निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः



Aman Awareness

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Aman Awareness

🪴 हिमालय, जो एशिया की जल-सुरक्षा का आधार है और जिसे ‘तीसरे ध्रुव’ की संज्ञा दी जाती है, वर्तमान में एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। यह संकट मात्र हिमनदों के पिघलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अनियंत्रित मानवजनित हस्तक्षेप का परिणाम है।
🍂 ICIMOD की मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर अब पहले के मुकाबले कहीं अधिक तेज़ी से पिघल रहे हैं:
◾ साल 2000 के बाद से बर्फ पिघलने की दर दोगुनी हो गई है।
◾ 1975 के बाद से ये ग्लेशियर औसतन 27 मीटर तक पतले हो चुके हैं।
◾ यह जल आपूर्ति पर निर्भर लगभग दो अरब (200 करोड़) लोगों के लिए गंभीर अस्तित्वगत संकट पैदा करता है।
◾ ग्लेशियर क्षेत्र का 78% हिस्सा ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में है।
🌿 यह सिर्फ पहाड़ों का विनाश नहीं, बल्कि वहाँ बसने वाले जीव-जंतुओं का भी अंत है:
◾ अक्सर सरकार की 'विकासवादी' नीतियाँ परिस्थिति को सुधारने के बजाय उसे और बिगाड़ देती हैं। उदाहरण के लिए: जोशीमठ और चारधाम परियोजना
◾ हमें अंदाज़ा भी नहीं है कि हर दिन कितनी वनस्पतियाँ और जीव-जंतु चुपचाप विलुप्त हो रहे हैं।
◾ जैविक विविधता पर सम्मेलन के अनुसार, हर दिन धरती पर 150 या उससे भी अधिक प्रजातियाँ लुप्त हो रही हैं।
◾ लद्दाख में ‘पाँचवीं अनुसूची’ जैसी माँगें केवल बाहरी सुरक्षा तक सीमित हैं।
🍀 संस्थागत पतन और राजनीतिक उदासीनता:
◾ ब्राज़ील में हाल ही में संपन्न हुआ COP30 सम्मेलन किसी भी ठोस नीतिगत परिणाम के बिना समाप्त हो गया।
◾ अंतरराष्ट्रीय संगठन, जैसे कि UN, अब बस नाम मात्र के रह गए हैं।
◾ जलवायु संकट पर वैश्विक प्रतिक्रिया केवल कूटनीतिक औपचारिकता बनकर रह गई है।
◾ अमेरिका जैसे विकसित देश, जिन्हें इस संकट का समाधान देना था, अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह पीछे हट चुके हैं।
🌳 विनाश को सामान्य बनाने में बौद्धिक वर्ग और मीडिया की बड़ी भूमिका है:
◾ व्यर्थ बहस: बुद्धिजीवी ‘विकास बनाम विनाश’ की उस द्वैतवादी बहस में उलझे हैं, जो कभी किसी ठोस समाधान तक नहीं पहुँचती।
◾ पूँजीपति को किसी भी कीमत पर मुनाफा चाहिए, जबकि वैज्ञानिक केवल तथ्यों और उनके परिणामों तक सीमित रह जाते हैं—पर दोनों ही पक्ष समस्या की असली जड़ को पकड़ने में चूक जाते हैं।
◾ 90 वर्ष की उम्र में पर्यावरणविद डेविड सुज़ुकी कहते हैं कि उन्होंने धरती को बचाने के लिए अपनी ओर से हर संभव कोशिश की, लेकिन उन्हें डर है कि उनके प्रयास नाकाफी रहे।
◾ मर्डोकीकरण: मीडिया के व्यवसायीकरण ने यह सुनिश्चित किया है कि जलवायु परिवर्तन जैसा अस्तित्वगत संकट कभी ‘प्राइमटाइम’ की प्राथमिकता न बने।
🌱 सस्टेनेबिलिटी की वर्तमान धारणा ही त्रुटिपूर्ण है। हम प्रकृति को इसलिए बचाना चाहते हैं ताकि हमारा 'उपभोग' निरंतर चलता रहे। बचाने वाला भी वही 'कर्ता' है, जिसने उसे नष्ट किया है। जब तक हम खुद को प्रकृति से अलग देखेंगे, तब तक हर समाधान एक नया विनाश ही पैदा करेगा।

2 months ago | [YT] | 0

Aman Awareness

*🏹🏹BG Verse 2.47🏹🏹*

Reflections -----

🌱The authority that ego has is to not create barriers in the part of realization.It must LOOK WITHIN and dissuade itself from acting at all—neither rightly nor wrongly.

✨ The EGO has to stop itself,
STOP believing in itself, investing in itself. The ego doesn't have to come up with the right action.

🏹 Right action is spontaneous.

THAT WHICH IS ACTUALLY RIGHT, ABSOLUTELY RIGHT, IS UNAVAILABLE TO THE EGO AS LONG AS IT REMAINS.

When ego is in the center, there is no nishkam karma. Authority of the ego
is not to act rightly; it has the right to check itself as-----

Stop—you are needless, superfluous, extra, additional.
Go, you are redundant.

That's the choice one has to exercise.
Where there is ego, there is no non-doership, because the very definition of ego is restlessness.

Incompleteness leads it to go hither
and thither, chasing blind desires that come from lack of self-awareness about itself. Therefore, it is bound to be the doer.

🍁You have to be the passive observer. That is it.Knowing is retreating; knowing is dissolving; therefore, knowing is purification

7 months ago | [YT] | 0

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युगों से तुम्हें कविता में पूजा गया, जीवन में दबाया गया।
मंचों पर गाया गया, पर मैदान से वंचित रखा गया।
आज समय ने फिर देखा कि क्या होता है
जब तुम न कठपुतली बनती हो न देवी,
बल्कि जूझती हो खिलाड़ी, योद्धा, विजेता बनकर।

~ आचार्य प्रशांत जी

7 months ago | [YT] | 0

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आत्मज्ञान के प्रकाश में,
अंधे कर्म सब त्याग दो।
निराश हो निर्मम बनो,
तापरहित बस युद्ध हो।।

11 months ago | [YT] | 0

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जो अपना हाथ मैला होने से डरता हैं,
वो एक नहीं ग्यारह कायरो की मौत
मरता है।। ~ कवि धूमिल जी

11 months ago | [YT] | 0

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सब धरती कागज करूँ, लेखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय।" 

11 months ago | [YT] | 0

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भागे भला न होएगा, कहा धरोगे पांव।
सिर सौंपो सीधे लड़ो, काहे करो कूदाव।।

सुरा नाम रखाय के, अब क्या डरना वीर।
अड़े रहना मैदान में, सम्मुख सहना तीर।।

1 year ago | [YT] | 0