NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel

NEW DIET SYSTEM [ Navi Bhojan Pratha ] NDS Health Center

Dr. Zarna can help you get Heal any kind of illness since she has more than 900 videos on everything . Free of charge advice to Heal any illnesses. We Share health knowledge in easy-to-understand terms, such that you can actually apply it in your life and to improve your health, overcome diseases through holistic healing, or adopt a wholesome, Healthy diet.

I, DR. ZARNA PATEL follower of New Diet System (NDS) [ Navi Bhojan Pratha ] Inspired by Guru Shri BV Chauhan.

Adopt NDS and heal diseases together, as their way to serve humanity and give back the wisdom our society Through healing journeys.


NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel

Thank you God for healthy food

1 day ago | [YT] | 68

NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel

||व्यक्तित्व की विराटता ||
विराट व्यक्तित्व की अपनी एक विशिष्टता होती है। जिस प्रकार कस्तूरी की पहचान उसकी सुगंधी से होती है,उसी प्रकार व्यक्तित्व की भी अपनी एक सुगंधी होती है, जिसे बताया अथवा दिखाया तो नहीं जा सकता केवल महसूस किया जा सकता है। स्वभाव में ही किसी व्यक्ति का प्रभाव झलकता है। व्यक्तित्व की भी अपनी भाषा होती है जो कलम या जिह्वा के इस्तेमाल के बिना भी लोगों के अंतर्मन को छू जाती है।

सिंहासन पर बैठकर व्यक्तित्व महान नहीं बनता अपितु महान व्यक्तित्व एक दिन जन-जन के हृदय सिंहासन पर अवश्य बैठ जाता है। सिंहासन पर बैठना जीवन की उपलब्धि हो अथवा नहीं मगर किसी के हृदय में बैठना जीवन की वास्तविक उपलब्धि अवश्य है। राज सिंहासन पर बैठ सको ना बैठ सको लेकिन किसी के हृदय सिंहासन पर बैठ सको तो समझना चाहिए कि आपका जीवन सार्थक हो गया है।

1 day ago | [YT] | 4

NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel

*🌍 सही और असरकारक जीवदया और अभयदान क्या है❓ 🌱*

केवल घायल पशुओं को भोजन देना, पक्षियों को दाना डालना या कभी-कभी दया दिखाना ही पूर्ण जीवदया नहीं है।
सच्ची जीवदया वह है जिसमें हम किसी भी जीव को भय, पीड़ा, शोषण और मृत्यु की ओर धकेलने वाले कारणों को ही समाप्त करने का प्रयास करें।

🕊️ अभयदान का अर्थ है —
“हर जीव को यह भरोसा देना कि मेरी वजह से उसे भय, हिंसा या मृत्यु नहीं मिलेगी।”

❓ हिंसा का सबसे बड़ा कारण क्या है❓

➡️ स्वाद की आसक्ति
➡️ लालच और व्यापार
➡️ अज्ञान और संवेदनहीनता
➡️ परंपरा के नाम पर गलत प्रथाओं को स्वीकार करना
➡️ पशु आधारित वस्तुओं की मांग बढ़ाना

जब तक मांग रहेगी, तब तक हिंसा, शोषण और कत्ल भी चलता रहेगा।

⚠️ इसलिए केवल हिंसा देखकर दुखी होना पर्याप्त नहीं…
हिंसा के कारणों को समझकर उन्हें रोकना आवश्यक है।

🌱 हिंसा का वास्तविक निवारण क्या है❓

✅ अहिंसक जीवनशैली अपनाना
✅ पशु आधारित भोजन और वस्तुओं का त्याग
✅ करुणा और जागरूकता फैलाना
✅ बच्चों को दया और संवेदनशीलता का संस्कार देना
✅ अपने उपभोग को धर्म और विवेक से जोड़ना

🙏 सच्ची जीवदया केवल भावना नहीं —
वह जीवन जीने की जिम्मेदार और जागरूक पद्धति है।

🌿 जब मनुष्य अपने स्वाद, लोभ और आदतों पर नियंत्रण कर लेता है, तभी वास्तविक अहिंसा संभव होती है।

✨ सबसे बड़ा अभयदान यही है कि
“हमारे कारण किसी जीव को भय, बंधन, शोषण या मृत्यु का सामना न करना पड़े।” ✨

🌿

1 week ago | [YT] | 19

NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel

🇮🇳🛑मनुष्य शरीर की प्रकृति शाकाहारी है🛑

🙏मांस खाने वाले वे चलती फिरती कब्रें हैं, जिनमें मारे गये पशुओं की लाशें दफन की गई हैं। - जार्ज बर्नार्ड शाॅ

💯कोई जानवर मनुष्य की भांति भोजन नहीं करता है, प्रत्येक जानवर का अपना भोजन होता है। यदि तुम भैंसों को ले जाओ बगींचे में और उन्हें वहां छोड़ दो, तो वे सिर्फ एक खास तरह का घास ही खाएंगी। वे हर चीज और कोई भी चीज नहीं खाने लगेंगी—वें बहुत चुन कर खाती हैं। अपने भोजन के प्रति उनकी एक सुनिश्चित संवेदनशीलता होती है। मनुष्य बिलकुल भटक गया है, अपने भोजन के प्रति वह बिलकुल संवेदनशील नहीं है। वह हर चीज खाता रहता है। असल में तुम कोई ऐसी चीज नहीं खोज सकते जो मनुष्य द्वारा कहीं न कहीं खाई न जाती हो। कुछ स्थानों में चींटियां खाई जाती हैं, कुछ स्थानों में सांप खाए जाते हैं, कुछ स्थानों में कुत्ते खाए जाते हैं। मनुष्य हर चीज खाता है। मनुष्य तो बस विक्षिप्त है। वह नहीं जानता कि किस चीज का उसके शरीर के साथ मेल बैठता है और किस चीज का मेल नहीं बैठता। वह बिलकुल उलझा हुआ है।

स्वभावत: मनुष्य को शाकाहारी होना चाहिए, क्योंकि उसका पूरा शरीर शाकाहारी भोजन के लिए बना है। वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि मनुष्य—शरीर का सारा ढांचा यही बताता है कि मनुष्य को मांसाहारी नहीं होना चाहिए। मनुष्य आया है बंदरों से। बंदर शाकाहारी हैं—पक्के शाकाहारी हैं। यदि डार्विन की बात सच है तो मनुष्य को शाकाहारी होना चाहिए।

अब कई तरीके हैं यह निर्णय करने के कि जानवरों की कोई प्रजाति शाकाहारी है या मांसाहारी : यह निर्भर करता है अंतड़ियों पर, अंतड़ियों की लंबाई पर। मांसाहारी जानवरों की आंत बहुत छोटी होती है। चीता, शेर—उनकी आंत बहुत छोटी होती है, क्योंकि मांस पहले से ही पचाया हुआ भोजन है। उसे पचाने के लिए लंबी आंत नहीं चाहिए। पचाने का काम तो जानवर ने ही पूरा कर दिया है। अब तुम खा रहे हो जानवर का मांस। वह पचाया हुआ ही है, लंबी आंत की जरूरत नहीं है। मनुष्य की आंत बहुत लंबी है : इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य शाकाहारी प्राणी है। लंबी पाचन—क्रिया चाहिए, और बहुत कुछ व्यर्थ होता है जिसे बाहर फेंकना होता है।

तो यदि आदमी मांसाहारी नहीं है और वह मांस खाता है, तो शरीर बोझिल हो जाएगा। पूरब में, सभी गहरे ध्यानियों ने—बुद्ध, महावीर—उन्होंने मांसाहार न करने पर बहुत जोर दिया है। अहिंसा की धारणा के कारण नहीं—वह गौण है। लेकिन इस कारण कि यदि तुम सच में ही गहरे ध्यान में उतरना चाहते हो तो तुम्हारे शरीर को निर्भार होने की जरूरत है, स्वाभाविक और प्रवाहापूर्ण होने की जरूरत है। तुम्हारा शरीर हलका होना चाहिए; और मांसाहारी का शरीर बहुत बोझिल होता है।

कभी ध्यान देना कि क्या होता है जब तुम मांस खाते हो : जब तुम किसी पशु को मारते हो तो क्या होता है उसे जब वह मरता है? निश्चित ही, कोई नहीं मरना चाहता। जीवन स्वयं को जारी रखना चाहता है, पशु स्वेच्छा से तो मर नहीं रहा है। अगर कोई तुम्हारी हत्या करे, तो तुम शांति से तो मर नहीं जाओगे। यदि एक सिंह छलांग लगा दे तुम पर और मार डाले तुमको, तो तुम्हारे मन पर क्या गुजरेगी? वैसी ही तकलीफ सिंह को होती है जब तुम सिंह को मारते हो। यंत्रणा, भय, मृत्यु, पीड़ा, चिंता, क्रोध, हिंसा, उदासी—ये सारी चीजें घटित होती हैं जानवर को। उसके सारे शरीर में हिंसा पीड़ा, यंत्रणा फैल जाती है। सारा शरीर विषाक्त तत्वों से, जहर से भर जाता है। शरीर की सारी ग्रंथियां जहर छोड़ देती हैं। क्योंकि जानवर बड़ी पीड़ा में मर रहा होता है। और फिर तुम खाते हो उस मांस को—उस मांस में वे सब जहर मौजूद हैं जो जानवर ने छोड़े हैं। सारी बात जहरीली है। फिर वे सारे जहर तुम्हारे शरीर में चले आते हैं।

और वह मांस जिसे तुम खा रहे हो, किसी जानवर के शरीर का मांस है। वहां उसका कोई सुनिश्चित उद्देश्य था। एक विशिष्ट ढंग की चेतना थी उस जानवर के शरीर में। तुम जानवर की चेतना की तुलना में ज्यादा ऊंचे तल पर हो, और जब तुम जानवर का मांस खाते हो तो तुम्हारा शरीर जानवर के निम्न तल पर आ जाता है। तब तुम्हारी चेतना और तुम्हारे शरीर के बीच एक दूरी पैदा हो जाती है, एक तनाव पैदा हो जाता है, एक बेचैनी होने लगती है।

तो तुम्हें वही चीजें खानी चाहिए जो स्वाभाविक हैं—तुम्हारे लिए स्वाभाविक हैं—फल, मेवा, सब्जियां, जितना हो सके खाओ ये सब। और मजे की बात यह है कि तुम इन चीजों को अपनी जरूरत से ज्यादा नहीं खा सकते। जो कुछ भी स्वाभाविक होता है वह सदा तुम्हें तृप्ति देता है, क्योंकि वह तुम्हारे शरीर को पोषण देता है, तुम्हें सुखद अनुभूति देता है। तुम तृप्त अनुभव करते हो। यदि कोई बात अस्वाभाविक है तो वह तुम्हें कभी तृप्ति की अनुभूति नहीं देती। आइसक्रीम खाते चले जाओ : तुम कभी तृप्त अनुभव नहीं करते। असल में जितना तुम खाते हो, उतना ही तुम्हें लगता है कि और खाओ। वह भोज्य पदार्थ नहीं है। तुम्हारे मन को धोखा दिया जा रहा है। अब तुम शरीर की आवश्यकता के अनुसार नहीं खा रहे हो; तुम बस स्वाद के लिए खा रहे हो। जीभ निर्णायक हो गई है।

आइसक्रीम खाते चले जाओ : तुम कभी तृप्त अनुभव नहीं करते। असल में जितना तुम खाते हो, उतना ही तुम्हें लगता है कि और खाओ। वह भोज्य पदार्थ नहीं है। तुम्हारे मन को धोखा दिया जा रहा है। अब तुम शरीर की आवश्यकता के अनुसार नहीं खा रहे हो; तुम बस स्वाद के लिए खा रहे हो। जीभ निर्णायक हो गई है। जीभ निर्णायक नहीं होनी चाहिए। वह पेट के बारे में कुछ भी नहीं जानती है। वह शरीर के बारे में कुछ भी नहीं जानती है। जीभ का केवल एक काम है : भोजन का स्वाद लेना। स्वभा#वत:, जीभ को सजग रहना होता है, केवल यह देखना होता है कि कौन सा भोजन शरीर के लिए ठीक है—मेरे शरीर के लिए—और कौन सा भोजन मेरे शरीर के लिए ठीक नहीं है। वह दरवाजे पर बैठा चौकीदार है; वह मालिक नहीं है। और यदि दरवाजे पर बैठा चौकीदार मालिक बन जाए, तो हर चीज गड़बड़ा जाती है।

2 weeks ago | [YT] | 18

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सभी रोग और रोग की सभी अभिव्यक्तियाँ जीव द्वारा स्वास्थ्य की स्थिति को बहाल करने के प्रयासों में किए गए मैत्रीपूर्ण प्रयास और उपचारात्मक क्रियाएँ हैं।" "उपचार के नियम को जीव की ओर से स्वास्थ्य के प्रति एक अचूक प्रवृत्ति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, और चूँकि रोग, जैसा कि ऊपर परिभाषित किया गया है, जीवन के लिए स्वाभाविक स्थितियों में गड़बड़ी की अभिव्यक्ति और परिणाम है, चिकित्सक का एकमात्र उपयोगी कार्य उन स्थितियों को बहाल करना है, और उपचार के नियम के परिणामस्वरूप, रोग का गायब होना और स्वास्थ्य की स्थापना होती देखी जाएगी।" (पृष्ठ 8.) "अपच के रोगियों के उपचार के दो तरीके हैं; एक का उद्देश्य रोग को ठीक करना है; दूसरा रोगी को ठीक करने का प्रयास करता है। सभी औषधि चिकित्सा प्रणालियाँ रोग को ठीक करने का दावा करती हैं, और वे रोगी को चाहे जो भी हो, ऐसा कर सकती हैं। स्वास्थ्यकर चिकित्सा प्रणाली इस मूल आधार पर आधारित है कि रोग को ठीक नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसके कारणों को समाप्त किया जाना चाहिए, जब तक कि रोगी स्वस्थ न हो जाए। सभी औषधि प्रणालियाँ सिखाती हैं कि रोग एक इकाई या पदार्थ है; जीवन शक्ति के साथ युद्धरत कुछ जिसे दबाया जाना चाहिए, विरोध किया जाना चाहिए, प्रतिकार किया जाना चाहिए। वश में किया जाना चाहिए, निष्कासित किया जाना चाहिए, मारा जाना चाहिए या ठीक किया जाना चाहिए; इसलिए दवा की दुकान की सभी मिसाइलों से इसका विरोध किया जाता है।

स्वास्थ्यकर प्रणाली सिखाती है कि रोग एक उपचारात्मक प्रयास है, प्रणाली को शुद्ध करने और सामान्य स्थिति को पुनः प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण शक्तियों का संघर्ष। ^ यदि आवश्यक हो तो इस प्रयास को सहायता, निर्देशन और विनियमित किया जाना चाहिए, लेकिन कभी भी दबाया नहीं जाना चाहिए।

और यह हमेशा दवाओं के बिना उनके साथ की तुलना में बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता है।

2 weeks ago | [YT] | 14

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*भोजन क्यों ?*

भोजन जीवन के लिए अनिवार्य है । परंतु जो भोजन को शक्तिदाता मानकर खाता है उसका परिणाम बुरा होता है। पहलवान हमेशा बिना खाये कुश्ती लड़ता है। लड़ने के बाद वह टूटफूट के अनुपात में आवश्यक भोजन करके गहरी नींद में शक्ति प्राप्त करता है। भोजन से कोशों की मरम्मत होती है एवं पुट्ठे बनते हैं

यदि यह मान भी लिया जाये कि भोजन से शक्ति प्राप्त होती है तब विचारणीय है कि यह शक्ति क्या भोजन के पेट में पहुँचते ही आ जाएगी अथवा उसके पचने के बाद? यदि पचने के बाद तो पचने में कई घण्टों का समय लगता है
फिर भोजन खाते ही शक्ति की प्रतीति क्यों होती है? भोजन के तीन-चार घंटे बाद जब शक्ति आनी चाहिये थी तो पुनः शरीर शिथिल क्यों पड़ जाता है? भोजन की आवश्यकता पुनः क्यों महसूस होने लगती है ?

भोजन करते ही मल का उभार रुक जाने से हमको भ्रमवश 'शक्ति की प्रतीति' होती है। भोजन के अभाव में जो शक्तिहीनता लगती है, उसका कारण भोजन का अभाव नहीं, शरीर में संचित 'मल का उभार' है। भोजन के तीन-चार घंटे बाद 'भोजन का दबाव खत्म हो जाने के कारण पुनः ‘मल का उभार' शुरू हो जाता है ।

आयुर्वेद शास्त्र में ऋषियों ने सैकड़ों वर्ष पूर्व लिखा था

आहारं पचति शिखि दोषान् आहार वर्जितः

अर्थात् जठराग्नि आहार को पचाती है और 'आहार के अभाव' में शरीर के दोषों को नष्ट करती है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि यह जठराग्नि भोजन पचाने को प्राथमिकता देती है। भोजन के पेट में जाते ही सफाई का काम रुक जाता
है तथा उस समय जो परेशानी महसूस हो रही थी वह बन्द हो जाती है परंतु यह रुका हुआ मल कुछ समय बाद रोग का रूप धारण कर लेता है। जब तक हमारी यह धारणा बनी है कि भोजन शक्तिदाता है, हमारा शरीर स्थायी रूप से निरोग नहीं होगा, क्योंकि हम प्रकृति को सफाई का काम कभी पूरा नहीं करने देंगे।

3 weeks ago | [YT] | 24

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तुलसी

तुलसी के पत्तों को सभी देवताओं का प्रतिनिधि माना जाता है। तुलसी में अलौकिक औषधीय गुण होते हैं। मानव जीवन में तुलसी का बहुत महत्व है क्योंकि यह एक ही समय में अनेक रोगों का नाश करती है।*

*गर्मी के रोगों में तुलसी के बीजों को पानी में भिगोकर उसकी खीर बनाई जाती है। लकवा और गठिया रोग में तुलसी के पत्तों के काढ़े की भाप ली जाती है। अनिद्रा के लिए काली तुलसी की गोलियाँ खाई जाती हैं। तुलसी में एकाग्रता बढ़ाने का भी गुण होता है। इसलिए विद्यार्थियों को इन पत्तों का विशेष लाभ उठाना चाहिए। प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. उपेंद्र राय ने शोध द्वारा सिद्ध किया है कि तुलसी के पत्तों में कैंसर, हृदय रोग, गुर्दे के रोग और त्वचा रोगों को ठीक करने की असाधारण शक्ति होती है। तुलसी बुखार, खांसी-जुकाम के इलाज में कारगर है और तुलसी के पत्ते मच्छरों को दूर भगाते है

*यदि आप अपने आँगन में प्रचुर मात्रा में तुलसी के पेड़ लगाते हैं, तो उन पेड़ों का सान्निध्य आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकता है और आपको कई छोटी-मोटी बीमारियों से बचा सकता है। प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद तुलसी के पेड़ के सामने बैठकर लंबी साँसें लेने से आपको स्वास्थ्य लाभ होगा।

*भारतीय संस्कृति में तुलसी का अत्यधिक महत्व है। हिंदू धर्म में तुलसी को प्रार्थना का प्रतीक माना जाता है। भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर कोने में तुलसी की विभिन्न किस्में पाई जाती हैं।*

*प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में तुलसी की चार प्रमुख किस्मों का उल्लेख है:*

*1) कृष्ण तुलसी,*
*2) राम तुलसी,*
*3) रण तुलसी,*
*4) कपूर तुलसी*


*तुलसी एक औषधीय पौधे के रूप में बहुत मूल्यवान है। कई लोग नियमित रूप से तुलसी के ताज़ा पत्तों का रस पीते हैं। सदियों से तुलसी का उपयोग कई बीमारियों के इलाज के रूप में किया जाता रहा है।*

*कृष्ण तुलसी के कुछ औषधीय लाभ:*
*1) यह गले के रोगों, श्वसन विकारों, नाक के छालों, कान के दर्द और त्वचा रोगों के लिए प्रभावी है। तुलसी का काढ़ा पीना चाहिए।*
*2) तुलसी के तेल की बूँदें कान में औषधि के रूप में डाली जा सकती हैं।*
*3) तुलसी का उपयोग मलेरिया जैसे रोगों के इलाज के लिए किया जाता है।*
*4) तुलसी का काढ़ा अपच, सिरदर्द, अनिद्रा, दौरे और दाद जैसी बीमारियों के लिए भी प्रभावी


*आयुर्वेदिक और प्राकृतिक चिकित्सा में व्यापक रूप से उपयोग किए जाने के कारण तुलसी का पौधा औषधीय पौधों में अग्रणी स्थान रखता है। तुलसी के पत्ते ही नहीं, बल्कि इसके फूल भी उतने ही लाभकारी होते हैं। तुलसी का पौधा निम्नलिखित दस स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने के लिए एक उत्कृष्ट औषधि है।*

*1. बुखार- तुलसी के पत्तों का रस बुखार कम करने में मदद करता है।*

*2. सर्दी-खाली पेट तुलसी के पत्ते चबाने से सर्दी-जुकाम ठीक हो जाता है।*

*3. गले में खराश- तुलसी के पत्तों को गर्म पानी में मिलाकर गरारे करें। यह अस्थमा और ब्रोंकाइटिस से पीड़ित लोगों के लिए भी फायदेमंद है।*

*4. सिरदर्द- अत्यधिक गर्मी के कारण सिरदर्द एक आम समस्या है। ऐसे में तुलसी के पत्तों और चंदन का लेप माथे पर लगाना चाहिए। इससे सिरदर्द निश्चित रूप से कम होता है।*

*5. आँखों की समस्याएँ- काली तुलसी के पत्तों का रस आँखों की समस्याओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। काली तुलसी के पत्तों (कृष्ण तुलसी) के रस की कुछ बूँदें आँखों में डालने से सूजन कम होती है।*

*6. दांतों की समस्याएँ- तुलसी के पत्तों के चूर्ण को सरसों के तेल में मिलाकर पेस्ट बनाएँ और इस पेस्ट से दाँत साफ़ करें। इससे मसूड़ों और दाँतों के दर्द में तुरंत आराम मिलता है।*

*7. त्वचा की समस्याएँ- तुलसी के पत्तों का रस त्वचा की समस्याओं के लिए भी कारगर है।*

*8. कीड़े-मकोड़ों का काटना- मच्छर और अन्य कीड़ों के काटने की घटनाएँ मुख्यतः मानसून के महीनों में बढ़ जाती हैं। ऐसे में, तुलसी की जड़ों का लेप उस जगह पर लगाना चाहिए जहाँ कीड़े ने काटा हो।*

*9. गुर्दे की पथरी- जिन लोगों को गुर्दे की पथरी की समस्या है, उन्हें शहद और तुलसी के पत्तों के रस का मिश्रण पीना चाहिए।*

*10. मानसिक तनाव- भागदौड़ भरी ज़िंदगी में मानसिक तनाव भी रोज़मर्रा की बात हो गई है। तनाव मुक्त जीवन जीने के लिए, रोज़ाना 10 से 12 तुलसी के पत्ते खाएँ। तुलसी के पत्ते तनाव दूर करने में एक हथियार की तरह काम करते हैं।*
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1 month ago | [YT] | 22

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*बेल*

भारतीय औषधियों में बेल का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारत के लगभग सभी स्थानों पर इसके पेड़ पाए जाते है। बिल्व की शाखाएं सीधी होती हैं एवं इनमें एक इंच के या बड़े कठोर कांटे होते है। बहुधा डंठलों में *तीन-तीन पत्ते* एक साथ होते हैं। पत्तों का रंग गहरा होता है। एवं सुगन्ध युक्त होते हैं। बसन्त ऋतु के समाप्त होने के बाद पत्ते झड़ जाते हैं एवं चैत्र-वैशाख में नए पत्ते निकलते है, जिनमें 4-5 पंखुड़ियां होती है।

बेल के फल प्रारम्भ में *छोटे गोल* व हरे होते हैं तथा इनमें बीज नहीं होते। बाद में ये धीरे-धीरे बड़े हो जाते हैं। इनके *पीले-पीले गूदे* में कुछ मोटे बीज एवं चारों ओर *चिपचिपा गाढ़ा रस* हो जाता है। बेल की *ऊपरी परत पकने पर कठोर* हो जाती है, साथ ही इसका गूदा भी *गहरा पीला एवं सुगन्ध युक्त* हो जाता है। इसके फल पकने पर पेड़ पर केवल फल ही फल रह जाते हैं, पत्ते बहुधा झड़ जाते हैं। इसकी वन्य और ग्राम्य हो प्रकार की जातियां पाई जाती है । *जंगली बेल में फल छोटा और कांटे अधिक ग्राम्य में फल बड़ा और कांटे कम होते है।*

रासायनिक संगठन की दृष्टि से फलमज्जा में *म्युसिलेज, पेक्टिन, शर्करा, टैनिन,* उड़नशील तेल तिक्त सत्त्व, निर्यास तथा भस्म 2 प्रतिशत होते हैं। इसमें एक और कार्यकारी द्रव्य होता है, जिसे ' *मार्मेलोसिन* ' कहते है। ताजे पत्र से एक विशिष्ट गन्धयुक्त हरा-पोला तेल निकलता है। *बीजों को दबाने से भी हल्के पीले रंग का तेल निकलता है, जिसमें रेचक गुण होता है।* जड़, पत्र और छाल में मुख्यतः कषाय द्रव्य होता है। *काण्ड की भस्म में सोडियम और पोटेशियम के लवण, कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम कार्बोनेट सिलिका आदि होते हैं।* संस्कृत में इसे बिल्व, हिन्दी में बेल, अंग्रेजी में Beal (बेल) तथा लेटिन में इसे इग्ल मार्मेलस कहते हैं।

*100 ग्राम बेल में अनुमानित निम्न पोषक तत्व पाये जाते हैं: पानी- 61.5 ग्राम, प्रोटीन- 1.8 ग्राम, वसा 0.3 ग्राम, रेशा 2.9 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 31.8 ग्राम, कैल्शियम 85 मि.ग्रा., फॉस्फोरस- 50 मि.ग्रा., लौह तत्व- 0.6 मि.ग्रा., केरोटिन- 55 मा.ग्रा... थायेमिन- 0.13 मि.ग्रा., रिबोफ्लोविन- 0.03 मि.ग्रा., नियासिन- 1.1 मि.ग्रा., विटामिन सो- 8 मि.ग्रा., ऊर्जा- 137 कि. कैलोरी। आयुर्वेद में पेट के रोगों के लिए बेलफल को रामबाण औषधि माना गया है।*

गुण-धर्म बेल मूत्र की अधिकता एवं मूत्र शर्करा को कम करने में प्रभावी है। यह *मधुमेह, श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर एवं खूनी बवासीर* में उपयोगी होता है।

कच्चा फल *दीपन, पाचन, लघु, स्निग्ध, कषाय एवं उष्ण* होता है। अन्य फल पकने पर विशेष गुणकारी होते हैं, किन्तु बेल की विशेषता है कि *कच्चे बेल का गूदा अधिक गुणकारी* होता है एवं औषधीय दृष्टि से इसका अधिक प्रयोग किया जाता है। *कच्चा बेल फल मल को बांधने वाला होते हुए भी पाचक होता है।* उदर रोग जैसे संग्रहणी, *आमवात, प्रवाहिका, रक्त प्रवाहका* में विशेष लाभदायक होता है। पका हुआ बेल मधुर रस युक्त, मृदु रेचक, हृदय के लिए हितकारी एवं बलकारी होता है।

बेल कषाय, *कड़वा मलरोधक, रुखा अग्निवर्द्धक, पित्तजनक, वातकफनाशक, बलकारक* , हल्का गरम एवं पाचक है। बेल के पत्ते औषधीय कार्य के लिए अत्यन्त उपयोगी होते हैं। *बेल पत्रों* के सेवन से शरीर में चयापचय कार्य ठीक प्रकार से होता है।

*बेल फल निम्न रोगों में लाभप्रद है*

*कब्ज* (कोष्ठबद्धता) - बेल का गूदा (100 ग्राम) रात को खाने से आँतों का मल मुलायम होकर आसानी से सरककर बाहर आता है। खुश्की अधिक हो, तो इस गूदे को मिश्री मिलाकर सेवन करना चाहिए।

*दस्त, पेचिश आदि में* - सूखी बेलगिरी 50 ग्राम व धनिया 25 ग्राम लेकर कूट पोसकर कपड़छन चूर्ण बना लें, इसमें स्वादानुसार मिश्री मिला लें। इसे 4-5 ग्राम मात्रा में चावल के धोवन के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से खूनी पेचिश, दस्त एवं गर्मी के कारण होने वाले दस्तों में लाभ होता है।

*सूखी बेलगिरी* 25 ग्राम, कत्था (सफेद) 10 ग्राम को कूट पीसकर महीन चूर्ण बना लें। इसमें मिश्री मिलाकर 1-1 ग्राम दिन में तीन-चार बार ताजे पानी के साथ सेवन करने से सभी प्रकार के अतिसार में लाभप्रद होता है।

बच्चों के अतिसार में बेलगिरी के टुकड़े किसी साफ पत्थर पर चन्दन की तरह अर्क सौंफ डालकर घिस लें। चौथाई से आधे चम्मच की मात्रा तक बच्चों को 2-3 बार चटाएं। इसमें जरा-सी चीनी या शहद मिला लें, तो उचित होगा।

*बच्चों के कब्ज, जुकाम* , खाँसी में- बेल पत्तों के रस 4-5 बूंद जरा सा शहद मिलाकर चटाने से लाभ होता है।

*स्त्रियों एवं पुरुषों के यौन रोगों में स्त्रियों के प्रदर रोग,* पुरुषों के प्रमेह, धातु दुर्बलता, स्वप्नदोष आदि सभी में इसका सेवन हितकारी होता है। *बेल पत्रों को सूखाकर चूर्ण* बना लें तथा 2 ग्राम की मात्रा में प्रातः सायं शहद से चाटकर ऊपर से दूध पीएं।

*मधुमेह और बिल्व (बेल) पत्र* - *बेल की ग्यारह पत्तियां* (एक में तीन होती है, जिसे डन्ठल सहित लें) लेकर एक औंस पानी के साथ बारीक पीस लें। तीन कालीमिर्च भी साथ पीस लें और कपड़े से छानकर एक बार पी जाएं। इस प्रकार लगातार 49 दिन पीने से मधुमेह में फायदा होता है।

*बेल की ग्यारह पत्तियां* लेकर थोड़े पानी में बारीक पीसकर कपड़े से छानकर पीएं, प्रतिदिन दो पत्तियां बढ़ाते जाएं। जब पत्तियां 51 हो जाएं तब फिर दो-दो पत्ते कम करते जाएं । इस प्रकार बेल की पत्तियों के सेवन से भी मधुमेह में राहत मिलती है।

*प्रतिदिन बेल के 5 पत्ते, श्यामा तुलसी के 29 पत्ते, नीम के 7 पत्ते व 11 कालीमिर्च चारों को सिल पर घोट-पीसकर एक कटोरी जल के साथ लेने से लाभ होता है* , साथ ही प्रतिदिन 2-3 किलोमीटर पैदल भ्रमण करें। *बेल के 7 पत्ते, 7 कालीमिर्च तथा 7 बादाम गिरी (पानी में भिगोई हुई) को बारीक पीसकर 100 ग्राम पानी में मिलाकर दिन में दो बार पीने से रक्त में शर्करा की मात्रा घट जाती है।*

विशिष्ट योग बिल्व पंचक क्वाथ, बिल्वादि चूर्ण, बिल्वादि घृत, बिल्व तेल। -

*बेलफल की वैज्ञानिकता*

प्राचीनकाल में *कैंसर और एड्स* जैसे असाध्य, एवं खतरनाक रोगों का अस्तित्व नहीं था। ऐसे भयंकर रोगों को कोई अज्ञात आयुर्वेदिक संज्ञा दी गई थी तो उसी के अनुरूप उपचार भी सुलभ था । दैनिक जीवन में दवा के रूप में तथा भोजन में वनस्पतियों को महत्वपूर्ण योगदान था । कोई आश्चर्य नहीं कि बेल जैसी बहुउपयोगी शक्तिशाली आयुर्वेदिक वनस्पति एंटीबायोटिक (एड्सरोधी व कैंसररोधी) गुणों से सम्पन्न होने के कारण जन-जन में प्रचारित और प्रसारित की गई हो ।

*विश्व इतिहास में बेल (* बिल्व) का भारत में बाहर अन्य सभ्यताओं यथा- बेबीलोन सुमेर तथा असीरिया इत्यादि में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। बेबीलोन (बाबेल अथवा बहुबेल), अरबिल, तल बिल्ला, इमगुर बेल, असुर बेल इत्यादि के नामों से स्पष्ट है कि दजलाफरात नदियों के सहारे पली तथा विकसित इन सभ्यताओं द्वारा बेल की महत्ता का जन-जन में प्रचार-प्रसार का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है।

*बेलवृक्ष के विभिन्न अवयव यथा पत्ते,* जड़, छाल तथा फल के औषधीय प्रयोगों का विस्तृत वर्णन आयुर्वेद में पाया जाता है। पेट के रोगों के लिए बेलफल रामबाण औषधि माना गया है। *अर्श (बवासीर), अतिसार, तथा संग्रहणी* की अनेक औषधियों में बेल का महत्वपूर्ण योगदान है इन औषधियों में कुछ के नाम इस प्रकार हैं- *बिल्वपेषिका, बिल्वसौफ क्वाथ, बेल का मुरब्बा, बेल का शरबत, धातक्यादि मोदक, कुटुज चूर्ण कपित्थादि पेया, मसूखदय घृत, बिल्वादि काढ़ा, बिल्वादि योग, बिल्व पेश्यादि काढा, फलादि कल्क, मसूरादि योग, बिल्वाग्रि घृत, बिल्वफलादि चूर्ण तथा बिल्व त्रिफिल रसायन इत्यादि ।* बेलफल, *ज्योतिष शास्त्र* , मंत्र साधना तथा रुद्राक्ष के समन्वित उपयोग के उल्लेख के अनुसार सामाजिक वातावरण को स्वच्छ रखने में सहायक है । यथा- रोड़े अटकाना, मित्र पत्नी के साथ धोखा, गर्भ गिराने जनित पापों से उत्पन्न रोग, वायु दुर्घटना, हड्डी का कैंसर, रक्त कैंसर इत्यादि में शांतिकारक माना जाता है । आधुनिक वैज्ञानिक विश्लेषणों से ज्ञात है कि *बेल फल के सौ ग्राम गूदे में इकसठ ग्राम पानी तथा बत्तीस ग्राम कार्बोहाइडेट या शर्करा पाई जाती है । इसके सौ ग्राम गूदे से एक सौ इकत्तीस कैलोरी ऊर्जा मिलती है। साथ में केरोटिन, थायमिन, नियासिन और रिबोफ्लेबिन विटामिन आदि पाए जाते हैं।* में लोहांश भी मिलता है । उपरोक्त तथ्यों के आधार पर मानव शरीर के लिए बेल को उपयोगिता स्वतः सिद्ध है ।

आज एड्स व कैंसर प्राय: असाध्य रोग माने जाते हैं । कतिपय चिकित्सकों की राय में कैंसर में रेडियोधर्मी सूइयों के द्वारा रोगों का उपचार होता है जो बहुत कष्टप्रद खर्चीला, असहज तथा अस्थायी होता है। कैंसर में रोगी को उच्च शक्ति को एंटीबायोटिक दवा के साथ-साथ विटामिन तथा लोहांश दिया जाता है। अकेला एंटीबायोटिक शरीर में जहां कैंसर के रोग-ग्रस्त तन्तुओं व कोशिकाओं का इलाज होता है, वहीं शरीर के उपयोगी तन्तु और कोशिकाएं भी नष्ट हो जाती है जो कि रोगी के लिए बहुत घातक होती है ।

*एंटीबायोटिक* के साथ विटामिनों को रोगी को दिया जाना अनिवार्य माना जाता है। एंटीबायोटिक बन्द करने के उपरान्त भी विटामिनों का अनवरत दिया जाना जारी रहता है। तथा इससे कैंसर के उपचार में सहायता मिलती है । बेल फल में बेलपत्र के ज्ञातगुणों की उपयोगिता को कैंसर के उपचार के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो अनेक प्रकार के विटामिनों तथा लोहांश रेडियोधर्मी ऊर्जा के समकक्ष गुणों से युक्त बेलवृक्ष को प्राकृतिक वरदान ही कहा जोगा। *कैंसर के उपचार* में बेल को आधार मानकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान प्रयास करें तो विश्वास है कि परिणाम उत्साहवर्धक ही होंगे। पीड़ित मानवता को बहुआयामी सहायता मिलेगी ।

*एड्स* (ऐ वायर्ड इम्यूनो डैफीशियेंसी सिंड्रोम) अथवा एच. आई. वी. (हयून इम्यूनो डैफीशियेंसी वाइरस) आज विश्व का सर्वाधिक भयंकर रोग है । आज तक वैज्ञानिक अथवा चिकित्सक इस रोग का सम्पूर्ण समाधान उपचार नहीं ढूंढ पाए हैं। आज भी इस दिशा में प्रयास जारी हैं। एड्स के रोगों के अलग - अलग कुप्रभाव के अनुरूप उनका वर्गीकरण किया गया है। इसमें *मस्तिष्क रोग* भी शामिल है। बेल में ओज की मात्रा, परारासायनिक तथा *पागलपन* के उपचार जैसे निहित गुणों के द्वारा एड्स की रोकथाम तथा उसके सफल उपचार की ओर प्रयास किए जाएं तो बहुत संभव है कि एड्स के उपचार का सरल समाधान निकल जाए ।

सारतः यही कहा जा सकता है कि भारत की प्राचीनकाल से चली आ रही वनस्पतियों पर आधारित स्वस्थ जीवनचर्या में बेलफल का विशिष्ट स्थान है । *ग्रीष्म ऋतु में बेलफल* प्राय: सहज-सुलभ फल है। इसके उपयोग की महत्ता के अनुरूप दैनिक जीवन में इसे उचित स्थान दिया जाना चाहिए ।

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1 month ago | [YT] | 10

NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel

*आम*

आमों के उत्पादन में विश्व भर में भारत का प्रथम स्थान है। समूचे विश्व में होने वाले आम उत्पादन का *63* प्रतिशत से भी ज्यादा हमारे यहां पैदा होता है। आम उत्पादन में दूसरा स्थान *मैक्सिको* का और तीसरा स्थान *पाकिस्तान* का है। हमारे देश में लगभग सभी स्थानों पर आम की पैदावर होती है। उत्तर प्रदेश में 34.47 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश 19.09 प्रतिशत, बिहार 13.44 प्रतिशत, उड़ीसा 8.22 प्रतिशत और कर्नाटक 5.07 प्रतिशत में आम का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है।

आम का वानस्पतिक नाम मँगोफेरा इण्डिका है। हमारे यहां आमों की कोई एक हजार से भी ज्यादा किस्में पाई जाती हैं। आमों की कुछ लोकप्रिय एवं मुख्य किस्म- *लंगड़ा, चौसा, दशहरी, तोतापरी, नीलम, बादाम और हापुस* हैं। इसके अलावा *उत्तर प्रदेश का अंगूरा, बहराइच, खासुलखास, शराफा, करेला, नीमचढ़ा, चितला, महाराष्ट्र का हाफुस, पंजाब का मालदा, बिहार का किशनभोग, गुलाखास, बंगाल का बम्बई भुट्टो, तमिलनाडु का बंगलोटी* भी काफी अच्छी किस्म के आम माने जाते हैं। भारत के हर प्रदेश में आम की अपनी एक विशिष्ट किस्म और पहचान है।

पका आम रासायनिक तत्वों से भरपूर होता है। *100 ग्राम पके हुए आम में अनुमानित खाद्य निम्न होते हैं: जल- 81 ग्राम, प्रोटीन 0.6 ग्राम, वसा 0.4 ग्राम, रेशा 0.7 ग्राम, कार्बोज- 16.9 ग्राम, फैल्शियम- 14 मि. ग्रा., फॉस्फोरस- 16 मि. ग्रा., लौह तत्व - 13 मि. ग्रा., कैरोटीन- 2743 मा. आ. थायमीन 0.08 मि.ग्रा., राइबोफ्लेविन - 0.09/2 ग्रा., नियासीन- 0.9 मि. ग्रा, विटामिन सी - 16 मि. ग्रा., ऊर्जा- 74 कि. कैलोरी, लवण- 0.4 मि. ग्रा.*

आम को औषधि के रूप में भी प्रयुक्त किया जाता है। *क्षय रोग, नेत्ररोग, स्कव रोग, पेट सम्बन्धी रोगों उच्च रक्त चाप, पैप्टिक अल्सर, पीलिया, कब्ज* आदि रोगों में इसका सेवन बहुत लाभदायक है। *कच्चा आम का पानी तो लू लगने पर रामबाण औषधि* है। खन की कमी वाले रोगियों के लिए आम का सेवन करना बहुत लाभदायक सिद्ध हुआ है। गौरवर्ण के इच्छुकों को भी इसका सेवन करना चाहिए, क्योंकि यह त्वचा का रंग साफ करता है। बवासीर में भी आम और दूध का प्रयोग कष्ट निवारक होता है।

कच्चे आम में तो वह ताकत है कि गुर्दे की पथरी तक को गला देता है। तिल्ली की गड़बड़ियों को ठीक करने का गुण भी कच्चे आम में है। इसके पत्तों को जलाकर इसको राख को घाव पर लगाने से घाव जल्दी भर जाता है। इसी प्रकार इसके *पेड़ की छाल का काढ़ा बनाकर बारीक कपड़े से छान कर घाव पर लगाने से भी घाव थोड़े समय में ही भर जाता* है।

आम तो आम, उसकी गुठली भी उपयोगी है। सचमुच गुठली के दाम बाजार में मिलते हैं। *कई दवा कम्पनियाँ आमों की गुठलियाँ खरीदती हैं व उनसे दवाइयाँ बनाती* हैं। आम को काटकर खाया जाता है। कुछ आमों को चूसा भी जाता है। पहले तो रस बनाने और काट कर खाने वाले आम अलग-अलग आते थे लेकिन जब से मिक्सी का प्रवेश हमारे किचन में हुआ, तब से काटने वाले कलमी आमों का रस घरों में बनने लगा है। आम चाहे काटकर खाएं या चूसकर अथवा उसका रस बनाएं सभी का अपना एक अलग स्वाद और आनन्द है। आम से आमपाक नामक मिठाई भी बनाई जाती है, जो काफी स्वादिष्ट लगती है।

देखा गया है कि आम की गुणवत्ता में मुख्य दोष उसे तोड़ने के गलत तरीकों के कारण आता है। इसलिए इस काम के लिए खास उपकरणों के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। किसानों को शिक्षित करने के लिए आमों की हिफाजत के लिए नियमावली भी तैयार हो और उसके अनुसार किसानों को आम तोड़ने और उसकी सार-संभाल के आधुनिक तरीकों के संबंध में प्रशिक्षित किया जाए। गुजरात भी आम के उत्पादन में पीछे नहीं रहा।गुजरात के अंदर भी बादाम,आफूस ओर गुजरात का सब से बढ़िया आम जो है वो केशर आम है।जो गुजरात के वापी,वलसाड,जूनागढ़,गिर, तलाला,ओर सब से प्रख्यात आम जो है वो कच्छ का केशर आम है।जिसका हम लोग हर साल केशर आम का नॉर्थ गुजरात शिद्धपुर में शिविर लगवाते है,ओर भारत भर में से लोग आते ही ओर खुश होते है।

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1 month ago | [YT] | 14

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*अखरोट*

अखरोट का नाम जुबान पर आते ही *मुंह में पानी* आ जाता है। अखरोट सूखे मेवों में से एक है। यह प्राय: काबुल, हिमाचल, कश्मीर, मणिपुर में बहुत अधिक मात्रा में मिलते हैं। इसका वृक्ष लगभग 60 से 90 फुट ऊंचा होता है। अखरोट दो प्रकार का होता है। इस वृक्ष की लकड़ी बहुत ही मजबूत और भूरे रंग की होती है।

आयुर्वेद की दृष्टि से हम देखें तो अखरोट स्वाद में मोठा हल्का खट्टा, चिकना, वीर्य बढ़ाने वाला, गर्म व रविदायक है। *कफ, पित्त को करने वाला, पचने में भारी और कोड़ों का नाश करने वाला है।* यह वायु और पित्त को शांत करता है। टी. *बी., हृदय रोग, खून की खराबी, दाद को दूर करने वाला होता है।*

इसका छिलका कोड़ों का नाश करता है और दस्तावर है। इसके पत्ते संकोचन करने वाले व पौष्टिक है। *गठिया की बीमारी* में इसका फल फायदेमंद रहता है। *भुना* *हुआ अखरोट [देशी घी में) सदी से होने में फायदेमंद है।*

*मुंह के लकवे में इसके तेल की मालिश करके दशमूल क्वाथ या शस्त्रादि का बफारा लेना चाहिए।* गाय के मूत्र में 10 ग्राम से 50 ग्राम तक अखरोट का तेल मिलाकर पीने से शरीर की सूजन उत्तर जाती है। *इसको छाल का काढ़ा पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।*

सर्दी के मौसम में सवेरे अखरोट की निशास्ता या पेय बनाकर पीना चाहिए। इससे दिमाग बहुत अच्छा हो जाता है। नोंद बहुत सुखद आती है। कब्ज भी दूर होती है तथा चेहरे की कान्ति में चार चांद लग जाते हैं, इसके साथ यह वीर्य पुष्टिकर एवं वृद्धि करने वाला योग भी है।

1 month ago | [YT] | 13