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જય શ્રીકૃષ્ણ, મારી યૂટયૂબ ચેનલ "Nigam Thakkar Recipes" માં આપ સૌનું હાર્દિક સ્વાગત છે, આ ચેનલ પર તમે રોજબરોજ ઘરે સરળતાથી બનાવી શકાય તેવી સાત્ત્વિક વાનગી, ફરસાણ, ચાટ, ગરમ નાસ્તા, કોરા નાસ્તા તથા શ્રીઠાકોરજીને નિત્યમાં તેમજ વિવિધ ઉત્સવ પર ભોગ ધરી શકાય તેવી સામગ્રીનાં વિડીયો જોઈ શકો છો. દરેક વિડીયોમાં અમારો પ્રયત્ન એવો હોય છે કે સરળ ભાષામાં અને પરફેક્ટ માપ ટીપ્સ સાથે વાનગીની રીત પ્રસ્તુત કરી શકીએ. ધન્યવાદ.
Nigam Thakkar Recipes
૫૦ પ્રકારનાં વડા
Vada Recipes (વિવિધ પ્રકારનાં વડા બનાવવાની રીત): www.youtube.com/playlist?list...
5 hours ago | [YT] | 4
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Nigam Thakkar Recipes
निवेदिभिः समर्प्यैव सर्वं कुर्यादिति स्थितिः ।
न मतं देवदेवस्य सामिमुक्तं समर्पणम् । ५ ।
तस्मादादौ सर्वकार्ये सर्ववस्तुसमर्पणम् ।
अन्वय—(भक्तः) समर्प्य एव निवेदिभिः (पदार्थैः) सर्वं कुर्यात् इति स्थितिः (अस्ति), देवदेवस्य सामिमुक्तं समर्पणं न मतं । तस्मात् सर्वकार्यै आदौ सर्ववस्तुसमर्पणं (कर्तव्यं) ।
भावार्थ—तासों भगवद्भक्त समर्पण करें और निवेदित पदार्थसूंही सब कार्य करें यह पुष्टिमार्गकी मर्यादा है, देवदेव श्रीभगवान्कूं अर्धभुक्त समर्पण संमत नहीं है, तासों सर्वकार्यमें आदिमें समग्र वस्तुकोही श्रीहरिकूं अर्पण करें (अर्द्धभुक्तको नहीं)।
कठि०समास—निवेदनं निवेदः, निवेदः,अस्ति येषां ते निवेदिनः तैः। सामि भुक्तं सामिभुक्त्तम्। सर्वं च तत् कार्यं च सर्वकार्यं, तस्मिन् । ५ । (सिद्धांतरहस्य)
क्रमश: षोडशग्रंथ (पोस्ट ८७)
7 hours ago | [YT] | 182
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Nigam Thakkar Recipes
अन्यथा सर्वदोषाणां न निवृत्तिः कथंचन ।
असमर्पितवस्तूनां तस्माद्वर्जनमाचरेत् । ४ ।
अन्वय—अन्यथा सर्वदोषाणां निवृत्तिः कथंचन न (भवति), तस्मात् असमर्पितवस्तूनां वर्जनं आचरेत् ।
भावार्थ—भगवन्निवेदन किये बिना पूर्वोक्त दोषनकी निवृत्ति कोई तरहसूं नहीं होय है, तासूं दोषनिवृत्ति होयवेकेलिये भगवानके अनिवेदित पदार्थनकूँ अपने उपयोगमें न ले ।
कठि० समास—असमर्पितानि च तानि वस्तूनि च असमर्पितवस्तूनि तेषाम् । ४ । (सिद्धांतरहस्य)
क्रमश: षोडशग्रंथ (पोस्ट ८६)
1 day ago | [YT] | 310
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Nigam Thakkar Recipes
ऊपर कहे अनुसार अद्भुत बालकका आगे प्रयोजन नहीं होनेसे अन्यरूपसे ब्रजमें पधारें, अर्थात् लक्ष्मी भी वहां आकर उनकी सेवा करती है। इस माहात्म्यका सूचन करनेवाले नामको दर्शाते हैं।
रमा-लालित-पाद-पद्माय नमः।।१०।।
रमाने लालन किए है चरणकमल जिसके ऐसे विभुको नमस्कार।
रमा निरंतर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी सेवामें एकनिष्ठ रहनेवाली है। वह यहां ब्रजमें आई हुई है। जब तक भगवानका ब्रजमें सानिध्य है, तब तक लक्ष्मी भी प्रभुके सन्निधानमें रहनेके लिए भगवान् पधारे तबसे ब्रजमें रमाका रमण भवन बना। "तत आरभ्य नन्दस्य" यहांसे आरम्भकर "रमाक्रीड़मभून्नृप" वहां तकका यह नाम है।।१०।।
ऊपरके नामोंमें माहात्म्यज्ञानपूर्वक प्रभुमें सदृढ़स्नेह प्रकट किया परन्तु मुग्ध भाव सहित उनके चरित्र संबंधी नामोंका यहां निरूपण नहीं करा, कारण कि प्रथम बाललीलामें होते हुए भी प्रौढ़लीलामें कहकर, उनके छोड़कर आगे २१वें अध्यायसे शुरू होते नामको बताते हैं। आरम्भमें भक्तोंको अन्य भजन वगैरह निषिद्ध हैं। इसीलिए निवारणका सूचक नाम कहते हैं।
भक्त-हितोपदेशकायनमः।।११।।
भक्तोंके हितका उपदेश करनेवाले श्रीकृष्णको नमन।
नंदरायजी वगैरहके इन्द्रयागके उद्यमको देखकर अपने भक्तोंको आपके चरण भजन बिना अन्य योग्य नहीं, ऐसे हितकारक वचनोंका उपदेश प्रभुने किया हैं। इस आशयको बताने वाला यह नाम है।।११।।
बालकके उपदेश मात्रसे परंपरागत धर्मके बड़ा होने पर भी कैसे त्याग किया इसका सूचन करनेवाला नाम कहते हैं।
हविर्मन्त्र-देवता-मूल-बोधकाय नमः।।१२।।
हवि-मंत्र तथा देवताओंके मूलका बोध करानेवाले प्रभुको प्रणाम।
प्रथम श्रीकृष्णने नंदरायजीसे प्रश्न किया, तब उनसे "पर्जनयो भगवानिन्द्र" ऐसा कहकर पर्जन्य भगवान् ही देवता रूपमें रहे हुए हैं। मेघ उनके अवयव मंत्र हैं। वृष्टिका जल यह हवि द्रव्य है, जिससे अन्न पकता है। जल और अन्नसे ही सर्वजीवोंका जीवन चलता है। अतएव यह इंद्र देवता सर्वके सेवा करने योग्य हैं। इसीलिए सर्व उनका अर्चन करते हैं और हम भी वैसा करनेके लिए तैयार हुए हैं। तब प्रभुने यह उत्तर दिया कि "तस्माद् गवां ब्राह्मणानामद्वेश्वारभ्यतां मख:" गाय, ब्राह्मण और पर्वतके यागकी शुरुआत करो। अपना करा यज्ञ वैदिक नहीं हैं। इसीलिए वैदिक यज्ञ करना चाहिए। जिसमें हवि-मंत्र और देवता भी मूलभूत यह गाय-ब्राह्मण और गिरिराज हैं, ऐसा बोध करानेवाले प्रभु हैं।।१२।।
क्रमशः (त्रिविधनामावली) (प्रौढ़ लीला) पोस्ट ४१
1 day ago | [YT] | 343
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વિવિધ પ્રકારનાં ફરસાણ
Gujarati Farsan Recipes (ગુજરાતી ફરસાણ): www.youtube.com/playlist?list...
1 day ago | [YT] | 7
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Nigam Thakkar Recipes
सहजा देशकालोत्था लोकवेदनिरूपिताः ।
संयोगजाः स्पर्शजाश्च न मन्तव्याः कथंचन । ३ ।
अन्वय—लोकवेदनिरूपिताः सहजाः देशकालोत्थाः संयोगजाः च स्पर्शजाः कथंचन (हरिसेवायां प्रतिबन्धकाः) न मन्तव्याः ।
भावार्थ—लोक और वेदमें कहे, अहंताममतादिरूप सहज, अंगवंगादि दुर्देशमें जन्मादि भयोंसे देशोत्थ, कलियुगदुर्मुहूर्तादिमें जन्म होयवेसों कालोत्थ, मनके संयोगसों भये मानसिक दुश्चि-यारूप संयोगज, तथा स्पर्शजदोष, निवेदनके अनंतर सेवामें प्रति-बन्धक कभी न मानने चाहिये ।
कठिनांश समास—सह जाताः सहजाः । देशकालाभ्यां उत्थाः देश-कालोत्थाः । ३ । (सिद्धांतरहस्य)
क्रमश: षोडशग्रंथ (पोस्ट ८५)
2 days ago | [YT] | 301
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Nigam Thakkar Recipes
https://youtu.be/qL9W8FL4XlM
2 days ago | [YT] | 5
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Nigam Thakkar Recipes
रस स्वरूप द्योतक नामका निर्देश करते हैं।
नील-मेघ-श्यामाय नमः।।७।।
नीलश्याम मेघके जैसे श्याम सुंदरका वंदन।
नवीन श्याममेघ जैसे सभीको अपने समयमें सुंदरता देते हैं, जलवृष्टि कर तापका शांत करते हैं, अन्न देते हैं, सर्वको परमानंदका दान करते हैं। ऐसे भगवान भी पृथ्वीको, स्वर्गको, धर्मको तथा भक्तजनोंके अनिष्ट दूर कर इष्टवस्तुकी प्राप्ति कराकर अत्यंत आनंद देनेवाले हैं। यह इस नामसे प्रतिपादन करते हैं।।७।।
इस स्वरूपका निरूपण कर उसके योग्य आभरण दर्शानेवाले नाम कहते हैं।
नाना-कल्प-विराजिताय नमः।।८।।
नाना प्रकारके आभूषणसे विराजमान भगवानका अभिनंदन।
यह नाम "महार्हवैडुर्य किरीट" इस श्लोकमें बताए हुए आभरणोंसे संशोभित भगवानके स्वरूपको प्रकट करता है।।८।।
परम सुंदरता दर्शानेवाले नामका निवेदन करते हैं।
आत्म-विस्मापक-मानुष-वेष-सौन्दर्य-निधये नमः।।९।।
आत्माको आश्चर्य उत्पन्न करे ऐसे मनुष्य वेशके सौंदर्यके निधिरूप प्रभुको प्रणाम।
सर्वकी आत्माको आश्चर्य उत्पन्न करे, ऐसा आपका सौंदर्य है। इसीलिए प्रथम अद्भुत पद कहा था। उस प्रथमके बालक पदसे तथा मानुषवेषसौन्दर्य वगैरह पदसे अत्यंत सौन्दर्यका द्योतन होता है। "त्रैलोक्यलक्ष्म्यैकपदम्" यह आगेके श्लोकमें तीन लोकोंकी लक्ष्मीके एक ही स्थान रूप वपुको धारण करनेवाले ऐसा कहा है। अतएव तीनों लोकोंमें जो भी सौन्दर्य है, वह प्रभुके सामान्य अंश रूप ही है। ऐसा निधि पदसे निरूपण करते हैं। इस प्रकार सर्वांशके पूर्ण प्राकट्य करनेमें "अनिर्वचनीय माहात्म्य" का ज्ञापन होता है। "विरोचमान वसुदेव ऐक्षत" इस श्लोकके भावको दर्शानेवाला यह नाम है।।९।।
क्रमशः (त्रिविधनामावली) (प्रौढ़ लीला) पोस्ट ४०
2 days ago | [YT] | 257
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Nigam Thakkar Recipes
॥ श्रीहरि: ॥
ब्रजभाषामें सिद्धान्तरहस्यकी टीका।
श्रावणस्याऽमले पक्ष एकादश्यां महानिशि।
साक्षाद्भगवता प्रोक्तं तदक्षरश उच्यते ॥ १ ॥
अन्वय—श्रावणस्य अमले पक्षे एकादश्यां महानिशि भगवता साक्षात् (यत्) प्रोक्तं तद् अक्षरश: उच्यते।
भावार्थ—सावनके शुक्लपक्षमें और एकादशीकी अर्धरात्रिमें श्रीपुरुषोत्तम भगवानने जो प्रत्यक्ष कह्यो सो अक्षर स में कहूं हूं ।१।
ब्रह्मसंबंधकरणात् सर्वेषां देहजीवयो:।
सर्वदोषनिवृत्तिर्हि दोषा: पंचविधा स्मृता: ॥२॥
अन्वय—ब्रह्मसंबंधकरणात् सर्वेषां देहजीवयो: सर्वदोषनिवृत्ति: हि (भवति), दोषा: पंचविधा: स्मृता:।
भावार्थ—आत्मासहित निज सर्व पदार्थनको भगवान् कूं निवेदन करवेसूं सब जीवनके देह और लिंगशरीरयुक्त जीव संबंधी सब दोषनकी निवृत्ति होय हैं, अर्थात् वे स्वरूपसूं रहें भी हैं तोभी सेवामें प्रतिबंध नहीं करें हैं, वे दोष, पांच प्रकारके हैं। जैसे—
कठि० समास—ब्रह्मणा सह संबंध: ब्रह्मसंबंध:, तस्य करणं तस्मात्। पंचविधा: येषां ते।२। (सिद्धांतरहस्य)
क्रमश: षोडशग्रंथ (पोस्ट ८४)
3 days ago | [YT] | 277
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Nigam Thakkar Recipes
माहात्म्य दर्शानेवाला नाम कहते हैं।
श्रीवत्स-लक्ष्मणे नमः।।४।।
श्रीवत्सका चिह्न जिनके हैं, ऐसे प्रभुको प्रणाम।
श्रीवत्स यह अक्षरब्रह्म रूप हैं। सर्वात्मक भगवानका श्रीवत्स ब्रह्मका मुख्य लक्षण है। आपने इसको ही हृदयमें धारण करा हुआ है। श्री - लक्ष्मी स्पर्श सुखको स्पष्ट करनेके कारणरूप हैं। इसके जनक-उत्पन्न करने वाले आप हैं। इसीलिए इसको धारण करनेकी आपकी वत्सलता और रसज्ञता सिद्ध होती है।इस नाममें माहात्म्य और स्नेह दोनों ही आ जाते है।।४।।
कौस्तुभाभरण-ग्रीवाय नमः।।५।।
कौस्तुभमणिके आभरण जिसमें हैं, ऐसे कंठवाले श्रीकंठ प्रभुको नमन।
जीवमात्रके आधिदैविक स्वरूपके यह मणि रही हुई हैं। मुक्त जीवोंकी वहां ही स्थिति होती हैं। भगवान् मुक्त जीवोंको समीपमें प्राप्त करने योग्य हैं। ऐसे मुक्त जीव लीलास्थ ही जानने, ऐसे जीवोंको आपने कंठमें भूषणके तरीकेसे स्थापन किया है। इसीसे प्रभु रससे - प्रेमभक्ति रससे परवश हो जाते हैं, यह सूचन किया। इस नामसे माहात्म्य और रसाभिज्ञता दोनोंका ही ज्ञापन कर दिया।।५।।
ऐसे स्वरूपके दर्शन करनेसे माहात्म्य ज्ञानपूर्वक स्नेह प्राप्त करनेसे श्रीदेवकी माताकी मुक्ति ही होय तो उसका अभाव कैसे हुआ? यह कहते हैं।
पीताम्बर धारिणे नमः।।६।।
पीताम्बरधारी प्रभुको नमस्कार।
पीताम्बर माया, उसको धारण करनेसे मोह उत्पन्न करते हैं। माताको माहात्म्य ज्ञान प्रत्यक्ष हुआ फिर भी मायासे मोह प्राप्त कर मुक्ति न हुई और बालभाव उत्पन्न हुआ।
प्रथम कौस्तुभमणिके वर्णनमें श्रीसुबोधिनीजीमें श्रीमदाचार्यचरणने जीवोंके दो प्रकार कहे हैं। क्रियानिष्ठ जीवोंसे ज्ञाननिष्ठ जीव उत्तम हैं। इसीलिए ऐसे मुक्त जीवोंको आप कंठमें आभरण रूप धारण करते हैं, ऐसा कहा और क्रियानिष्ठता प्रभुकी मायामें फंसाती है। इसीलिए उनकी मुक्ति नहीं होती। ऐसे मायरूप पीताम्बर धारण करनेवाले प्रभु हैं। यह पीताम्बर मायारसका भी आच्छादन करता है। इसीलिए भगवानके रस स्वरूप होते हुए भी रसका आच्छादन मायासे होता है। ऐसा भी इस नामसे सूचित करते हैं।।६।।
क्रमशः (त्रिविधनामावली) (प्रौढ़ लीला) पोस्ट ३९
3 days ago | [YT] | 460
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