Vishv Pasi Mahasabha

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▶️ Veer Uda Devi Pasi & 1857 Revolution
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▶️ Untold stories of Pasi Samaj

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जय महादेव 🔱 | जय वीर पासी ⚔️


Vishv Pasi Mahasabha

**कायर भोगे दुख सदा, वीर भोग्य वसुंधरा।
भरपासी वीरपुरुष, नागवंश परंपरा।।**

**भाला, खड़्ग, कृपाण से, गूँजी रण की धार।
वीरों के बलिदान से, अमर हुआ संसार।।**

धर्म, धरा, सम्मान हित, जिसने दिया बलिदान।
युग-युग तक गाता रहे, उसका भारत-गान।।

रण में जिसने पीठ ना, शत्रु समक्ष दिखाई।
उसकी कीर्ति अमर रहे, जग ने महिमा गाई।।

शौर्य, त्याग, स्वाभिमान की, जलती रही मशाल।
वीरों के पदचिह्न पर, चलता रहा विशाल।।

संकट में जो अडिग रहे, बनकर दृढ़ प्राचीर।
इतिहासों के पृष्ठ पर, अमर हुए वे वीर।।

भारत माता की शपथ, झुकने न देंगे मान।
प्राण रहें या न रहें, ऊँचा रहे सम्मान।।

सत्य, न्याय की राह पर, बढ़ते रहे महान।
वीरों की इस साधना का, अमिट रहे सम्मान।।

एक रहे, संगठित रहें, बढ़े सदा विश्वास।
सेवा, शिक्षा, शक्ति से, हो समाज विकास।।

वीर भोग्य वसुंधरा, गूँजे यही पुकार।
शौर्य, त्याग, स्वाभिमान का, अमर रहे विस्तार।।


कायर भोगे दुख सदा, वीर भोग्य वसुंधार।
भरपासी वीरपुरुष, नागवंश परमपरा॥


धर्म धरा सम्मान हित, अर्पित किए प्राण।
ऐसे वीरों का सदा, गाता रहे जहान॥

भाला खड़्ग कृपाण की, गूँजी रण-हुंकार।
अन्यायों के सामने, झुका नहीं किरदार॥

संकट आया सामने, डिगे नहीं जो वीर।
उनके चरणों में सदा, झुकता रहा समीर॥

स्वाभिमान की ज्योति से, आलोकित हर गाँव।
वीरों की इस पुण्य भू, बढ़ता जाए नाम॥

माटी जिसकी वीरता, गाती बारंबार।
उस धरती की शान पर, जीवन भी कुरबान॥

सत्य न्याय की राह पर, बढ़ते रहे महान।
त्याग तपस्या से बना, भारत देश महान॥

रण में जिसने दे दिया, हँसते-हँसते शीश।
उसकी गाथा गा रहे, आज सभी जगदीश॥

एकता की शक्ति से, होता हर उत्थान।
मिलकर चलना सीख लो, यही सच्चा अभियान॥

शिक्षा सेवा श्रम सदा, जीवन का आधार।
इनसे ऊँचा हो सके, अपना कुल-परिवार॥

वीर वही जो सत्य पर, रहता सदा अडिग।
आँधी आए लाख भी, डोले नहीं तनिक॥

भारत माँ की आन पर, अर्पित तन-मन-प्राण।
युग-युग तक गूँजे सदा, वीरों का गुणगान॥

कीर्ति अमर होती वही, जो करता उपकार।
मानवता की राह पर, चलता बारंबार॥

वीरों की संतति रहे, साहस से भरपूर।
ज्ञान, शील, सद्भाव से, करे जगत भर नूर॥

कायर भोगे दुख सदा, वीर भोग्य वसुंधार।
सत्य, शौर्य, स्वाभिमान का, अमर रहे विस्तार॥

दीपक कुमार भरपासी

1 week ago | [YT] | 39

Vishv Pasi Mahasabha

,,#राजा #बेल्हा #पासी का #इतिहास,,

प्रतापगढ़ के किवदंतियों में महाराजा बहला पासी को बेल्हा पासी के नाम से जाना जाता है
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12वि सदी से 13 वी सदी के मध्य तक प्रतापगढ़ वा उससे सटे हुए क्षेत्र में कई पासी राजा राज्य कर रहे थे जो हुंडौर के पासी राजा के नेतृत्व में अपना अपना राज्य चला रहे थे इसका जिक्र
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डिस्टिक गजेटियर प्रतापगढ़ वा पुस्तक हिस्ट्री ऑफ सोमवंश में मिलता है इस पुस्तक में जो लिखा है 12 वि सदी से 13वि सदी के मध्य तक प्रतापगढ़ (पासियो )
के कब्जे में था। ये एक अनार्य जाति के लोग थे। उनके किले और गांव पूरे जिले में फैले हुए थे, जिनमें से कुछ के खंडहर अभी भी देखे जा सकते हैं। पासियो के कई सरदार थे, लेकिन उनमें से एक, जिसे राजा कहा जाता था, हंडौर नामक स्थान पर रहता था, जो प्रतापगढ़ से बारह मील दूर और रायबरेली मार्ग पर स्थित था। राजा किले में रहता था और एक बड़ी सेना रखता था। इन पासियो के अलावा, जिले के दक्षिणी हिस्से पर रायकवार क्षत्रियों का कब्जा था,
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इस पुस्तक के अनुसार एक ही समय काल में कई पासी राजाओं और सरदारों का जिक्र मिलता है
दोस्तो हम जानेंगे राजा बेल्हा पासी के बारे में
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प्रतापगढ़ के पासियो में
राजा बेल्हा पासी की कहानी घर घर में प्रचलित है
बेल्हा गढ़ की स्थापना की दास्तान
रहस्य, साहस और वीरता की अनूठी गाथा है। यह गाथा हमें उस दौर में ले जाती है जब भारत के उत्तरी क्षेत्र में छोटी-छोटी रियासतें अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थीं। उन्हीं में से एक थी बेल्हागढ़, जिसे आज के उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के नाम से जाना जाता है।
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GAZETTEEROF THE
PROVINCE OF OUD H.
VOL. I.-A. TO G.
मे लिखा है बताया जाता है
बेला परताबगढ़- जिले का कस्बा है इस कस्बे का नाम माता बेला देवी के नाम पर पड़ा है, जिनका मंदिर सई नदी के किनारे है। सन 1209 ई०वी० में इस जगह को अवध सहायक सेना की छावनी के तौर पर बसाया गया था।
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दोस्तो गजेटियर में बेल्हा क्षेत्र में जिस सैनिक छावनी की बात कही गई है
वह सैनिक छावनी राजा बहला पासी के नेतृत्व में अवध के पासी राजाओ के निर्देशों पर सैनिकों को एकत्रित करके युवा अवस्था में ही बेल्हा क्षेत्र में सैनिक छावनी बनवाई थी जो उस समय विशाल जंगलों से घिरा हुआ था।

इस सैनिक छावनी को किले के रूप में प्रवर्तित कर दिया गया
जंगल के बीचों-बीच एक मजबूत किले की नींव रखी थी यह किला न केवल उनकी सेना का मुख्यालय बना, बल्कि बेल्हा देवी के प्रति उनकी श्रद्धा का प्रतीक भी बना।
महीनों की कड़ी मेहनत और प्रयासों के बाद, किले का निर्माण पूरा हुआ। इस किले के चारों ओर गहरी खाई और ऊंची ऊंची दीवारें थीं, जो इसे दुश्मनों के लिए अभेद्य बनाती थीं।
राजा बहला अपने राज्य में शांति और समृद्धि बनाए रखने के लिए सदैव तप्तर्य रहते थे
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इस राज्य ने न केवल उस क्षेत्र के लोगों को सुरक्षा दी, बल्कि उन्हें एक नई पहचान भी दी। आज भी, प्रतापगढ़ के लोग उसकी ऐतिहासिक महत्ता का स्मरण करते हैं।
बेल्हा गढ़ केवल एक राज्य नहीं था; यह उस क्षेत्र के लोगों के लिए स्वाभिमान का प्रतीक बन गया था।
प्रतापगढ़ के रायखवार राजपूतों ने पासी शासकों के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था
प्रतापगढ़ के पासी राजाओं को हराकर रायखवार राजपूतों ने जिले के एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया था रायखवार राजपूतों की दमनकारी युद्ध नीति से निपटने के लिए राजा बहला पासी ने अपनी सेना को संगठित किया और रायखवार राजपूतों के दमन कारी युद्ध नीति को चुनौती दी लंबे समय बाद
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सन 1245 ई० वी० में दिल्ली की सत्ता पर नसिरुद्दीन महमूद स्थापित हुआ उसके राज्य काल में बलबन ने शासन प्रबन्ध में विशेष क्षमता दिखाई। बलबन ने पंजाब तथा दोआब के हिन्दुओं के विद्रोह का दृढ़ता से दमन किया इसी समय बलबन ने सुल्तान नसिरुद्दीन महमूद ने अवध के विद्रोही पासी राजाओं को दबाने के लिए बलवान को सेनापति नियुक्त किया
सन 1245 ई.से नसीरुद्दीन महमूद के सुल्तान बनने तक बलबन का अधिकांश समय विद्रोहों को दबानें में बीता। सोमवंशी राजपूत लखन सेन ने दिल्ली के मुस्लिम शासकों के साथ मिल कर बलबन के नेतृत्व में पासी राजाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया प्रतापगढ़ के कई पासी राजाओं के राज्यों के साथ साथ बहला
पासी का राज्य बेल्हा गढ़ भी सोमवंशी राजपूत लखन सेन के विशाल सेना के चपेट में आ गया

इस तरह सोमवंशी राजपूत लाखन सेन ने बलबन के साथ मिल कर पासियो को सत्ता से बेदखल कर दिया सन 1258 ई० तक सोमवंशी राजपूतों का संपूर्ण झूसी स्टेट में राज्य फैल गया झूंसी स्टेट हुन्डोर राज्य में विलय हो गया कलान्तर में प्रतापगढ़ को अरोड़
नामक राज्य से सम्बोधित किया जाता था ।
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सोमवंशी राजपूतो ने चारो तरफ राज्य विस्तार कर लिया झूसी से प्रतापगढ़ तक राजपूतो का राज्य विस्तार हो चूका था और इस तरह सम्पूर्ण प्रतापगढ़ में सोमवंशी राजपूत स्थापित हो गए

पुस्तक हिस्ट्री ऑफ सोमवंश के पेज 15 पर जिक्र मिलता है उल्लेख है

सोमवंशी राजपूतों के नर संहारो के कारण बचे हुए भर (पासी) जंगलों में चले गए कुछ तो अन्य जिले में प्लान कर गए

उनमें से राजा बहला पासी भी बेल्हा गढ़ का किला हार कर बचे हुए अपने परिवार को लेकर सुरक्षित बाराबंकी की तरफ प्रस्थान कर गए

लेकिन शासन करना जिनके खून में हो वो गुमनाम जिंदगी नहीं जी सकता राजा बहला पासी ने बाराबंकी के हैदर गढ़ तहसील में उन्होंने पासियों को संगठित किया और भिलवाल राज्य की स्थापना की वह भीलवल में राज्य करने लगे
डिस्टिक गजेटियर प्रविंसेस अवध वाल्यूम 1 पेज नंबर 281 पर उल्लेख मिलता है
महाराजा बहला पासी के बारे में बताया गया है की बाराबंकी के भीलवाल क्षेत्र की स्थापना बहला पासी ने की थी

नोट, कोई भी व्यक्ति इस पोस्ट को कॉपी करे तो संपादक के रूप से मेरा नाम न हटाए

दोस्तो जानकारी कैसी लगी सभी लोग अपनी राय जरूर दे धन्यवाद

भारत पासी भारशिव संपादक
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2 weeks ago | [YT] | 70

Vishv Pasi Mahasabha

🇮🇳 **विश्व पासी महासभा** 🇮🇳
**वीरांगना माता ऊदा देवी पासी जी जयंती – 30 जून**

36 अंग्रेज़ सैनिकों को मौत के घाट उतारकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो जाने वाली महान वीरांगना माता ऊदा देवी पासी जी की जयंती पर विश्व पासी महासभा की ओर से कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बेगम हज़रत महल की विद्रोही सेना ने चिनहट के युद्ध में अंग्रेज़ी सेना को पराजित कर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की। ऐतिहासिक विवरणों में उल्लेख मिलता है कि बेगम की विद्रोही सेना में पासी समाज के वीर योद्धा बड़ी संख्या में सम्मिलित थे।

इसी चिनहट युद्ध में माता ऊदा देवी पासी जी के पति वीर मक्का पासी ने कुकुरेल पुल पर अद्भुत शौर्य का परिचय दिया। जनश्रुतियों के अनुसार उन्होंने अंग्रेज़ी तोपों को अपने कंधों पर उठाकर नाले में पलट दिया और मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

माता ऊदा देवी पासी, बेगम हज़रत महल की महिला सेना की अग्रणी सेनानायिका थीं। सिकंदर बाग के युद्ध में उन्होंने अद्वितीय साहस और रणकौशल का प्रदर्शन करते हुए 36 अंग्रेज़ सैनिकों को मार गिराया तथा अंग्रेज़ी हुकूमत के हृदय में भय उत्पन्न कर दिया। उनका पराक्रम भारतीय नारी शक्ति, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का अमर प्रतीक है।

⚔️ **वीर रस की पंक्तियाँ** ⚔️

*"रणभूमि में जब सिंहनाद हुआ, अंग्रेज़ी साम्राज्य थर्राया था,*
*ऊदा देवी के पराक्रम से, सिकंदर बाग भी गर्वाया था।*
*छत्तीस फिरंगी ढेर हुए, गूँजी रण की हुंकार महान,*
*पासी वीरों की गाथा अमर है, अमर रहेगा उनका बलिदान।"*

🌺 **30 जून – वीरांगना माता ऊदा देवी पासी जी जयंती पर समस्त देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ।**

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🇮🇳 **Vishwa Pasi Mahasabha** 🇮🇳
**Birth Anniversary of Veerangana Mata Uda Devi Pasi – 30 June**

On the birth anniversary of the legendary freedom fighter Veerangana Mata Uda Devi Pasi, who immortalized herself in history by eliminating 36 British soldiers, Vishwa Pasi Mahasabha pays heartfelt tribute and respectful homage.

During the First War of Independence in 1857, the rebel army led by Begum Hazrat Mahal achieved a historic victory in the Battle of Chinhat. Historical accounts mention that a large number of brave Pasi warriors were part of Begum's rebel forces.

In the same battle, Veer Makka Pasi, husband of Mata Uda Devi Pasi, displayed extraordinary courage at Kukrail Bridge. According to traditional accounts, he overturned British cannons into the stream and attained martyrdom while defending his motherland.

Mata Uda Devi Pasi was a distinguished commander in Begum Hazrat Mahal's women's regiment. In the Battle of Sikandar Bagh, she demonstrated unmatched bravery by eliminating 36 British soldiers, striking fear into the hearts of the colonial forces. Her sacrifice remains an eternal symbol of courage, patriotism, and women's valour.

🌺 **Heartiest greetings on 30 June, the birth anniversary of Veerangana Mata Uda Devi Pasi ji

2 weeks ago | [YT] | 75

Vishv Pasi Mahasabha

विश्व पासी महासभा की ओर से 36 अंग्रेजों को मार गिराने वाली महान स्वतंत्रता सेनानी, वीरांगना माता ऊदा देवी पासी जी की जयंती पर उनके पावन चरणों में कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

माता ऊदा देवी पासी जी भारतीय इतिहास की वह अमर वीरांगना हैं, जिन्होंने सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय साहस, शौर्य और राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया। उन्होंने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपने अदम्य पराक्रम से अंग्रेजी सेना के 36 सैनिकों को मृत्यु के घाट उतारकर भारतीय नारी शक्ति की वीरता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।

जब देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब माता ऊदा देवी पासी जी ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना मातृभूमि की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए। उनका बलिदान केवल पासी समाज ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए गर्व और प्रेरणा का स्रोत है।

आज उनकी जयंती के पावन अवसर पर विश्व पासी महासभा की पूरी टीम उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है और उनके साहस, त्याग तथा बलिदान को सदैव स्मरण रखने का संकल्प लेती है।

वीरता की वह अमर कहानी, इतिहास में सदैव जीवित रहेगी।
माँ ऊदा देवी का बलिदान, आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा देता रहेगा।

जय वीरांगना माता ऊदा देवी पासी!
जय भारत!
जय पासी समाज!

On behalf of the Vishva Pasi Mahasabha, we pay our heartfelt tribute and offer millions of salutations at the sacred feet of Freedom Fighter Veerangana Mata Uda Devi Pasi Ji on her birth anniversary.

Mata Uda Devi Pasi Ji was one of the bravest women warriors of India's First War of Independence in 1857. She displayed extraordinary courage, patriotism, and determination in the fight against British rule. History remembers her as the fearless heroine who eliminated 36 British soldiers during the battle, becoming a symbol of unmatched bravery and sacrifice.

At a time when India was struggling under colonial oppression, Mata Uda Devi Pasi Ji stood up with unwavering determination to defend her motherland. Her sacrifice is not only a matter of pride for the Pasi community but also an inspiration for the entire nation.

On this auspicious occasion of her birth anniversary, the entire team of Vishva Pasi Mahasabha bows in reverence and pledges to keep alive the legacy of her courage, sacrifice, and patriotism for future generations.

Her immortal story of valor will continue to inspire millions.
Veerangana Mata Uda Devi Pasi Ji remains a shining symbol of bravery, self-respect, and devotion to the nation.

Salute to Veerangana Mata Uda Devi Pasi Ji.
Jai Bharat!
Jai Pasi Samaj!

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2 weeks ago | [YT] | 63

Vishv Pasi Mahasabha

अवध में राजपासियों की गौरवशाली वंशावली
अवध की धरती पर राजपासियों का इतिहास केवल कहानी नहीं, बल्कि सत्ता, शौर्य और स्वाभिमान का जीवंत प्रमाण है। इस वंशावली को देखकर साफ पता चलता है कि हमारा समाज केवल मेहनतकश ही नहीं, बल्कि शासक, संगठक और योद्धा भी रहा है।
इस वंश परंपरा में “आदि पाशी वंश” से लेकर कई शाखाओं तक विस्तार दिखाई देता है, जो यह दर्शाता है कि राजपासियों ने पीढ़ी दर पीढ़ी शासन और नेतृत्व किया।
हमारे पूर्वजों ने:
राज्य चलाया
युद्ध लड़े
समाज को संगठित किया
अपनी पहचान और सम्मान के लिए संघर्ष किया
लेकिन दुख की बात यह है कि हमारे इस गौरवशाली इतिहास को हमेशा दबाने की कोशिश की गई।
अब समय आ गया है कि:
हम अपने इतिहास को पहचानें
अपने पूर्वजों के बलिदान को याद करें
और नई पीढ़ी को सच्चाई से अवगत कराएं
गर्व से कहो — हम राजपासी हैं!
हमारा इतिहास हमारा अभिमान है!
#RajpasiHistory #PasiSamaj #AwadhHistory #ProudRajpasi #सच्चा_इतिहास

2 months ago | [YT] | 24

Vishv Pasi Mahasabha

मलिहाबाद, मध्य काल में देश का मुख्य शहर और राजपासी राजा कंस का निवास स्थान था, जिन्होंने कसमंडी से लेकर मलिहाबाद काकोरी तक अपना राज्य स्थापित किया था सन 1030 ई० में सैय्यद सालार मसूद गाजी के नेतृत्व में मुस्लिम आक्रमण के दौरान कसमंडी मलिहाबाद में भीषण युद्ध हुआ था जिसमे सैयद सालार मसूद गाजी की आधे से ज्यादा सेना मारी गई थी कहा जाता है की इस युद्ध में राजा कंस पासी भी वीरगति को प्राप्त हुए थे।
सैय्यद सालार मसूद गाजी की बची हुई सेना बहराइच के राजा सुहेलदेव पासी के हाथों सारी सेना मारी गई थी

मलीहाबाद, हालांकि पड़ोस के सबसे बड़े शहरों में से एक है, लंबे समय बाद परगना का मुख्यालय और मुस्लिम उपनिवेश का केंद्र बना है। कहा जाता है कि यह पासीयों का मुख्य गढ़ था
और मलिहाबाद की स्थापना मलिया पासी ( मलीहा पासी) ने की थी,

जिनके भाई सलिया (सलीहा पासी) ने हरदोई में संडीला की स्थापना की थी।

"संडीला" का इतिहास बेहद दिलचस्प और सघर्ष पूर्ण रहा है कसमंडी लखनऊ क्षेत्र से निकल कर दो भाई सलिया और मलिया पासी ने
अपनी बहादुरी और वीरता के बल पर सलिया पासी ने हरदोई में संडीला नगर को आबाद किया और संडीला में अपना राज्य स्थापित किया।

पासी जाति के शासन के तहत यह काफी महत्वपूर्ण स्थान रहा । पासीयो के पास इतनी शक्ति और स्वतंत्रता थी कि उन्होंने यहाँ एक टकसाल बनवाई

और चांदी के सिक्कों की ढलाई की जाती थी आज भी उनके समय के सिक्के कभी- कभार खोदने पर पाए जाते हैं, जिससे इसे स्थानीय परंपराओं में खोंटा शहर, कहा जाता था। संडीला पासी राजा सलीहा की राजधानी थी

ये दोनो भाई निरंतर मुस्लिम आक्रमण कारियो से संघर्ष करते रहे और देश धर्म की रक्षा के लिए सर्वस्व बलिदान कर दिया

काकोरी, कसमंडी,मलिहाबाद संडीला,पर 1030 ई० से लेकर 1316 ई० तक पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही वंश के पासी राजा वा सरदारों का अधिकार रहा 1316 ई० में अलाउद्दीन खिलजी ने संडीला मलिहाबाद से पासियो को निष्कासित किया
तकरीबन 286 साल इस क्षेत्र पर एक ही वंश के पासी राजाओं ने राज्य किया

संदर्भ
(1) REPORT OF THE LAND REVENUE SETTLEMENT OF THE LUCKNOW DISTRICT ,BY MR.H.H. BUTTS, (1873) page 124,126

and to have been founded by Maliah Pásí,
whose brother Saliah founded Sandílá in Hardoi.
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(2) GAZETTEER OF THE PROVINCE OF OUDH.VOL. II.-H.TO M. Page ,427,428

It is said to have been the chief seat of the
Arakhs or Pásis, and to have been
founded by Malia Pási, whose brother
Salia founded Sandíla in Hardoi.
_______________________________________
(3) LUCKNOW : A GAZETTEER,VOL 37
OF THE EDITED BY H. R. NEVILL , I. C. S.
1904 Page 237

The place is said to have been founded by
one Malia, a Pási,
_______________________________________
(4) UTTAR PRADESH DISTRICT GAZETERS HARDOI (1980) by AMAR SINGH BAGHEL I. A .S Page 26
संडीला से पासियों को निकाले जाने का वर्णन
An uncorroborated tradition says that the Muslims drove out the Pasis from the Sandila region in the time of Ala-ud-din Khalji
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(5) GAZETTEER PROVINCE OF OUDHE.
VOL.II .H. TO M. Reprinted in India (1985) Page 55
संडीला पासियो की राजधानी का वर्णन
Sandi and Sandila were not occupied by the Moslems till long after the events above referred to, The latter was the capital of a Pasi kingdom

भारत पासी भारशिव

2 months ago | [YT] | 79

Vishv Pasi Mahasabha

रियासती खून, गोरिल्ला युद्ध अभ्यास है हमें,
रणभूमि की धूल भी राजतिलक का आभास है हमें।

तलवारों की खनक में बचपन हमारा पला है,
घोड़ों की टापों में ही विजय का उल्लास है हमें।

हम पासी वंशज हैं जिनके लहू में बगावत बहती है,
झुकना नहीं अत्याचार के आगे — यही इतिहास है हमें।

जो ललकारे स्वाभिमान को, उसका अंत निश्चित है,
शत्रु का सर्वनाश करना ही धर्म-प्रकाश है हमें।

किलों की दीवारें आज भी साहस की गाथा कहती हैं,
पूर्वजों के शौर्य पर अनंत विश्वास है हमें।

ताज नहीं माँगते, ताज बनाना जानते हैं,
राज करना नहीं — रण में अमर होना खास है हमें।

रियासती खून, गोरिल्ला युद्ध अभ्यास है हमें,
दुश्मन के हर वार का प्रतिघात खास है हमें।
हम वो नस्ल हैं जो ताज नहीं झुकने देते,
रण में जीत लिखना ही विरासत का एहसास है हमें।

रियास्ती खून, गौरीला युद्ध अभ्यास है हमें,
सर झुकाना नहीं, बस इतिहास है हमें।

तलवारों की चमक में ही पले हैं हम,
हर ज़ख्म में छुपा एक विश्वास है हमें।

दुश्मन की चाल चाहे जितनी गहरी हो,
हर वार का देना जवाब, ये एहसास है हमें।

मिट्टी की कसम, रगों में जोश उबाल मारता है,
हर जनम में लड़ना ही विरासत और साँस है हमें।
दीपक पासी

3 months ago | [YT] | 80

Vishv Pasi Mahasabha

कैलासपतेः पूजका वीराः नागवंशस्य भूषणम्।
भारशिवकुलगौरवेण वर्धते तेषां कीर्तनम्॥

भरपासी भूमेः रक्षकाः सनातनधर्मधारकाः।
अमरास्तु वीरपरम्परा जयशब्दः सदा ध्वनिः॥

कैलासवासी मूलं हि, नागवंशः प्रसारः।
भरपासीः शिवभक्ताः, धर्मोऽभूत् आधारः॥

शिवध्वजं वहन्तः ते, गङ्गाजलाभिषेकः।
सनातनस्य रक्षकाः, भूधरा अभिषेकाः॥

नागवंशस्य शौर्येण, कम्पिताः शत्रुगणाः।
शिवपादेषु नित्यस्थिताः, जीवनस्य विभवाः॥

भरपासी-रुधिरे नित्यं, शिवशक्तेः निवासः।
धर्मरक्षार्थं सदा, दत्तवन्तः स्वप्राणदासः॥

धर्मवीरत्यागमयी पावनीयं परम्परा।
पूर्वजबलिदानेन उन्नता जाता मेदिनी॥

इतिहासेषु प्रसिद्धं यत् साहसं तेषां महान्।
तेषां वीरभरपासीभ्यः शतशो मम नमः॥

दीपक कुमार राजवंशी उन्नाव

3 months ago | [YT] | 74

Vishv Pasi Mahasabha

पासियों की राजधानियाँ – मितौली, धौरहरा और संडीला (गजट दस्तावेज के आधार पर)

अवध क्षेत्र (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पासी जाति केवल एक श्रमिक समुदाय नहीं थी, बल्कि मध्यकाल से पहले इस क्षेत्र में पासियों के अनेक छोटे-छोटे राज्य और किले थे। अंग्रेजों द्वारा लिखे गए अवध गजेटियर (Gazetteer of Oudh) और डिस्ट्रिक्ट गजेटियर हारदोई व खीरी में पासियों के राज्य और उनकी राजधानियों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

1. गजेटियर में पासियों की राजधानियों का उल्लेख

1877 में प्रकाशित Gazetteer of the Province of Oudh में अंग्रेज अधिकारी विलियम चार्ल्स बेनेट ने लिखा है:

“The Pasis… their traditions are to the effect that Sandila, Dhaurabra, Mitauli, Ramkots…(sanchankot) were all seats of their kings and power.”

अर्थात
पासियों की परंपराओं के अनुसार संडीला, धौरहरा, मितौली और रामकोट उनके राजाओं की राजधानियाँ और शक्ति के केंद्र थे।


इसी बात की पुष्टि अंग्रेज विद्वान विलियम क्रूक ने भी अपनी पुस्तक Castes and Tribes of North-Western Provinces and Oudh (1896) में की है कि अवध क्षेत्र में पासियों के कई राज्य थे और उनकी प्रमुख राजधानियाँ संडीला, धौरहरा और मितौली थीं।


2. मितौली – पासियों की राजधानी

मितौली (जिला लखीमपुर खीरी) पासी राजाओं का प्रमुख किला और राजधानी थी।
यह क्षेत्र घने जंगलों और नदियों से घिरा था, जिससे यह एक सुरक्षित दुर्ग राज्य था।

इतिहासकारों के अनुसार:

मितौली में पासी राजाओं का किला था
यह खीरी, हरदोई और सीतापुर के बड़े क्षेत्र पर शासन करते थे
बाद में राजपूत बिसेन वंश(बघेल) ने इस राज्य पर कब्जा किया

मितौली राज्य को पासियों का सबसे बड़ा राज्य माना जाता है।

3. धौरहरा – पासी राज्य की राजधानी

धौरहरा (जिला लखीमपुर खीरी) भी पासियों की एक बड़ी राजधानी थी।

गजेटियर में लिखा है कि:

धौरहरा एक पासी रियासत की राजधानी थी
यहाँ एक प्राचीन किला और मंदिर के अवशेष थे
बाद में बिसेन राजपूतों ने इस राज्य को जीत लिया

धौरहरा, मितौली और रामकोट – ये तीनों पासी राज्यों की एक श्रृंखला मानी जाती थी।

4. संडीला (हरदोई) – पासियों का मुख्य शक्ति केंद्र

संडीला हरदोई जिले का ऐतिहासिक नगर है और गजेटियर में इसे पासियों के राजाओं का प्रमुख केंद्र बताया गया है।

अंग्रेजी गजेटियर के अनुसार:

संडीला एक प्राचीन किला नगर था
यहाँ पहले आदिवासी और पासी शासकों का राज्य था
बाद में राजपूत और फिर मुस्लिम शासकों ने कब्जा किया


इतिहास में संडीला, बिलग्राम, पिहानी, शाहाबाद आदि क्षेत्र प्राचीन स्थानीय राजाओं (जिनमें भरपासी,आरखपासी ,पासी प्रमुख थे) के राज्य क्षेत्र माने जाते हैं।


5. पासी राज्यों का क्षेत्र

गजेटियर और अंग्रेज इतिहासकारों के अनुसार पासियों के राज्य निम्न जिलों में फैले थे:

हरदोई
लखीमपुर खीरी
सीतापुर
उन्नाव
रायबरेली
शाहजहांपुर

इन क्षेत्रों में पासी, भर, गूजर आदि प्राचीन स्थानीय क्षत्रिय जातियाँ शासन करती थीं।

गजेटियर दस्तावेजों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि:

पासियों की प्रमुख राजधानियाँ थीं —

मितौली (खीरी)
धौरहरा (खीरी)
संडीला (हरदोई)
रामकोट (बांगरमऊ)

ये सभी अवध क्षेत्र में पासी राजाओं के किले और शक्ति केंद्र थे।
अंग्रेज इतिहासकारों ने भी माना है कि एक समय अवध क्षेत्र में पासी लोग “लॉर्ड्स ऑफ द कंट्री” अर्थात देश के शासक थे।

अवध की धरती पर जब राजपूत और मुस्लिम शासन पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ था, उस समय इस क्षेत्र में पासी राजाओं के कई किले और राज्य थे। मितौली, धौरहरा और संडीला केवल कस्बे नहीं थे, बल्कि पासी साम्राज्य की राजधानियाँ और शक्ति के केंद्र थे। अंग्रेजों के गजेटियर दस्तावेज इस बात का प्रमाण देते हैं कि पासी समुदाय कभी अवध क्षेत्र का शासक वर्ग था और उनके किले, दुर्ग और रियासतें पूरे क्षेत्र में फैली हुई थीं।
मितौली और धौरहरा का इतिहास
राजा मितान पासी और राजपासी बाबर का राज्य

अवध और लखीमपुर-खीरी का इतिहास केवल राजपूत या मुगल शासकों का इतिहास नहीं है, बल्कि उससे पहले यहाँ पासी और भर राजाओं के अनेक राज्य थे। अंग्रेजों के गजेटियर, स्थानीय परंपराओं और लोक इतिहास में मितौली, धौरहरा, रामकोट, संडीला आदि क्षेत्रों में पासी राजाओं के राज्य का उल्लेख मिलता है।

इस इतिहास में विशेष रूप से दो नाम महत्वपूर्ण हैं —
राजा मितान पासी और राजपासी बाबर।

मितौली नगर की स्थापना – राजा मितान पासी

लखीमपुर खीरी क्षेत्र की प्राचीन राजधानी मितौली को बसाने का श्रेय
राजा मितान पासी को दिया जाता है।

कहा जाता है कि:

राजा मितान पासी इस क्षेत्र के शक्तिशाली शासक थे
उन्होंने मितौली में किला बनवाया
आसपास के जंगलों को बसाकर राज्य स्थापित किया
उनका राज्य खीरी, सीतापुर और हरदोई के कुछ हिस्सों तक फैला था

मितौली उस समय एक किला-नगर (Fort Capital) था और पासी राज्य की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध था।

मितौली उस समय सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण स्थान था क्योंकि यह घने जंगलों, नदियों और ऊँचे टीलों से घिरा हुआ था।

धौरहरा (बाबरगढ़) की स्थापना – राजपासी बाबर

धौरहरा क्षेत्र को बसाने का श्रेय
राजपासी बाबर को दिया जाता है।

उन्होंने धौरहरा में एक किला बनवाया जिसे बाबरगढ़ कहा गया।
बाद में यही क्षेत्र धौरहरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

धौरहरा उस समय एक मजबूत दुर्ग राज्य था और यह पासी राजाओं की दूसरी बड़ी राजधानी मानी जाती थी।

इतिहास और लोक परंपरा के अनुसार:

बाबरगढ़ में ऊँचा किला था
चारों ओर खाई और जंगल थे
यहाँ से पासी राजा पूरे क्षेत्र पर शासन करते थे

इस प्रकार मितौली और धौरहरा पासी राज्य की दो प्रमुख राजधानियाँ थीं।

राजपूतों द्वारा धोखे से हमला और राज्य छीनना

लोक इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना का वर्णन मिलता है कि बाद में राजपूतों ने सीधे युद्ध में पासी राजाओं को हराना कठिन समझा, इसलिए उन्होंने धोखे से हमला किया।

कहा जाता है:

किसी त्योहार या संधि के समय पासी राजाओं पर अचानक हमला किया गया
किलों पर कब्जा कर लिया गया
पासी राजाओं और सैनिकों को बंदी बना लिया गया
उनकी रियासत और राजवाड़े छीन लिए गए
राजपूतों ने अपना राज्य स्थापित कर लिया

इस प्रकार मितौली और धौरहरा का राज्य पासियों से निकलकर राजपूतों के हाथ में चला गया।

राजपूत राज्य ज्यादा दिन नहीं चल सका

लेकिन इतिहास और लोक कथाओं में एक और महत्वपूर्ण बात कही जाती है कि राजपूत इस क्षेत्र पर ज्यादा समय तक मजबूत शासन नहीं कर सके।

कारण:

जंगल और नदियों का सही ज्ञान पासियों को था
किलों के गुप्त रास्ते पासियों को पता थे
स्थानीय जनता पासी राजाओं के पक्ष में थी
युद्ध की स्थानीय रणनीति पासियों को ही आती थी
गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) पासी बहुत अच्छे से करते थे

इस कारण राजपूतों को शासन चलाने में कठिनाई होने लगी।

पासियों को मुक्त करने की शर्त – सेनापति बनना

तब राजपूत शासकों ने एक शर्त रखी:

अगर पासी योद्धा और राजा हमारे सेनापति बन जाएँ,
तो हम बंदी बनाए गए सभी पासियों को मुक्त कर देंगे।

यह एक राजनीतिक समझौता था।

कहा जाता है:

पासियों ने अपने लोगों की आजादी के लिए यह शर्त स्वीकार कर ली
पासी योद्धा राजपूत सेना के सेनापति बने
युद्ध और रणनीति फिर पासियों के हाथ में आ गई
धीरे-धीरे सेना और युद्ध व्यवस्था पर पासियों का प्रभाव बढ़ गया

यह घटना इस बात को दर्शाती है कि उस क्षेत्र की वास्तविक सैन्य शक्ति और भूगोल का ज्ञान पासियों के पास ही था।

ऐतिहासिक महत्व

इस पूरे इतिहास से कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं:

मितौली और धौरहरा पासी राजाओं की राजधानियाँ थीं
राजा मितान पासी और राजपासी बाबर इस क्षेत्र के प्रमुख शासक थे
राजपूतों ने धोखे से राज्य पर कब्जा किया
लेकिन स्थानीय ज्ञान और युद्ध रणनीति पासियों के पास ही रही
अंततः राजपूतों को पासियों को ही सेनापति बनाना पड़ा


अवध और लखीमपुर खीरी का प्रारंभिक इतिहास पासी राजाओं के बिना अधूरा है।
मितौली के राजा मितान पासी और धौरहरा (बाबरगढ़) के राजपासी बाबर ने इस क्षेत्र में किले, नगर और राज्य स्थापित किए। बाद में राजपूतों ने धोखे से राज्य छीन लिया, लेकिन वे अधिक समय तक मजबूत शासन नहीं चला सके क्योंकि उस क्षेत्र की भूमि, जंगल, किले और युद्ध नीति का वास्तविक ज्ञान पासियों को ही था। अंततः राजपूतों को पासियों से समझौता करना पड़ा और उन्हें अपनी सेना का सेनापति बनाना पड़ा।

इस प्रकार इतिहास में पासी केवल किसान या मजदूर नहीं थे, बल्कि वे किलों के निर्माता, नगरों के संस्थापक, और राज्यों के शासक तथा सेनापति भी थे।
पासी समाज के इतिहास में
गुरु चरण देव
का नाम एक महान संत, गुरु और समाज सुधारक के रूप में लिया जाता है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी, सीतापुर, हरदोई और आसपास के क्षेत्रों में उनके शिष्यों की बड़ी संख्या बताई जाती है, विशेष रूप से लखीमपुर खीरी जिले में।

लोक परंपराओं और समाज की मौखिक इतिहास परंपरा के अनुसार, गुरु चरण देव जी का प्रभाव विशेष रूप से मोहम्मदी क्षेत्र में बहुत अधिक था।

लखीमपुर खीरी – गुरु चरण देव जी का प्रमुख क्षेत्र

लखीमपुर खीरी
जिला प्राचीन समय में भरपासी और अन्य मूलनिवासी राजाओं का क्षेत्र माना जाता है। यहाँ मितौली, धौरहरा, मोहम्मदी, पसगवां, कुकरा आदि क्षेत्रों में पासी राजाओं और संतों का प्रभाव बताया जाता है।

कहा जाता है कि:

गुरु चरण देव जी के अधिकांश शिष्य लखीमपुर खीरी में थे
वे गाँव-गाँव जाकर समाज को संगठित करते थे
लोगों को एकता, साहस और धर्म का उपदेश देते थे
पासी समाज को संगठित करने में उनका बड़ा योगदान था
मोहम्मदी के उत्तर मिला प्राचीन कुआँ और सिक्के

मोहम्मदी
से लगभग 6 किलोमीटर उत्तर एक पुराने कुएँ में खुदाई के दौरान एक महत्वपूर्ण घटना बताई जाती है।

लोक कथाओं के अनुसार उस कुएँ से:

सोने के सिक्के
चाँदी के सिक्के
जिन पर वाराह (सूअर) का चिन्ह बना था
और भगवान शिव की मूर्ति अंकित थी

ऐसे सिक्कों का मिलना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र किसी प्राचीन हिन्दू या स्थानीय राजवंश के शासन में था।

वाराह और शिव चिन्ह का ऐतिहासिक महत्व

सिक्कों पर बने चिन्हों का ऐतिहासिक अर्थ भी महत्वपूर्ण है।

1. वाराह (सूअर) चिन्ह

वाराह भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।
प्राचीन भारत में कई राजवंश अपने सिक्कों पर वाराह का चिन्ह बनाते थे।

वाराह चिन्ह का अर्थ:

शक्ति
पृथ्वी की रक्षा
वीरता
क्षत्रिय परंपरा

यह चिन्ह कई प्राचीन राजाओं द्वारा प्रयोग किया गया था।

2. शिव चिन्ह

शिव की मूर्ति या त्रिशूल का चिन्ह आमतौर पर उन राजाओं द्वारा प्रयोग किया जाता था जो शिव भक्त होते थे।

इसका अर्थ:

शैव परंपरा
युद्ध और शक्ति
तप और योग
लोकधर्म

इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि उस क्षेत्र में शिव उपासक शासकों का राज्य रहा होगा।

सिक्कों से मिलने वाले ऐतिहासिक संकेत

इन सिक्कों से इतिहासकार कुछ संभावित निष्कर्ष निकालते हैं:

उस क्षेत्र में कोई प्राचीन किला या नगर रहा होगा
कुआँ संभवतः किसी किले या मंदिर परिसर का हिस्सा रहा होगा
सिक्के किसी राजा के खजाने के हो सकते हैं
युद्ध या आक्रमण के समय खजाना कुएँ में छिपाया गया होगा
यह क्षेत्र पासी या भरपासी राजाओं के राज्य क्षेत्र में रहा होगा

पुराने समय में खजाने छिपाने के लिए:

कुएँ
मंदिर
किले की दीवार
भूमिगत तहखाने
का उपयोग किया जाता था।
गुरु चरण देव जी और इस क्षेत्र का संबंध

लोक परंपरा के अनुसार:

गुरु चरण देव जी इस क्षेत्र में अपने शिष्यों से मिलने आते थे
मोहम्मदी और आसपास के गाँव उनके प्रमुख शिष्य क्षेत्र थे
जिस कुएँ से सिक्के मिले, उस क्षेत्र को उनके शिष्यों का क्षेत्र माना जाता है
कुछ लोग मानते हैं कि वह स्थान किसी पुराने मंदिर या गढ़ी का स्थान रहा होगा

हालाँकि यह जानकारी मुख्यतः लोक इतिहास और समाज की परंपराओं में मिलती है, लेकिन यह क्षेत्र प्राचीन बसावट वाला क्षेत्र जरूर माना जाता है।

3 months ago | [YT] | 53

Vishv Pasi Mahasabha

राजा कंस पासी और लाखन नगरी का काल

10–11वीं शताब्दी में राजा लाखन पासी ने लखनऊ (लाखन नगरी) की स्थापना की थी।

उसी समय बेहता नाला के पश्चिम क्षेत्र पर राजा कंस पासी का शासन था।

उनकी राजधानी कंस-किला थी, जिसका उल्लेख आज भी मलिहाबाद तहसील के अभिलेखों में मिलता है।

आज उस स्थान पर आबादी बस चुकी है।

राजा कंस पासी के दो पुत्र

युवराज मल्ली

युवराज सल्ली

2. मल्ली और मलिहाबाद की स्थापना

राजा कंस ने अपने बड़े पुत्र मल्ली को मलिहाबाद के दक्षिण कमलहार क्षेत्र सौंपा।

मल्ली ने यहाँ मलीहा-पुरवा बसाया।

कालांतर में यह क्षेत्र मलिहाबाद कहलाया।

नवाबी काल में प्रसिद्ध शायर जोश मलिहाबादी भी इसी क्षेत्र के निवासी थे।

बख्तियार खिलजी का आक्रमण

11वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणों के दौरान
बख्तियार खिलजी ने मल्ली के राज्य को नष्ट किया।

उसने वहाँ बख्तियार नगर बसाया, जो आज भी मुहल्ले के नाम से जाना जाता है।

3. युवराज सल्ली और सण्डीला

राजा कंस ने अपने छोटे पुत्र सल्ली को मलिहाबाद से पश्चिम लगभग 20 किमी क्षेत्र दिया।

सल्ली ने सलीहाबाद बसाया।

सण्डीला नाम कैसे पड़ा

इस क्षेत्र में ताड़-खजूर के जंगल और ताड़ी (साण्डी) का व्यापार अधिक था।

ताड़ी बेचने वाले व्यापारी यहाँ रहते थे।

धीरे-धीरे सलीहाबाद → साण्डी → सण्डीला नाम प्रचलित हो गया।

4. सल्ली का पलायन

जब बख्तियार खिलजी की 1000 घुड़सवार सेना ने हमला किया,
तब सल्ली ने सीधे युद्ध करने के बजाय जनता को सुरक्षित निकालने का निर्णय लिया।

यहीं से कहावत चली—

“कभी मारे वीर, कभी भागे वीर।”

जनता रातों-रात पलायन कर हरदोई की साण्डी झील के पास बस गई।

सल्ली स्वयं सई नदी के जंगलों में जाकर अपनी शक्ति फिर से संगठित करने लगे।

5. सल्ली के पुत्र – अभयराज

सल्ली के पुत्र अभयराज बहुत वीर और साहसी थे।

उनके सात पुत्र थे:

सुजान

सानी

मानू

परशनन्द

विशन

जलेसर

सातन (सबसे छोटे)

6. सातन कोट और महाराजा सातन पासी

सबसे छोटे पुत्र सातन पासी बाद में महान शासक बने।

उनका किला सई नदी के उत्तरी तट पर था, जिसे सातन कोट कहा जाता है।

उनके शासनकाल को लगभग 1170–1202 ई. माना जाता है।

उनके अधीन कई किले थे

ऊँचडीह

मानूखेड़ा

परसन्दन खेड़ा

विशनपुरवा

जलेसर / नागेश्वर किला

अन्य गढ़ियाँ और सरदारों के किले

इन किलों के सरदार राजस्व वसूल कर सातन कोट भेजते थे।

7. सातन पासी का राज्य

उनका प्रभाव क्षेत्र बहुत बड़ा था, जिसमें शामिल थे:

उन्नाव

हरदोई

सीतापुर

लखनऊ

रायबरेली

प्रतापगढ़

जौनपुर

बहराइच

गोंडा

इलाहाबाद आदि

उन्हें “पट्टी वाले राजा” कहा जाता था क्योंकि सई नदी के कछार क्षेत्र की उपजाऊ भूमि से राज्य बहुत समृद्ध था।

8. जयचन्द और आल्हा-ऊदल से युद्ध

कन्नौज के राजा जयचन्द्र ने सातन पासी से कर माँगा।

सातन पासी ने उत्तर दिया:

“गांजर-भांगर की भूमि से एक कानी कौड़ी भी नहीं मिलेगी।”

इसके बाद कई युद्ध हुए:

जयचन्द्र की सेना पराजित हुई

लाखन घायल हुए

बाद में आल्हा-ऊदल को सातन पर हमला करने भेजा गया।

धोखे से वीरगति

युद्ध के दौरान छल से उनकी माता की पूजा बाधित कराई गई।

इसी अवसर पर पीछे से वार करके
1202 ई. में राजा सातन पासी वीरगति को प्राप्त हुए।

9. सातन पासी की विरासत

आल्हा-खण्ड में उनके युद्ध का उल्लेख मिलता है।

उनके सैनिकों को राजपासी कहा जाता था।

आज भी उन्नाव-हरदोई क्षेत्र में लोग स्वयं को
राजपासी / राजवंशी कहते हैं।

राजा कंस पासी → सल्ली → अभयराज → सातन पासी की वंश परंपरा अवध क्षेत्र में एक शक्तिशाली पासी राज्य की कहानी बताती है, जिसने 12वीं शताब्दी तक सई-गोमती क्षेत्र में शासन किया और कई बाहरी आक्रमणों का सामना किया।

4 months ago | [YT] | 102