहना मुश्किल है और यही कारण है कि नीतीश कुमार के द्वारा एक के बाद एक लोकलुभावन योजनाओं की शुरुआत की जा रही है।

नीतीश कुमार का लोकलुभावन योजनाएं

पिछले एक से दो महीने के अंदर नीतीश कुमार ने बहुत सारे योजनाओं का शुरुआत किया है तथा कुछ योजनाओं को विस्तार दिया है । नीतीश कुमार ने वृद्धा पेंशन योजना जो पहले से चल रहा था उसमें बदलाव कर दिया है । पहले इस योजन के तहत 400 रुपए प्रति माह दिया जाता था जिसे अब बढ़ा कर 1100 प्रतिमाह कर दिया गया है ।
इसके अलावा मुख्यमंत्री निश्चय स्वयं सहायता भत्ता में भी बदलाव लाया गया है । इस योजना में पहले इंटर पास युवक और युवतियों को 1000 रुपए प्रतिमाह दिया जाता था । अब इस योजना का विस्तार किया गया है । इस योजना में अब ग्रेजुएट युवक और युवतियों को शामिल कर दिया गया है। नए बदलाव के अनुसार अब आर्ट्स , साइंस और कॉमर्स के ग्रेजुएट जिनकी आयु 20 वर्ष से 25 वर्ष तक है तथा बेरोजगार हैं उनको दो साल तक 1000 रुपए दिए जाएंगे।
एक और योजना की शुरुआत की गई है जिसमें वकीलों को भी तीन साल तक 5000 प्रतिमाह दिया जाएगा लेकिन इसमें सभी को नहीं दिया जाएगा । इस योजना के लाभार्थी वही होंगे जिन्होंने जनवरी 2024 से अपना रजिस्ट्रेशन वकालत के लिए बार काउंसिल से लिया होगा ।
चुनाव के पहले लोकलुभावन योजनाओं की शुरुआत अच्छे संकेत नहीं है

बिहार में नीतीश कुमार के द्वारा ऊपर दिए योजनाओं की शुरुआत की गई है। इन योजनाओं की शुरुआत चुनाव करीब होने के वक्त हुई है जो सरकार के 5 साल ना काम करने के संकेत को दर्शाता है।
वृद्धा पेंशन में बढ़ोतरी एक अच्छी पहल है लेकिन चुनाव शुरू होने से पहले इसकी बढ़ोतरी को लोकलुभावन ही समझा जाएगा। अगर पहले इसकी शुरुआत होती तो लाभार्थी ज्यादा लाभ ले सकते थे लेकिन नहीं किया गया । यह सरकार की मनसा को दर्शाती है कि सरकार सिर्फ ओर सिर्फ चुनाव जीतने के लिए कार्य करने के लिए प्रेरित हैं।
मुख्यमंत्री निश्चय स्वयं सहायता भत्ता में भी बदलाव किया गया जिसमें 1000 देने की बात है । यह योजना भी पूरे तरीके से लोकलुभावन है । इन योजनाओं को चुनाव के पहले शुरू कर सरकार सिर्फ अपने 5 साल में जो काम नहीं किया है उसको छिपना चाहती है।
हाल ही में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 75 लाख महिलाओं को 10000 का लाभ दिया गया है जैसे लग रहा है वोट खरीदने का पूरा इरादा चल रहा हो बिहार में । आखिर क्यों नहीं इस योजना को बहुत पहले लागू किया गया? क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मुखौटा धारण किए नेता जवाब दे सकते है ?
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अगर चुनाव काम पहले से कर के उन कामों के आधार पे वोट अगर मांगी जाती है तो लोकतंत्र मजबूत होती है। लोगों के पास पूर्ण सूचना होती है कि 5 सालों में काम कैसा हुआ है। इसके आधार पर जनता अपना निर्णय बनती है ।
चुनाव से पहले लोकलुभावन योजनाओं के शुरुआत से लोग के अंदर दूसरा एजेंडा भरने की कोशिश होती है जो लोकतंत्र के लिए खतरा है ।
इन योजनाओं से प्रतीति होती है कि सरकार वोट अप्रत्यक्ष रूप से खरीदना चाह रही है । क्योंकि जितने भी योजनाओं की शुरुआत की गई है उसकी समय सीमा निश्चित है जो खुले तौर पर बताती है कि वोट अप्रत्यक्ष रूप से खरीदी जा रही है।

9 months ago (edited) | [YT] | 1

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वोटर अधिकार यात्रा सासाराम से क्यों शुरू किया गया ?


राहुल गांधी के द्वारा 7 अगस्त 2025 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया गया जिसमें पूरे बारीकी से बताया गया कि कैसे कनार्टक के महादेवपुरा असेंबली में वोट की चोरी की गई है । चुनाव आयोग पर वोट चोरी को लेकर इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के द्वारा गंभीर आरोप लगाए गए ।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद कांग्रेस पार्टी ने पूरी सतर्कता से एक घोषणा किया  कि एक यात्रा बिहार से शुरू की जाएगी वोट चोरी के विरोध में । इस यात्रा का नाम दिया गया  "वोटर अधिकार यात्रा"। बिहार के चुनाव को ध्यान में रख कर बिहार से ही शुरू की गई जो पूरे जोर शोर से समाप्त हुई ।

यात्रा की रूप रेखा
यह यात्रा 17 अगस्त 2025 से प्रारंभ किया गया है । लेकिन इसको शुरू करने से पहले जरूर सोचा गया होगा और इस यात्रा को बिहार के सासाराम जिले से शुरू किया गया । यह यात्रा 16 दिनों की थी जो सासाराम से शुरू होकर गया , भागलपुर, कटिहार, दरभंगा, सिवान होते हुए अंतिम में पटना पहुंचेगी । इस यात्रा में कुल 1600 किलोमीटर की दूरी तय की जाएगी जो बिहार चुनाव के परिपेक्ष्य में बहुत ही लाभदायक सिद्ध हो सकती है लेकिन कितना ये देखने लायक होगा ?

शुरुआत सासाराम से क्यों ?
इस यात्रा को बहुत ही चतुराई से और सोच समझ कर सासाराम से शुरू किया गया है जो कई कहानी बयान कर रही है । इस परिपेक्ष्य में नुशुर वाहिदी ने खूब लिखा है
    एक नज़र का फ़साना है दुनिया
    सौ कहानी है एक कहानी से ।
सासाराम रोहतास जिले का एक क्षेत्र है जो बहुत ही खास है राजनीति दृष्टिकोण से । यह वही क्षेत्र है जहां से  दलितों के महान नेता बाबू जगजीवन राम  स्वतंत्र भारत के पहले लोकसभा चुनाव में जीत के आए थे  और कांग्रेस के साथ 1979 तक बने रहें। हां ये भी सच के की इन्होंने आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का विरोध किया और कांग्रेस को छोड़ दिया और कांग्रेस फॉरवर्ड डेमोक्रेसी के साथ जनता पार्टी में शामिल हो गए ।

अगर जगजीवन राम और राजद के सिद्धांत को मिलाया जाय तो साफ हो जाता है कि एक बार फिर से दलितों की आवाज के मुद्दे को उठाकर चुनाव को मोड़ने की कोशिश हो रही है महागठबंदन के द्वारा । क्योंकि जन स्वराज पार्टी कहीं न कहीं विकास , रोजगार और पलायन के मुद्दे से महागठबंधन को हानि पहुंचा रही है ।

इसके अलावा आपातकाल के दौरान जो विरोध हुआ जगजीवन राम जी के द्वारा उसको ठीक करने की कोशिश भी झलक रही है । क्योंकि सासाराम जगजीवन राम जी का स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव का लोक सभा क्षेत्र रहा है । ये यात्रा शुरू से अंत तक जगजीवन राम के जीवन और सिद्धांत से जुड़ा है । यह यात्रा पटना पहुंचने से पहले भोजपुर भी घूमेगी जो जगजीवन राम की प्रारंभिक शिक्षा का क्षेत्र रहा है ।

इसी बीच तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन को भी मुजफ्फरपुर में वोटर अधिकार यात्रा में शामिल किया गया जो साफ करता है कि यह यात्रा लोकतंत्र को बचाने के साथ साथ दलितों के आवाज की राजनीति को बढ़ाने की कोशिश है । बीते कुछ सालों में लालू प्रसाद यादव के ऊपर चले भ्रष्टाचार के मामलों ने इनके पुराने कार्यों को धूमिल किया है और कांग्रेस बिहार में बीते दसको से अच्छा नहीं कर पाई है जो महागठबंधन को इस रस्ते पे लाने के लिए मजबूर किया है ।
स्टालिन की भी पार्टी की उत्पत्ति पिछड़े वर्गों की आवाज उठाने के आंदोलनों से हुई है और राजद की भी यही इतिहास रही है जो साफ करता है कि बिहार में फिर से राजनीति कहीं न कहीं जाति आधारित होने जा रही है । ऐसे में दूसरे दलों को चुनौती मिल सकती है जो विकास की राजनीति को आधार बना कर सरकार बनाने की कोशिश कर रही है ।

9 months ago | [YT] | 2