जय सतनाम 🙏
सतनामियों के लिए तीन महत्वपूर्ण शब्द है
इसमें एक शब्द "सतनाम" है
इस शब्द से कोई भी "सतनामी" अनजान नहीं क्योंकि सतनाम को मानने वाला ही अपने को "सतनामी" कहते हैं इसके अभाव में अपने को कोई भी सतनामी होने का दावा नहीं कर सकता. यह शब्द सतनामी समुदाय में काफी प्रतिष्ठित है इसका उपयोग उपासना एवं अभिवादन में किया जाता है
Satnami Chhattisgarhiya
जय सतनाम 🙏🏻
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5 months ago | [YT] | 24
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Satnami Chhattisgarhiya
जय सतनाम साथियों 18 दिसंबर तेलीबांधा सतनाम भवन
5 months ago | [YT] | 107
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Satnami Chhattisgarhiya
सतगुरू बाबा घासीदास जी की जयंती की आप सभी मानव समाज जीव जंतु को हार्दिक शुभकामनाएं साधुवाद जय सतनाम
18 दिसंबर अमर रहे जय सतनाम
5 months ago (edited) | [YT] | 141
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Satnami Chhattisgarhiya
सतनामी सतनामी हो की भी सतनामी नहीं बन सके
8 months ago | [YT] | 110
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Satnami Chhattisgarhiya
जय सतनाम यह जानकारी सतनाम संस्कृत माला- 3
सतनामी और सतनाम आन्दोलन से लिया गया है। दुखी केवल शुद्ध ही थे अतः शुद्ध ही वर्ण व्यवस्था वाले संप्रदाय को त्याग कर सतनाम धर्म ग्रहण की और सतनामी हुए।
सतनामी हो जाने के बाद भी इनके धर्म व जाति को मानता नहीं दी गई। वषो बीत जाने पर सन 1926 में सतनामी को केवल एक जाति के रूप में मान्यता दी गई। इनके सतनाम धर्म को हिंदू धर्म के अंतर्गत पथ बना दिया गया।
जब तक सतनाम धर्म के प्रचारक महात्मा जन जीवित रहे तब तक किसी ने सतनाम धर्म पर तर्क करने की हिम्मत नहीं दिखाया। किसी ने सिर उठाया भी तो परास्त हो गया।
8 months ago | [YT] | 91
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Satnami Chhattisgarhiya
राजा गुरु बालक दास जी एक महान क्रांतिकारी, समाज सुधारक और सतनाम आंदोलन के प्रणेता थे। उनका जन्म 18 अगस्त 1805 ईस्वी को छत्तीसगढ़ के सोनाखान रियासत के गिरौद गांव में गुरु घासीदास जी और माता सफुरा के द्वितीय पुत्र के रूप में हुआ था। वह सतनाम धर्म के महान प्रचारक, अन्याय और अत्याचार के विरोधी, जनप्रिय, शूरवीर और योद्धा थे। उन्होंने मराठा के शोषण और दमनकारी नीतियों के विरुद्ध खड़े होकर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया।
*राजा गुरु बालक दास जी के महत्वपूर्ण कार्य:*
- *सतनाम आंदोलन*: उन्होंने सतनाम आंदोलन का नेतृत्व किया और समाज को सशक्त और संगठित करने के लिए भण्डारी, साटीदार, महंत, राजमहंत, अठगंवा व्यवस्था स्थापित की।
- *नारी सम्मान*: उन्होंने नारी सम्मान के लिए काम किया और बाल विधवा राधा माता से विवाह कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया।
- *जनकल्याणकारी कार्य*: उन्होंने जनकल्याणकारी कार्य किए और समाज के वंचित वर्गों के लिए काम किया।
- *स्वतंत्रता आंदोलन*: उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया।
*राजा गुरु बालक दास जी की शहादत:*
राजा गुरु बालक दास जी की शहादत 17 मार्च 1860 ईस्वी को औराबांधा में हुई थी। उन्हें अंग्रेजों और सामंती तत्वों ने षड़यंत्र के तहत हत्या कर दी थी। उनकी शहादत के बाद, उनके पार्थिव देह को भंडारपुरी में दफनाया गया था।
हमारे विरासत में ऐसे बहुत बड़े-बड़े कर्मयोगी थे लेकिन हमारा समाज इंस्टाग्राम फेसबुक व्हाट्सएप पर वीडियो बनाने में व्यस्त है हमारे वीरता की गाथा विशाल है पर हमारे युवा साथी कभी भी इस पर अपने ध्यान आकर्षित नहीं करते यह दुखद स्थित है
9 months ago | [YT] | 45
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Satnami Chhattisgarhiya
जय सतनाम
आप सभी को 79 वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
9 months ago | [YT] | 33
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Satnami Chhattisgarhiya
🎋🙏🏻जय सतनाम🙏🏻🎋
10 months ago | [YT] | 36
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Satnami Chhattisgarhiya
जय सतनाम 🙏🏻
मेरा बेटा ज्ञानवीर को 5 मंथ होने की खुशी में मुंह मीठा
गुरु घासीदास बाबा जी का आशीर्वाद हमेशा बना रहे
10 months ago | [YT] | 23
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Satnami Chhattisgarhiya
******** (बाल योगी अमर दास जी) ********
घासीदास साहब जब घर गृहस्ती में थे तो उनके यहां अक्सर संत महात्माओं का आना -जाना लगा ही रहता था | एक बार ऐसे ही संयोगवश 'सत्यवान' नामक एक संत पधारे थे | कुछ दिन तक ज्ञान विज्ञान सत्संग हुआ | प्शचात् संत जी प्रस्थान कर गए, जिस समय महात्मा जी की विदाई हुई, उसे वक्त अमरू घर में नहीं था | 1800 ईस्वी में 12 वर्ष का अमरू दूर से संत जी को देखकर उनके पीछे- पीछे घर में बिना बताए चल पड़े |
भयानक जंगल से घिरा गिरौदपुरी फलॉग भर का भी दिख पाना कठिन था | गिरोधपुरी से कोसो दूर चला गया था | संत जी भी गजब मस्त -मौला थे | पीछे लौटकर भी नहीं देखें | संभवतः अमरदास जी भी कुछ 50 कम दूरी बनाकर चल रहे थे | जब उन्होंने अपना आसन-बासन उतार कर बैठा तो पीछे में अमरू भी खड़ा था| देख कर अचंभित रह गये। दूसरे दिन संत जी ने उन्हें घर पहुंचने की काफी कोशिश की, किंतु सारी कोशिश नाकामयाब रही। अमरू के इंकार को बालहठ कहिये या वैराग्य ज्ञान का सुसंस्कारित जोर, अंततः साथ- साथ कहानी कथा सुनाते ले गए। इस प्रकार आगे मंजिल पार होती गई। आगे और अनके संत महात्माओं का सत्संग करने का मौका मिला।
इधर रात होने पर अमर दास घर में न होने से खलबली मच गई । सभी एक दूसरे संगीत साथी पास पड़ोस के घर खोजने लगे। पिता जी ( घासीदास) ने भी रात भर जंगल के अनेक दिशाएं छान मारी, किंतु कहीं पता ना चला। पिताजी सोचने लगे हो ना हो मेरा बेटा अमरू वही संत श्री सत्यवान साहब के साथ चला गया होगा ,जो सच था। माताओ को उतना बोध कहां जो अपने ममतालु मन को समझा सके। माता सफुरा विलख-विलख कर रोने लगी। हाय -बेटा अमरू! हाय-बेटा अमरू! कहीं मिले! कब मिले! उन्हें लाख ज्ञान साधु- संत का उदाहरण देकर समझाओ, किंतु वे हाय बेटा अमरू कहां मिले! कब मिले! की रट लगाती रही, अमरदास सभी बच्चों में अद्वितीय, खूबसूरत, मूदुभाषी, आज्ञाकारी तथा समाधि प्यार पुत्र था। माता सैफरन सुख कर लकड़ी हो गई। क्या करें, पुत्र शोक से बढ़कर मां के लिए कुछ और नहीं हो सकता।
गांव के लोग कहने लगे की अमर दास का कहीं अता- पता नहीं चल रहा है। बस जंगल में बाघ भालू खा गया। स्वामी बात है कि जिस व्यक्ति का 4-4 साल तक पता ना चले तो। जिसे गीत के रूप में कहलवाते है मां से -"बेटा अमरू रे मोर बनवा के चारा बने"।
इसी शौक ने गुरु घासीदास साहब तथा शाहपुरा माता को विवश कर दिया गिरौदपुरी छोड़ने के लिए, बेटे की याद हमेशा मां के मन में बनी रहेगी, घासीदास जी इसीलिए सह परिवार भंडार तेलाशी को अपनी कर्मभूमि (समाज सेवा क्षेत्र) चुनकर वही बस गए।
10 months ago | [YT] | 81
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