ब्रह्मणि योगः समाधिः ब्रह्मयोगः
Hariom
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति । ऋ. 1.164.46
Ekam Sad Vipra Bahudha Vadanti
एक ही सत्य को विद्वान अलग अलग रूपों में व्यक्त करते हैं।
Scholars express the same truth in different forms.
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BrahmaYoga ब्रह्मयोग:
बाह्य विषयों के स्पर्शों में, जिसका मन अनुरक्त न हो,
क्षणभंगुर सुख की चाह छोड़, जो अंतर-पथ पर युक्त हो।
शब्द, रूप, रस, गंध सभी, इन्द्रिय-जाल के खेल हैं,
आते-जाते मेघ समान, ये सब जग के मेल हैं।
जो भीतर के दीपक में ही, शाश्वत ज्योति निहारता,
आत्मा के अमृत-सागर में, निज चेतन को उतारता।
*_ब्रह्मयोग_* में लीन चित्त जब, ब्रह्मस्वरूप समाता है,
अक्षय सुख की निर्मल धारा, वही *_ब्रह्मयोगी_* कहलाता है।
नहीं उसे विषयों की तृष्णा, नहीं भोग का आकर्षण,
उसके हृदयाकाश में बस, ब्रह्मानंद का है वरण।
इसलिए हे मानव! तू भी, क्षणिक प्रीति को दूर कर,
इन्द्रियों को संयमित करके, अंतर के प्रभु से नूर भर।
1 day ago | [YT] | 4
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BrahmaYoga ब्रह्मयोग:
1 day ago | [YT] | 6
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BrahmaYoga ब्रह्मयोग:
1 day ago | [YT] | 5
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BrahmaYoga ब्रह्मयोग:
4 days ago | [YT] | 9
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BrahmaYoga ब्रह्मयोग:
ज्ञान-ज्योति से मिट गया, आत्म-अज्ञान तमाम।
देखे ब्रह्म अखण्ड वह, एकरस अविराम॥
विद्या-विनय-विभूषित जो, ब्राह्मण शान्त सुजान।
गौ, गज, श्वान, चाण्डाल में, देखे एक ही प्राण॥
सत्त्व-रज-तम के गुणों से, जो रहता निर्लेप।
भेद-भाव सब त्यागकर, ब्रह्मस्वरूप समीप॥
ऊँच-नीच का मान नहीं, नहीं किसी से द्वेष।
सबमें व्यापक एक ही, चैतन्य-दीप्त विशेष॥
संस्कारों के जाल से, जो रहता निष्काम।
वह पण्डित समदर्शिता का, होता सच्चा धाम॥
मूर्ति भिन्न, स्वरूप एक, यही तत्त्व का सार।
ज्ञानी की दृष्टि में सदा, ब्रह्ममय संसार॥
शास्त्र-वचन का मर्म यह, समझे जो विद्वान्।
जीव-जीव में देखता, एक परम भगवान्॥
ज्ञान जहाँ निष्कलुष जगे, मिटे भेद-अभिमान।
गौ, गज, श्वान, द्विज, चाण्डाल—सबमें एक भगवान्॥
4 days ago | [YT] | 6
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BrahmaYoga ब्रह्मयोग:
4 days ago | [YT] | 5
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BrahmaYoga ब्रह्मयोग:
प्रकाशित परमज्ञान जहाँ, पहुँची जिनकी बुद्धि महान,
तद्बुद्धि होकर लीन हुए वे, पाए ब्रह्म का दिव्य विधान।
जिस परब्रह्म में आत्मा रमे, तदात्मा कहलाते हैं वे,
अहंकारों के बंधन तोड़, निज स्वरूप को पाते हैं वे।
जिसकी निष्ठा ब्रह्म में अटल, चंचलता जिसका अंत हुई,
सब कर्मों का संन्यास लिए, आत्मा में ही शांति हुई।
परब्रह्म ही जिनका आश्रय, वही परम गति, परम धाम,
आत्मरति में मग्न निरंतर, जपते केवल उसका नाम।
ज्ञान-ज्योति जब हृदय जगे, अज्ञान-अंधेरा मिट जाता,
पाप-दोष के घने मेघ भी, सत्य-सूर्य से छँट जाता।
ज्ञानधूत कल्मष संन्यासी, निर्मल होकर बढ़ते हैं,
जहाँ पुनरावृत्ति नहीं होती, उस पद को वे गढ़ते हैं।
देह-संबंधों से परे जहाँ, अमर मुक्ति का नित्य प्रकाश,
उस ब्रह्म-पद को प्राप्त कर, पाते हैं वे शाश्वत निवास॥
5 days ago | [YT] | 5
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BrahmaYoga ब्रह्मयोग:
5 days ago | [YT] | 6
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BrahmaYoga ब्रह्मयोग:
5 days ago | [YT] | 5
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BrahmaYoga ब्रह्मयोग:
अज्ञान-तम से ढका हुआ, जब जीव जगत में भटकता है,
मोह-माया के बंधन में पड़, सत्य-पथ से हट जाता है।
जब आत्म-विवेक का दीपक, अंतःकरण में जलता है,
अविद्या का घनघोर अंधेरा, क्षण भर में ही ढलता है।
तब ज्ञान-सूर्य उदित होकर, चेतन नभ को भर देता,
परम तत्त्व के दिव्य स्वरूप को, उज्ज्वल कर प्रकट करता।
जैसे रवि अपनी किरणों से, रूप-जगत सब दिखलाता,
वैसे ही जागृत आत्मज्ञान, ज्ञेय समस्त प्रकाशित करता।
मोह मिटे, संशय गल जाएँ, सत्य स्वयं मुस्काता है,
जिसके अंतर ज्ञान जगे, वह ब्रह्म-प्रकाश को पाता है
6 days ago | [YT] | 5
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