स्वागत है आप सभी का मेरे इस youtube channel "We make youth aware" में। इस channel को बनाने का उद्देश भारत के लोगो को खास कर युवा पीढ़ी को असली अध्यात्म से परिचय कराना हैं। आज भारत का युवा सबसे ज्यादा भटका हुआ हैं। अध्यात्म ही सभी क्षेत्रों का आधार होता हैं। इसी आधार को हमे मजबूत करना हैं।
We make youth aware.
दक्षिण फ्रांस के जंगलों में लगी भीषण आग का कारण वैज्ञानिक क्लाइमेट चेंज बता रहे हैं।
अब इस भीषण आग के कारण जो पेड़ जल रहे हैं उनसे कार्बन डाइऑक्साइड जैसी और ग्रीनहाउस गैस निकल रही है, जो क्लाइमेट चेंज को और ज्यादा गहरा रही है।
ऐसी ही साइकिल और भी क्षेत्रों से जुड़ी हुई है। जैसे बर्फ का पिघलना। भारत में भी इस समय क्लाइमेट चेंज के कारण ही बाढ़ जैसी समस्या बनी हुई है जिससे जन, धन पशु हर एक चीज की हानि हो रही है।
इस क्लाइमेट चेंज का दुष्प्रभाव कितना घातक होगा आने वाले समय में इस पर आचार्य प्रशांत हमें पिछले एक दशक से लगातार सावधान कर रहे हैं, लगातार चेता रहे हैं। लेकिन न आम जनमानस इस चीज को समझ पा रहा है और न ऊंचे पदों पर बैठे नेता, राजनेता, मंत्री, उद्योगपति और न ही तुम्हारी सेलिब्रिटी।
###
वैसे वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि अब क्लाइमेट चेंज को रोकना बहुत मुश्किल है। इस पर आचार्य प्रशांत लगातार हमें क्या बता रहे हैं उस पर भी हम एक बार बात करते हैं।
इस वीडियो को पूरा देखे।
https://youtu.be/GSyJLGCSC2o?si=yJ4tY...
अभी भी नहीं समझे रो भी नहीं पाओगे।
आचार्य प्रशांत #climatechange #Operation_2030 #acharyaprashant
10 months ago | [YT] | 0
View 0 replies
We make youth aware.
कुछ दिनों से मैं रिपोर्ट्स पढ़ रहा था आत्महत्या को लेकर और उन आत्महत्याओं के संदर्भ में मुझे यह पता चला कि 9 से 10 फ़ीसदी जो होती है वह संबंध टूटने के कारण ही होती हैं संबंध उनके पीछे ही जिम्मेदार है तो इस पर ही मैंने कुछ लिखा है कि क्यों संबंध जो है वह इस तरीके से दूषित होते हैं।................यह जो स्थिति है यह हो रही है समाज में। हम पढ़ रहे हैं हम देख रहे हैं तो इस पर मैंने यह सब लिखा है..---
चार पन्नों का एक लेटर लिखकर ।। चार पन्नों का एक लेटर लिखकर,
एक फंदे से वह झूल गया,
गिनकर सारी मजबूरी के किस्से,
इस दुनिया को अलविदा कह गया। बेशक, माँ का लाड़ला और पिता का सहारा था,
भाई का आदर्श और बहन का भी दुलारा था। कामनाओं की गठरी इतनी भारी,
कि अपना ही ख्याल भूल गया।
हाँ, वह एक फंदे से झूल गया। ### **क्यों लाया था पत्नी घर में?
** ज़रा सुनिए, उसकी मानसिकता के बारे में— **"हाँ, तुम्हें इसलिए लाया हूँ..."**
जब जाऊँगा ऑफिस, तो नाश्ता तुम बनाओगी,
दोपहर को आऊँगा, तो लंच तुम खिलाओगी। कपड़े धोओगी, उनमें प्रेस करोगी,
शाम को आऊँगा, तो चाय-कॉफी पिलाओगी।
रात का खाना खाकर, अपनी भूख मिटाऊँगा,
और बची भूख तुम्हारी देह से बुझाऊँगा।
सुबह की चाय के साथ मेरी नींद खुलवाओगी,
नहाना होगा, तो पानी लेकर आओगी।
हाँ, मैं तुम्हें इसलिए लाया हूँ...
माँ-बाप की सेवा करके स्वर्ग का फल तुम पाओगी,
ना रहा मेरा सहारा, तो घर का सहारा तुम बन जाओगी।
सच कहूँ—ऊपर के सारे काम तो महज़ बहाने थे,
मुझे तो तुमसे बस अपना कुल-कुनबा बढ़वाने थे।
### **और फिर...** उम्र ढल गई तुम्हारी, अब तुममें रस आता नहीं,
सोचा, छोड़ दूँ तुम्हें, पर यह समाज को भाता नहीं। ना रहने का साथ अब, द्वंद्व यहीं से शुरू हो जाता है,
या तो मैं फाँसी लगा लेता हूँ,
या फिर तुम टुकड़ों में बाँट दी जाती हो।
**हाँ, चार पन्नों का एक लेटर लिखकर,
एक फंदे से वह झूल गया,
गिनकर मजबूरी के किस्से,
दुनिया से अलविदा कह गया।** ---
आचार्य जी की शिक्षाएं क्यों हर एक इंसान तक पहुंचे हर एक युवा तक पहुंचे। यह बात आप सब पढ़कर समझ ही गए होगे।हम सब का प्रयास यही होना चाहिए की कैसे भी हम करें। हम ज्यादा से ज्यादा लोगों को आचार्य जी की शिक्षाओं से जोड़ें क्योंकि बस यही एक तरीका हैं ,यही एक उपाय अब इस विनाश को रोक सकता हैं।👏👏👏🪔🪔
1 year ago | [YT] | 2
View 0 replies
We make youth aware.
आचार्य प्रशांत की अद्वितीय शैली है कि वे विनम्रता और प्रमाणों के साथ किसी को भी समझा सकते हैं। उनकी विनम्रता और तर्कों से भरी बातचीत हर मुद्दे पर प्रभावी होती है, जो उनकी महानता को दर्शाती है। ऐसे महापुरुष की पूरे विश्व को आवश्यकता है। @ShriPrashant
1 year ago | [YT] | 1
View 0 replies
We make youth aware.
कल वो दर्द महसूस हुआ जिस दर्द को आप (आचार्य जी)हर क्षण,हर पल महसूस करते हैं।🤕✍️
कल जन्माष्टमी(26/Aug/2024) के अवसर पर प्रयागराज में बलुआघाट इस्कॉन टेंपल के पास सभी योद्धाओं ने मिलकर बुक स्टॉल लगाया।
जब आचार्य जी को सुनना शुरू ही किया था तब ऐसा लगता था कि जो बातें आचार्य जी बोल रहे हैं वो कैसे सही हो सकती हैं?धीरे धीरे बाते समझ तो आने लगीं थी। आचार्य जी से सुना भी हैं कि जिस समाज के लिए, जिन कमजोरों के लिए, जिन पीड़ितों और सताए हुए लोगों के लिए, मार्ग से फटके युवाओं के लिए जो लड़ाई आचार्य जी लड़ रहे उस में सबसे बड़ी बाधा ये सब स्वयं बनकर आगे खड़े हो जाते हैं ये स्वयं नहीं चाहते कि हमारा कल्याण हो।
इस बात को प्रमाणित होते हुए कल अपनी आंखो से देखा।
जिस देश का दर्शन गिर जाता है उस देश में जन्माष्टमी जैसे पवन पर्व पर इतनी अश्लीलता और नग्नता देखने को मिले इसमें कोई हैरान होने वालीं बात नहीं है।
कल लोग बड़ी संख्या मंदिर में आ तो रहे थे लेकिन ना उन्हें कृष्ण से कुछ मतलब है ना कृष्णतत्व से उन्हें सिर्फ मतलब है भोग से। यदि उन्हें वास्तविक कृष्ण से परिचित कराने की कोशिश की जाती है तो उन्हें 440 वोल्ट का झटका लगता है।कल जब हम लोगों ने बुक स्टॉल लगाया तो लोग हर एक चीज में मग्न थे कृष्ण के नाम पर बने अश्लील गानों पर झूममें में व्यस्त थे। एक दूसरे के गले में हाथ डालकर बैठने में व्यस्त थे। इस प्रकृति में उन्हें जो भी दिख रहा था उसे भोगने में व्यस्त थे। हर एक वह चीज जिससे प्रेम का रिश्ता होना चाहिए उससे भोग का रिश्ता बनाकर उसमें रुचि दिखा रहे थे। वह अछूते थे तो सत्य से, वह अछूते थे तो वास्तविक धर्म से, वह अछूते थे उनके अंदर की जिज्ञासा से।कल पहली बार लगा कि हिंसा हमारे साथ हो रही है शोषण हमारे साथ हो रहा है हमारी आवाज दवाई जा रही है। डीजे की चीख इतनी तेज थी कि हमारी आवाज को काट रही थी। वहां पर जिस प्रकार का माहौल था मानो सत्य के विरूद्ध खड़ा था लेकिन हम भी लड़ते रहे 🪔...जैसा ही आप video में देख सकतें हैं जोर जोर से चल रहे गानों के बीच हमनें भी अपना काम शुरू कर दिया 🪔❣️।रक्षाबंधन पर घर, परिवार, रिश्तेदारों के बीच में और कल बुक स्टॉल के आस पास का जो माहौल देखा उससे एक बात स्पष्ट बहुत अच्छे से हो गईं हैं कि सिर्फ और सिर्फ एक उद्देश हैं कि जो गंदगी समाज में फैली हैं उसे साफ करना ही करना हैं। लोगों तक गीता का विशुद्ध अर्थ पहुंचाना, लोगों को असली धर्म से परिचय कराना उतना ही जरूरी हैं जितना कि हमारे फेफड़ों के लिए शुद्ध oxygen जरूरी हैं।🪔
सूरा के मैदान मे, कायर का क्या काम
सूरा सो सूरा मिलै तब पूरा संग्राम।
____________कल मदहोश लोगों के झुंड में कुछ होशमंद लोगों से भी मुलाकात हुई। जिनसे बात करके पूरी थकान ही दूर हो गई। ❣️❣️☘️ पहले सज्जन तो आपको इस वीडियो में ही दिख जाएंगे जो उन गानों पर नहीं नाच रहे जिस पर दुनिया नाच रही है। छोटे से सज्जन कबीर साहब के दोहे पर ताली दे दे के नाच रहे हैं मानो यह हमें यह संकेत दे रहे हैं कि जहां असत्य का प्रचार प्रसार होता है वहां भीड़ बहुत होती है और जहां सत्य का प्रचार प्रसार होता है वहां कुछ ही आते हैं।☘️ एक सज्जन को जब आचार्य जी की शिक्षा से अवगत कराया तो इतने भावुक हो गए... मुझे लगा रोने न लगें 😀। हो भी क्यों ना अगर कोई बहुत ही कष्टों में हैं और उसे पता चल जाएं कि इन कष्टों से निकला कैसे जाता हैं तो भावुक होना प्राकृतिक हैं।
जाते जाते वो यहीं बोले..."आप लोगों का बहुत बहुत धन्यवाद 👏 आचार्य जी की शिक्षा को हम सभी के बीच पहुंचाने के लिए।☘️ कुछ लोकल के भी थे... कुछ इस तरह , हाथ में सिगरेट...मुंह में पान.. लुंगी लपेटे आए... "हम भी सुनते हैं आचार्य जी को"... हमने कहा अच्छा है कुछ बात हुए.. बाद में वो दो book भी ले गए। दुःख इस बाद का हैं हमें की हम उनसे कुछ बात नहीं कर पाए 😔😔... उनसे हमें पूछना यहीं था कि उच्च शिक्षा लेने के बाद भी आप अपनी आदतों के गुलाम क्यों हैं?अंत में जो समझ आया वो यहीं की...सूरा नाम धराए के, अब क्यों डरना वीर।
अड़े रहना मैदान में, सम्मुख सहना तीर।। कबीर साहिब 👏👏बुक स्टॉल पर अपना योगदान देने आए हर एक योद्धा में जो ऊर्जा रहती है जो होश रहता है जो जुनून रहता है जो साहस रहता है जो निडरता रहती है सत्य के प्रचार प्रसार को करते समय यह सब हमारे अंदर सिर्फ और सिर्फ आचार्य जी आपकी ही शिक्षा के माध्यम से आया है आपकी शिक्षा के बिना यह संभव ही नहीं था।👏👏👏👏❣️❣️❣️🪔। @ShriPrashant
1 year ago | [YT] | 4
View 0 replies
We make youth aware.
उपनिषद काल में नारी जितनी स्वतंत्र थी, आज थी उसके पीछे का कारण हैं शिक्षा। उस समय लोग भावनाओं के तल पर नहीं, विचारों के तल पर जीत थे। नारी को भी इन्सान समझते थे भोग की वस्तु नहीं।
पूरा वीडियो अवश्य देखें 👏🪔
@ShriPrashant
1 year ago | [YT] | 1
View 0 replies
We make youth aware.
सब एक से पैदा होते हैं अपनी अपनी जान लगाकर सब आगे बढ़ते चले जाते हैं ~ @ShriPrashant
1 year ago | [YT] | 0
View 0 replies
We make youth aware.
🚨🚨2025 तक 1.8 अरब लोग जल संकट का सामना करेंगे।🚨🚨
कौन से उद्योग सबसे अधिक पानी की खपत करते हैं और हमें इसकी परवाह क्यों करनी चाहिए?
कौन से उद्योग सबसे अधिक मात्रा में जल का उपभोग करते हैं?
कृषि
फ़ैशन उद्योग
ऊर्जा उद्योग
मांस उद्योग
पेय उद्योग
निर्माण, खनन और कार उद्योग
जल एक अमूल्य संसाधन है
जल संकट का मुद्दा
पृथ्वी पर बहुत पानी है - हमारे ग्रह की सतह का 71% हिस्सा पानी से ढका हुआ है। हालाँकि, हमारे बुनियादी अस्तित्व की ज़रूरतों के लिए मीठे पानी की मात्रा दुनिया के पानी का केवल 3% है। इसमें से ज़्यादातर मीठा पानी अनुपलब्ध है, क्योंकि यह ग्लेशियरों, ध्रुवीय बर्फ की टोपियों, वायुमंडल और मिट्टी में मौजूद है। इससे हमारे पास पृथ्वी के 0.5% पानी का ताज़ा और उपयोग के लिए तैयार पानी बचता है। नतीजतन, हमारे नीले ग्रह पर दो-तिहाई लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं जहाँ मीठे पानी की पहुँच एक समस्या है। पानी की कमी हर महाद्वीप को प्रभावित करती है और परिणामस्वरूप, 1.1 बिलियन लोगों के पास पानी तक पहुँच नहीं है। 2025 तक, यह संभव है कि दुनिया की लगभग आधी आबादी पानी की कमी वाले क्षेत्रों में रहेगी। अगले दशक के भीतर, लगभग 700 मिलियन व्यक्तियों को गंभीर जल संकट के कारण स्थानांतरित होने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इसके अलावा, 2040 तक, दुनिया भर के लगभग एक चौथाई बच्चों के अत्यधिक जल दबाव वाले स्थानों पर रहने की उम्मीद है। यह मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन, बढ़ती जनसंख्या और भूमि उपयोग परिवर्तन का परिणाम है ।
पानी की कमी
2025 तक 1.8 अरब लोग जल संकट का सामना करेंगे।
कौन से उद्योग सबसे अधिक मात्रा में जल का उपभोग करते हैं?
सभी उद्योगों का एक निश्चित जल पदचिह्न होता है। हालाँकि, आइए उन उद्योगों पर नज़र डालें जिन्हें सबसे ज़्यादा मात्रा में मीठे पानी की ज़रूरत होती है।
कृषि
दुनिया के 70% मीठे पानी का उपयोग कृषि के लिए किया जाता है। यूरोप में, इस क्षेत्र को 44% मीठे पानी के संसाधनों की आवश्यकता होती है। यह सिंचाई, उर्वरक और कीटनाशक के प्रयोग, फसल को ठंडा करने और ठंढ नियंत्रण के लिए कृषि के पानी के उपयोग के कारण है। कृषि में उपयोग किए जाने वाले उर्वरकों और कीटनाशकों के परिणामस्वरूप, यह जल प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत भी है ।
कृषि उद्योग के लिए पानी
कृषि में विश्व के 70% ताजे जल का उपयोग होता है।
जब सबसे ज़्यादा प्यास वाली फसलों की बात आती है , तो गेहूं, मक्का, चावल, कपास और गन्ना सबसे आगे होते हैं। मेवे भी चिंता का विषय हैं, खासकर इसलिए क्योंकि 7.4 % सिंचित मेवे पानी की कमी वाले क्षेत्रों में उगाए जाते हैं, जैसे भारत, चीन, पाकिस्तान, भूमध्यसागरीय क्षेत्र और अमेरिका।
फ़ैशन उद्योग
फैशन उद्योग द्वारा खपत किया जाने वाला पानी
जैसा कि हमने पहले और अधिक विस्तार से बताया, जल प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत होने के अलावा, फैशन उद्योग भी काफी मात्रा में मीठे पानी का उपयोग करता है। फैशन उद्योग द्वारा प्रतिवर्ष उपयोग किए जाने वाले 79 बिलियन क्यूबिक मीटर मीठे पानी ने इसे दुनिया में दूसरा सबसे अधिक पानी की खपत करने वाला उद्योग बना दिया है। इसका मुख्य कारण कपास की उच्च जल मांग है, जो हमारे कपड़ों में मुख्य सामग्री है। एक जोड़ी जींस बनाने में 7,000 लीटर पानी लगता है , जो एक व्यक्ति 5-6 साल में पीता है। एक टी-शर्ट के लिए 2,700 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जो एक व्यक्ति को लगभग 3 साल तक प्यास से दूर रखने के लिए पर्याप्त है।
ऊर्जा उद्योग
ईएस स्पैंग एट अल. (2014) द्वारा किए गए एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि दुनिया के ऊर्जा उत्पादन में हर साल लगभग 52 बिलियन क्यूबिक मीटर ताजे पानी की खपत होती है। पानी की यह महत्वपूर्ण मात्रा मुख्य रूप से बिजली संयंत्रों से आती है, जिन्हें अपनी शीतलन प्रक्रियाओं के लिए इसकी आवश्यकता होती है। यह तकनीक जीवाश्म ईंधन और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की विशेषता है। इसके अलावा, गन्ना और रेपसीड जैसी जैव ऊर्जा फसलें पौधों की खेती के लिए बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग करती हैं। उनके द्वारा उत्पन्न इथेनॉल या बायोडीजल को संसाधित करने के लिए भी कुछ उच्च मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। यह पवन और सौर जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर संक्रमण को गति देने का एक और कारण है।
मांस उद्योग
आम तौर पर, मांस, डेयरी और अंडे जैसे पशु उत्पाद फलों और सब्जियों की तुलना में उच्च पर्यावरणीय प्रभावों से जुड़े होते हैं। इसमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, भूमि उपयोग में बदलाव और पानी का उपयोग के बड़े स्तर शामिल हैं । मांस उत्पादन एक अलग उद्योग है, लेकिन हमें याद रखना होगा कि यह कृषि से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। कुछ अनुमान कहते हैं कि कृषि के लिए उपयोग किए जाने वाले मीठे पानी का एक तिहाई मांस उत्पादन का परिणाम है। बीफ हमारी प्लेटों पर अब तक का सबसे अधिक पानी वाला भोजन है, इसके बाद भेड़, सूअर का मांस , बकरी, मुर्गी, अंडे और पनीर का स्थान आता है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि अन्य स्रोतों में नट्स शामिल हैं जो खाद्य उद्योग में दूसरे सबसे बड़े जल उपभोक्ता हैं। 1 किलोग्राम बीफ का उत्पादन करने के लिए 15,000 लीटर पानी लगता है और 1 किलोग्राम भेड़ के मांस को हमारी मेज तक लाने के लिए 10,000 लीटर से अधिक पानी लगता है।
पेय उद्योग
पेय उद्योग पर्यावरण गोलमेज के अनुसार , 19 कंपनियों ने 2017 में कुल 746 बिलियन लीटर पानी के उपयोग की सूचना दी। यह एक वर्ष में 1,081 मिलियन से अधिक लोगों के पीने के लिए पर्याप्त होगा । इसलिए चीजों को परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए, 19 पेय कंपनियों द्वारा उपयोग किया जाने वाला पानी उन लोगों की प्यास बुझाने के लिए पर्याप्त होगा जिनके पास पानी तक पहुंच नहीं है। हालांकि, यह रिपोर्ट केवल उद्योग के जल पदचिह्न के एक बहुत ही सीमित हिस्से को ध्यान में रखती है: उत्पादन प्रक्रियाओं में उपयोग किया जाने वाला पानी, न कि पेय पदार्थों के लिए आवश्यक पानी की पूरी मात्रा (सामग्री की खेती से लेकर बोतलों के निर्माण तक)। आवश्यक सामग्री उगाने से लेकर पैकेजिंग तक पेय पदार्थों में जाने वाले सभी पानी को देखते हुए, कम से कम कहें तो मूल्य आश्चर्यजनक हैं। एक लीटर सोडा का उत्पादन करने के लिए 350 लीटर पानी लगता है ,
निर्माण, खनन और कार उद्योग
अंत में, इन तीनों उद्योगों द्वारा पानी की खपत के बारे में कुछ विचारोत्तेजक तथ्य दिए गए हैं। यूरोप में , खनन और उत्खनन उद्योग लगभग 4% पानी की खपत के लिए जिम्मेदार है, जबकि निर्माण उद्योग लगभग 3.4% के लिए जिम्मेदार है। एक कार बनाने में लगभग 148,000 लीटर पानी लगता है। एक टायर बनाने में केवल 2,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है । ट्रीहगर के अनुसार , एक टन सीमेंट के लिए 5,100 लीटर से अधिक पानी की आवश्यकता होती है, जबकि एक टन स्टील के लिए लगभग 235,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। लकड़ी के एक बोर्ड को बढ़ने में 20 लीटर पानी लगता है। 2030 बिल्डर्स विश्व दिवस की भागीदारी में आपकी यात्रा पर आपका मार्गदर्शन कर सकते हैं!
एक कार बनाने के लिए पानी
एक कार के निर्माण में लगभग 148,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।
2 years ago | [YT] | 6
View 0 replies
We make youth aware.
🚨जलवायु परिवर्तन 🚨🚨
बढ़ते कारनामो के कारण
जीवाश्म ईंधनों का जलाना, वनों को काटना और पशुपालन से जलवायु और पृथ्वी के तापमान पर तेजी से प्रभाव पड़ रहा है।इससे वायुमंडल में प्राकृतिक रूप से मौजूद ग्रीनहाउस गैसों में भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें जुड़ जाती हैं, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ जाती है।ग्लोबल वार्मिंग
2011-2020 सबसे गर्म दशक दर्ज किया गया, जिसमें वैश्विक औसत तापमान 2019 में पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 1.1 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच गया। मानव-प्रेरित ग्लोबल वार्मिंग वर्तमान में प्रति दशक 0.2 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ रही है।औद्योगिक काल से पूर्व के तापमान की तुलना में 2°C की वृद्धि प्राकृतिक पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य एवं कल्याण पर गंभीर नकारात्मक प्रभावों से जुड़ी है, जिसमें वैश्विक पर्यावरण में खतरनाक और संभवतः विनाशकारी परिवर्तन होने का जोखिम भी शामिल है।इस कारण से, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे रखने तथा इसे 1.5°C तक सीमित रखने के प्रयास जारी रखने की आवश्यकता को पहचाना है।
ग्रीनहाउस गैसों के कारणजलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण ग्रीनहाउस प्रभाव है। पृथ्वी के वायुमंडल में कुछ गैसें ग्रीनहाउस में लगे शीशे की तरह काम करती हैं, जो सूर्य की गर्मी को रोककर उसे अंतरिक्ष में वापस जाने से रोकती हैं और ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनती हैं।इनमें से कई ग्रीनहाउस गैसें प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होती हैं, लेकिन मानवीय गतिविधियों के कारण वायुमंडल में इनमें से कुछ की सांद्रता बढ़ रही है। विशेष रूप से:कार्बन डाइऑक्साइड ( CO2 )
मीथेन
नाइट्रस ऑक्साइड
फ्लोरीनयुक्त गैसें
मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न CO2 ग्लोबल वार्मिंग में सबसे बड़ा योगदानकर्ता है। 2020 तक, वायुमंडल में इसकी सांद्रता अपने पूर्व-औद्योगिक स्तर (1750 से पहले) से 48% अधिक हो गई थी ।अन्य ग्रीनहाउस गैसें मानवीय गतिविधियों के कारण कम मात्रा में उत्सर्जित होती हैं। मीथेन CO 2 की तुलना में अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है , लेकिन इसका वायुमंडलीय जीवनकाल कम है। CO 2 की तरह नाइट्रस ऑक्साइड भी एक लंबे समय तक रहने वाली ग्रीनहाउस गैस है जो दशकों से लेकर सदियों तक वायुमंडल में जमा होती रहती है। गैर-ग्रीनहाउस गैस प्रदूषक, जिनमें कालिख जैसे एरोसोल शामिल हैं, के अलग-अलग वार्मिंग और कूलिंग प्रभाव होते हैं और ये खराब वायु गुणवत्ता जैसे अन्य मुद्दों से भी जुड़े होते हैं।अनुमान है कि प्राकृतिक कारणों, जैसे सौर विकिरण या ज्वालामुखीय गतिविधि में परिवर्तन, ने 1890 और 2010 के बीच कुल तापमान में 0.1°C से कम या अधिक की वृद्धि की है।
बढ़ते उत्सर्जन के कारण
कोयला, तेल और गैस को जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड उत्पन्न होते हैं।वनों को काटना (वनों की कटाई)। पेड़ वातावरण से CO2 को अवशोषित करके जलवायु को नियंत्रित करने में मदद करते हैं । जब उन्हें काट दिया जाता है, तो वह लाभकारी प्रभाव खत्म हो जाता है और पेड़ों में जमा कार्बन वातावरण में छोड़ दिया जाता है, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव बढ़ जाता है।पशुपालन में वृद्धि। गाय और भेड़ें अपना भोजन पचाते समय बड़ी मात्रा में मीथेन उत्सर्जित करती हैं।नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों से नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन होता है।फ्लोरीनेटेड गैसें उन उपकरणों और उत्पादों से निकलती हैं जिनमें इन गैसों का इस्तेमाल होता है। ऐसे उत्सर्जन का बहुत ज़्यादा वार्मिंग प्रभाव होता है, जो CO2 से 23 000 गुना ज़्यादा होता है ।
जलवायु परिवर्तन का मुकाबला
चूँकि उत्सर्जित CO2 का हर टन ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देता है, इसलिए सभी उत्सर्जन में कमी इसे धीमा करने में योगदान देती है। ग्लोबल वार्मिंग को पूरी तरह से रोकने के लिए, CO2 उत्सर्जन को दुनिया भर में शून्य तक पहुँचना होगा। इसके अलावा, मीथेन जैसी अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने से भी ग्लोबल वार्मिंग को धीमा करने में शक्तिशाली प्रभाव पड़ सकता है ।जलवायु परिवर्तन के परिणाम अत्यंत गंभीर हैं, और हमारे जीवन के कई पहलुओं को प्रभावित करते हैं। जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करना और गर्म होती दुनिया के साथ तालमेल बिठाना दोनों ही यूरोपीय संघ की सर्वोच्च प्राथमिकताएँ हैं। हमें अभी जलवायु कार्रवाई की आवश्यकता है।
Source - यूरोपीय संघ की आधिकारिक वेबसाइट
Aage padhe 🎶
1) क्लाइमेट चेंज की सबसे बड़े कारणों में से एक तो बढ़ती आबादी है और दूसरा जो मीट इंडस्ट्री है और डेरी इंडस्ट्री है वह है क्योंकि जब आबादी बढ़ती है तो उस आबादी की आपूर्ति के लिए ही सब कुछ किया जाता है फिर वह पेड़ों को काटना हो, रहने के लिए घर बनाना हो खाने के लिए भोजन की व्यवस्था करना हो। आने जाने के लिए संसाधनों की जरूरत हो और भी बहुत सारी चीज होती हैं।
क्लाइमेट चेंज ,वातावरण में जो तापमान बढ़ रहा है और मौसम में जो बदलाव आ रहा है उसी को कहते हैं मानव की गतिविधियों के कारण ग्रीनहाउस गैसेस जैसे CO2 है मेथेन है नाइट्रस ऑक्साइड है यह भारी मात्रा में उत्सर्जित हो रही है।
और यह जब सूर्य से पृथ्वी पर किरणे आती है तो फिर उन किरणों को वापस नहीं जाने देती जिससे कि जो टेंपरेचर है धरती का वह काफी ज्यादा बढ़ रहा है और फिर इसी के कारण ग्लेशियल पिघल रहे हैं नदियों का पानी का वाष्पीकरण तेजी से हो रहा है और बाढ़ जैसी समस्याएं आ रही हैं।
२) देखिए जब हम छोटे थे ना तो जब हम रोते थे या किसी चीज की मांग करते थे तो घर पर हमें एक छोटा सा खिलौना पकड़ा दिया जाता था और उसे हम बजाते रहते थे और घर के जो लोग थे वह अपना काम करते रहते थे वैसे ही आज जो बड़ी-बड़ी कंपनियां जो क्लाइमेट चेंज के लिए जिम्मेदार हैं बड़ी-बड़ी सेलिब्रिटीज नेता जो क्लाइमेट चेंज के जिम्मेदार है तो उन्होंने AC ,रेफ्रिजरेट,र प्रेस कम करो, कम लाइट जलाओ तो यह सब झुंझुने हमको पकड़ा दिए हैं। जिससे कि वह जो बड़ा काम कर रहे हैं वह जो बड़े-बड़े लोग जिम्मेदार हैं उनकी तरफ किसी की नजर ना जा पाए।
2 years ago | [YT] | 1
View 0 replies
We make youth aware.
विकास की तलाश में हम विनाश के कितने पास आ गए 🤕🤕
Meat Market: एक साल में कट जाते हैं 20 करोड़ पशु, 300 करोड़ मुर्गे, इस मामले में 8वें नंबर पर है भारत
सभी तरह के मीट उत्पादन के मामले में भारत 8वें स्थान पर है. साल 2015-16 में मीट उत्पादन 7 मिलियन टन हुआ था. जबकि साल 2021-22 में 9.29 मिलियन टन पर पहुंच गया है. देश के अकेले पांच राज्यों में ही कुल उत्पादन का 58 फीसद मीट उत्पादन होता है.
देश में मीट उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. खासतौर पर भेड़-बकरी, मुर्गे और भैंस के मीट की डिमांड बढ़ रही है. इंटरनेशनल मार्केट में जहां बकरे और भैंस के मीट की डिमांड बढ़ी है तो घरेलू बाजार में मुर्गे और भेड़ के मीट की डिमांड लगातार बढ़ रही है. फीफा वर्ल्ड कप के दौरान तो देश से एक खास नस्ल के बकरे का मीट एक्सपोर्ट हुआ था. एक्सपोर्ट के मामले में भैंस का मीट 12 लाख टन के आंकड़े को भी पार कर चुका है. लेकिन क्या आपको पता है कि घरेलू और एक्सपोर्ट में मीट की डिमांड पूरी करने के लिए हर साल कितने भेड़-बकरी और भैंस की स्लॉटरिंग की जाती है
साल 2021-22 में देश में सभी तरह के पशुओं का कुल मीट उत्पादन 9.29 मिलियन टन हुआ है. इस साल सबसे ज्यादा मीट उत्पादन महाराष्ट्र, यूपी, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हुआ है. इससे पहले यूपी मीट उत्पादन के मामले में पहले नंबर पर था. केंद्रीय मत्स्य, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों की मानें तों देश के कुल मीट उत्पादन में पोल्ट्री (मुर्गे-मुर्गी) की सबसे ज्यातदा 51.44 फीसद है.
इन राज्यों में बढ़ सकता है मीट उत्पादन
केन्द्रीय मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में पांच राज्यी ऐसे हैं जो भैंस के मीट का सबसे ज्या दा उत्पादन करते हैं. जिसमे उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है. यहां साल 2021-22 में 6.20 लाख मीट्रिक टन भैंस के मीट का उत्पादन हुआ था.
दूसरे नंबर पर महाराष्ट्रा 2.37 लाख मीट्रिक टन, तीसरे पर तेलंगाना 1.49 लाख मीट्रिक टन, चौथे नंबर पर आंध्रा प्रदेश 1.46 लाख मीट्रिक टन और पांचवे नंबर पर 1.33 लाख मीट्रिक टन मीट के साथ बिहार है.
अगर इसमे से तेलंगाना को निकाल दें तो बाकी के चारों राज्यल में 94 फीसद से लेकर 100 फीसद तक एफएमडी का टीकाकरण हो चुका है. ऐसे में इन राज्यों को जल्द एफएमडी फ्री जोन घोषित किए जाने की उम्मीद है.
तेलंगाना में अभी सिर्फ 77 फीसद ही टीकाकरण हुआ है. गौरतलब रहे साल 2020-21 में भैंस के मीट का 15.81 लाख मीट्रिक टन और 2021-22 में 16.25 लाख मीट्रिक टन मीट का उत्पादन हुआ था.
2 years ago | [YT] | 2
View 0 replies
We make youth aware.
यूनाइट नेशंस के प्रमुख का कहना है: “पृथ्वी पर मानवता को बचाने के लिए सिर्फ़ 2 साल बचे हैं!
यदि हमने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 6 साल में आधा नहीं किया
तो पृथ्वी का औसत तापमान हमेशा के लिए 1.5 डिग्री से ऊपर चला जाएगा
फिर झुलसाने वाली गर्मी और भीषण बारिश व बाढ़ से आने वाली प्रलय
करोड़ों जीवन तबाह कर देगी।” अब विश्व के शीर्ष वैज्ञानिकों ने
जानना चाहा कि भारी मात्रा में
“ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन” के पीछे कौन है,
तो उन्हें पता चला: “पिछले 6 वर्षों में वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों के कुल उत्सर्जन
का 80% हिस्सा सिर्फ़ 57 कंपनियों की ओर से आया।
जिसमें 35% कंपनियाँ सरकारी हैं।” चलिए! कम-से-कम हम ये तो जानते हैं कि
इस महाविनाश के पीछे कौन है। हमें लगा अब सरकारें और अन्य संस्थान
इनपर किसी प्रकार की लगाम लगाएँगे! यूनाइट नेशंस के प्रमुख की बात याद है न?
सिर्फ़ 2 साल बचे हैं पृथ्वी पर मानवता को बचाने के लिए। लेकिन तभी हम भारत की
शीर्ष वैज्ञानिक लैब (CSIR) की ये खबर पढ़ते हैं: “क्लाइमेट चेंज को रोकने के लिए
अबसे हर सोमवार को बिना प्रेस किए कपड़े पहनें!
ऐसा करने से प्रति व्यक्ति 200 ग्राम ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन
बचा पाएगा।” आपकी जानकारी के लिए बता दें: पूरी मानवता
प्रतिवर्ष 4 लाख करोड़ टन
ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती है यानी 40,00,00,00,00,00,00,000 ग्राम ग्रीनहाउस गैस!
(4 के आगे 16 शून्य हैं) यूनाइट नेशंस का आग्रह है:
मानवता को 2 साल में कुछ ऐसा करना है कि
ये आँकड़ा आधा हो जाए। और हम कह रहे हैं
हर सोमवार को कपड़े प्रेस न करके
200 ग्राम बचाएँगे 😓 इतना काफ़ी नहीं है!
ये तो वही बात हो गई कि
कोई पूरी पृथ्वी पर लगी आग को बुझाने के लिए
बोतल के ढक्कन में पानी भरकर फेंक रहा हो! ये साज़िश है ताकि हमें लगे कि हमने अपने कर्तव्य की पूर्ति कर ली है। क्लाइमेट चेंज किसी सुदूर भविष्य की आशंका नहीं है
बल्कि झुलसाने वाली गर्मी, अन्न की पैदावार में भारी गिरावट,
भीषण बाढ़, तटीय शहरों का डूबना,
दुनिया की सभी प्रजातिओं के सामने विलुप्ति का आसन्न खतरा। ये पिछले कई लाख वर्षों में
पृथ्वी के ऊपर आया सबसे बड़ा संकट है।➖➖➖ क्लाइमेट चेंज को लेकर आचार्य प्रशांत
पिछले 10 सालों से जागरूकता फैला रहे हैं,
लाखों के जीवन में बदलाव भी आया है। लेकिन अब इस बात को करोड़ों-अरबों लोगों तक पहुँचाना है,
पूरे विश्व में फैलाना है। समय कम है। और काम बहुत-बहुत मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं,
विश्व के हर कोने तक ये संदेश पहुँचाने के लिए
बड़े संसाधनों की आवश्यकता है। आचार्य प्रशांत संघर्षरत हैं,
आपके लिए।
2 years ago | [YT] | 3
View 0 replies
Load more