LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi


Hi, everyone! Welcome to my YouTube channel LEGAL EYES with ADV M R where I am sharing something new which is useful in daily life.

Friend,
Self awareness is the only key to success in human life. We often spend our life trying to prove ourselves in the absence of knowledge. A large section of the society is still unfamiliar with the legal awareness related to their rights and duties. As a result, our relationship, personal productivity or should we say that our overall personality is getting compromised.
Legal awareness and legal literacy are
the base of any effort toward legal empowerment. Knowledge of legal provisions and procedures will empower people to demand justice, accountability and effective remedies at all levels.
As an Advocate, for this aim , I am making an effort.
If anyone wants me to make a video on any topic of your choice then write on Comment option on any of my videos and I will try to work on it as soon as possible.
Subscribe me .
Rashmimathuradeep@gmail.com


LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

फर्जी मामलों की आड़ में न्याय व्यवस्था का दुरुपयोग किसी भी निर्दोष व्यक्ति के जीवन को बर्बाद कर सकता है।
विष्णु तिवारी जैसे कई लोग इसका उदाहरण हैं, जिन्होंने कथित रूप से झूठे मामले में अपने जीवन के लगभग 20 वर्ष जेल में बिताए। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस दर्द की झलक है जो Legal procedure में देरी या त्रुटि के कारण पैदा होती है।
👉 सवाल यह नहीं है कि कानून गलत है या सही,
👉 सवाल यह है कि क्या उसका दुरुपयोग रोका जा रहा है?
SC/ST Act का उद्देश्य सामाजिक न्याय और सुरक्षा देना है, लेकिन यदि किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल होता है, तो वह न्याय के मूल उद्देश्य को ही कमजोर करता है।
UGC के विरोध में कई बुद्धिजीवी लोगों ने इस विषय पर आवाज उठाते हुए अपनी नौकरी अपने परिवार की जिंदगी दांव पर लगा दी है । ये लोग अपने लिये नहीं लड़ रहे हैं, इनकी लड़ाई हमारे लिए हमारी आने वाली पीढ़ीयों के लिए है।
निर्दोष लोगों को न्याय मिलना उतना ही जरूरी है, जितना पीड़ितों की सुरक्षा।
आवश्यकता है:
निष्पक्ष जांच की
झूठे मामलों में जवाबदेही तय करने की
और न्याय प्रक्रिया को तेज करने की
ताकि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक “नरक समान जीवन” न जीना पड़े।

क्या आप इस बात से सहमत हैं, तो UGC rollback लिख कर अपना समर्थन दीजिए !
#UGCrollback#आरक्षणहटावदेशबचाव

1 month ago | [YT] | 3

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

इतिहास में पहली बार 10 पुलिस पुलिसवालों को फांसी की सज़ा!

जब कानून की नजरों में सब बराबर तो पुलिस से क्यों डरना?
अगर आप सही हैं तो पुलिस और सिस्टम के खिलाफ लड़कर भी जीत हासिल की जा सकती है।
तमिलनाडु की एक ऐसी घटना… जिसने पूरे देश को हिला दिया था …
आज 6 साल बाद… उसपर आया फैसला… पूरे सिस्टम को आईना दिखा दिया है।
वह केस अब अपने अंजाम तक पहुंच गई है।
तमिलनाडु के सथानकुलम कस्टोडियल डेथ केस में 6 साल बाद आया ऐतिहासिक फैसला, 
जहां कोर्ट ने 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा सुनाई। यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं था, बल्कि इंसानियत को झकझोर देने वाली घटना थी,जहां एक पिता और बेटे को हिरासत में बेरहमी से पीटा गया और उनकी मौत हो गई।

1 month ago | [YT] | 0

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबे वैवाहिक विवाद को समाप्त करते हुए स्पष्ट किया कि जब वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुके हों और उनके पुनर्जीवन की कोई संभावना न हो, तो अनावश्यक मुकदमेबाजी को जारी रखना न्याय के हित में नहीं है।
अदालत ने विवाह को समाप्त करते हुए पति द्वारा दायर 80 से अधिक मामलों को निरस्त कर दिया।
पीठ ने पाया कि पति, जो स्वयं एक वकील है, ने गुजारा भत्ता से बचने के उद्देश्य से पत्नी, उसके परिजनों और यहां तक कि उसके वकीलों के खिलाफ भी अनेक मुकदमे दायर किए। अदालत ने इस आचरण को दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोधपूर्ण करार देते हुए कड़ी टिप्पणी की।
विवाद के पूर्ण और अंतिम निपटान के लिए न्यायालय ने पति को 5 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि अदा करने का निर्देश दिया। इस राशि में गुजारा भत्ता, बच्चों के पालन-पोषण और लंबित मुकदमों का खर्च शामिल है।
दोनों नाबालिग बच्चों की पूर्ण अभिरक्षा मां को सौंपी गई है, जबकि पिता को सीमित मुलाकात का अधिकार प्रदान किया गया है। साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भविष्य में किसी भी प्रकार की उत्पीड़नात्मक कानूनी कार्यवाही को सहन नहीं किया जाएगा।
यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है कि न्यायालय वैवाहिक विवादों को अंतहीन कानूनी लड़ाई में बदलने की अनुमति नहीं देगा।

क्या आपको लगता है कि ऐसे मामलों में सख्त फैसले जरूरी हैं? अपनी राय जरूर बताएं 👇
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1 month ago | [YT] | 2

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

यह मामला सिर्फ युवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग में देखने को मिल रहा है। सवाल है कि बिना तलाक लिए किसी और के साथ live-in relationship में रहना क्या कानूनन सही है और क्या ऐसे संबंधों को कानूनी संरक्षण मिल सकता है?
👉 मुख्य कानूनी बिंदु:
Live-in relationship खुद में अपराध नहीं है, यदि दोनों बालिग हैं और सहमति से साथ रह रहे हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक मामले में 18 वर्षीय लड़की और पहले से शादीशुदा पुरुष को सुरक्षा दी गई और गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई, क्योंकि उनका संबंध सहमति से था।
👉 लेकिन एक दूसरा महत्वपूर्ण निर्णय:
कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति पहले से शादीशुदा है और उसका spouse जीवित है, तो वह बिना तलाक लिए किसी अन्य के साथ live-in में नहीं रह सकता।
ऐसा करना दूसरे जीवनसाथी के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
इस स्थिति में कोर्ट ने पुलिस संरक्षण देने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी।
👉 व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) absolute नहीं होतीं।
एक व्यक्ति की व्यक्तिगत आज़ादी वहीं खत्म हो जाती है, जहाँ उसके साथ दूसरे का कानूनी अधिकार शुरू हो जाता हैं।
बिना तलाक नए संबंध बनाना Bigamy (द्विविवाह) की श्रेणी में आ सकता है, जो एक अपराध है।
कोर्ट ऐसे मामलों में Mandamus writ जारी नहीं करता जहाँ संभावित अपराध को संरक्षण मिलता हो।
👉 अंतिम संदेश: Live-in relationship भले ही वैध हो सकता है, लेकिन अगर वह किसी वैध विवाह के रहते बनाया गया है, तो हर बार कानून संरक्षण नहीं देगा।

हर मामला पूरी तरह तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
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2 months ago | [YT] | 3

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

UP के इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दो मामलों में ऐसा फैसला दिया है, जिसकी चर्चा तूल पकड़ती दिख रही है। हाईकोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप के मामले में सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के मूल अधिकारों का जिक्र किया। साथ ही, जोड़े की सुरक्षा की बात कही। वहीं, लव मैरिज के मामले में कोर्ट ने कहा कि love marriage को सम्मान का मुद्दा नहीं बनाया जा सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन में रह रहे जोड़े की petition पर सुनवाई करते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के मूल अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए कहा है कि interfaith (अंतर्धार्मिक) कपल की सुरक्षा आवश्यक है।

2 months ago | [YT] | 0

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

AI और फर्जी जजमेंट्स: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी चिंता।
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Supreme Court of India ने हाल में एक अहम टिप्पणी करते हुए देश के विभिन्न कोर्ट में बढ़ती एक गंभीर समस्या की ओर ध्यान दिलाया है — Artificial Intelligence (AI) द्वारा बनाए गए fake जजमेंट्स का इस्तेमाल।

दरअसल, यह मामला Heart & Soul Entertainment Ltd v. Deepak
S/O Shivkumar Bahry केस का है। जहां petitioner ने Bombay High Court की उन टिप्पणियों को हटाने की मांग की, जिनमें कहा गया था कि उनकी drafting AI से तैयार लगते हैं और उसमें एक ऐसे जजमेंट का हवाला दिया गया था जो वास्तव में मौजूद ही नहीं है।
Supreme Court ने High Court की इस टिप्पणी को expunge कर दिया, साथ ही एक बड़ी और गंभीर चिंता भी सामने रखी।

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा:
यह समस्या अब “rampant” बन चुकी है।
यह सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि global level पर ऐसा देखने को मिल रही है।
AI से मिली जानकारी का उपयोग करते समय extreme caution जरूरी है।
साथ ही कोर्ट ने संकेत दिया कि इस मुद्दे पर पहले से विचार चल रहा है और भविष्य में इस तरह की लापरवाही पर strict action लिया जा सकता है।

AI tools बेशक मददगार हैं, लेकिन
Fake case laws बना देना
गलत citations देना
पूरी तरह से काल्पनिक judgments तैयार कर देना और एडवोकेट का इन्हें बिना verify किए कोर्ट में पेश करना, सीधे-सीधे justice delivery system की credibility को नुकसान पहुंचाना है।

कानून में एक मूल सिद्धांत है — “Facts must be verified.”

AI एक tool है, proof नहीं। इसलिए किसी भी case law या judgment को cite करने से पहले authentic source से verify करना अनिवार्य है।
तकनीक हमारी मदद के लिए है, लेकिन उस पर आंख बंद करके भरोसा करना खतरनाक हो सकता है ।
AI को use करें, लेकिन Blindly trust न करें। Verification सबसे बड़ी safety है।

📌 ऐसे ही आसान और जरूरी legal updates के लिए जुड़े रहें Legal Eyes by Adv. Mukta rashmi के साथ।

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2 months ago | [YT] | 3

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

अगर आपके मन में पारिवारिक मामलों, संपत्ति विवाद या अपने अधिकारों को लेकर कोई प्रश्न है,तो अब चुप रहने की ज़रूरत नहीं…
📌 हर सवाल का मिलेगा सरल और कानूनी जवाब
📌 सही जानकारी, बिना किसी भ्रम के
👉 मेरे लाईव सेशन (Session) से जुड़िए और अपने अधिकारों को समझिए, सही फैसला लीजिए।
⚖️ क्योंकि सही जानकारी ही सबसे बड़ी ताकत है
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2 months ago | [YT] | 1

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

हरीश राणा: “सम्मान के साथ मृत्यु”  एक ऐतिहासिक अध्याय !

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एक कहानी… 

कभी-कभी कुछ कहानियाँ केवल खबर नहीं होती,वे समाज को आईना दिखाती हैं,कानून को चुनौती देती हैं और मानवता को नए सवालों के सामने खड़ा कर देती हैं।

हरीश राणा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

गाजियाबाद के रहने वाले 31 वर्षीय हरीश राणा ने 24 मार्च 2026 को दिल्ली के एम्स (AIIMS) हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। लेकिन यह एक सामान्य मृत्यु नहीं थी…यह थी — “सम्मान के साथ मृत्यु” (Right to Die with Dignity) की एक ऐतिहासिक मिसाल।


 13 साल… एक अधूरी जिंदगी…

साल 2013… एक हादसा… और सब कुछ बदल गया।

चंडीगढ़ में अपनी PG की चौथी मंजिल से गिर गए  हरीश।  गिरने के बाद हरीश को सिर और रीढ़ में गंभीर चोटें आईं।

उस एक क्षण ने उनकी पूरी जिंदगी रोक दिया।

वह Permanent Vegetative State (PVS) में चले गए

न कोई आवाज… न कोई प्रतिक्रिया…

सिर्फ मशीनों के सहारे चलती हुई सांसें

सोचिए…

13 साल तक एक शरीर जीवित हो, लेकिन जिंदगी ठहर चुकी हो — यह कैसा अनुभव होगा?

यह सिर्फ हरीश की नहीं, उनके परिवार की भी परीक्षा थी।

हर दिन एक उम्मीद… और हर रात एक टूटन।

हरीश की तकलीफ़ देखना  माता-पिता  के  लिए  हर  दिन किसी सज़ा  भुगतने से  कम  नहीं था।  थक कर हरीश के माता-पिता ने एक बेहद कठिन फैसला लिया।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से याचना की —

 “हम अपने बेटे को इस पीड़ा से मुक्त करना चाहते हैं।”

यह मांग सिर्फ एक कानूनी याचिका नहीं थी…यह एक मां-बाप का दर्द था, जो अपने बच्चे को बेबस हालत में तिल-तिल मरते नहीं देख पा रहे थे।


 एक  लंबी  लड़ाई  चली। अंततः मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने:

Passive Euthanasia (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी।  कोर्ट  ने 

माता-पिता की सहमति और मेडिकल रिपोर्ट को आधार बनाया और यहीं से इतिहास लिखा गया—
भारत में पहली बार किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से इच्छामृत्यु की अनुमति मिली।
14 मार्च को हरीश को AIIMS हॉस्पिटल, दिल्ली लाया गया,जहाँ डॉक्टरों की निगरानी में एक संवेदनशील प्रक्रिया शुरू हुई—

लाइफ सपोर्ट धीरे-धीरे हटाया गया,

न्यूट्रिशनल सपोर्ट कम किया गया

यह कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं था, बल्कि एक नियंत्रित, मानवीय और गरिमापूर्ण प्रक्रिया थी।
और फिर… 24 मार्च 2026, शाम 4:10 बजे हरीश ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
मौत के बाद भी… एक नई शुरुआत कर  गये  हरीश! कहते हैं न, कुछ लोग जाते-जाते भी कई लोगों को जीवन दे जाते हैं। हरीश के परिवार ने उनके अंग दान (Organ Donation) का फैसला लिया। यह निर्णय दर्द के बीच भी उम्मीद की किरण बन गया और उनकी मृत्यु ने कई लोगों को नई जिंदगी देने का रास्ता खोल दिया।


भारत में Passive Euthanasia का मतलब है—
किसी व्यक्ति के जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले साधनों को हटाना,ताकि वह प्राकृतिक रूप से मृत्यु प्राप्त कर सके।
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे सशर्त मान्यता दी थी ।
शर्तें थीं :
मरीज की इच्छा (Living Will) ya परिवार की सहमति

मेडिकल बोर्ड की अनुमति

न्यायिक निगरानी। 

 हरीश राणा का मामला इन सभी नियमों का जीवंत उदाहरण बन गया और हम सबके लिए  एक गहरा प्रश्न छोड़ गया है,कि —
“क्या सिर्फ सांस लेना ही जीवन है… या उसमें गरिमा भी उतनी ही जरूरी है?”
यह मामला कानून, नैतिकता और इंसानियत — तीनों के बीच संतुलन बनाने की एक कोशिश है।
हरीश राणा अब इस दुनिया में नहीं हैं…
लेकिन उनकी कहानी हमेशा जिंदा रहेगी—
एक संघर्ष के रूप में ,एक कानूनी मिसाल के रूप में और सबसे बढ़कर…
एक मानवीय संवेदना के रूप में।


प्रार्थना है …

 प्रभु श्रीराम,अपने असीम करुणा-सागर हृदय से इस दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
उनकी समस्त पीड़ाओं का अंत हो, प्रभु की दिव्य छाया में उन्हें शाश्वत शांति, विश्राम और मोक्ष मिले। उनकी आत्मा हर बंधन से मुक्त होकर केवल प्रभु भक्ति में विलीन हो।

॥ ॐ शांति ॥

Adv.Mukta Rashmi 

2 months ago | [YT] | 2

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

Live tomorrow with....

WOMEN RIGHTS LAW
DOMESTIC VIOLENCE ACT

2 months ago | [YT] | 2

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

समस्त youtube परिवार को होली की अनंत शुभकामनाएं 🙏🙏

3 months ago | [YT] | 4