Sarvodaya Ahimsa

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*जब तक सत्य अपने जूते पहन रहा होता है, तब तक झूठ आधी दुनिया का चक्कर लगा चुका होता है।* 😂😁👏🏻

1 day ago | [YT] | 14

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2 days ago | [YT] | 109

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🌺❖ *सुविचार*❖🌺

⚖️ जहाँ अन्याय, अनीति और अभक्ष्य का सेवन होता है,
वहाँ मोक्ष और मोक्षमार्ग का मिलना तो दूर,
स्वर्ग का सुख भी दुर्लभ है।

⚠️ और यदि यही अपराध कर्मक्षेत्र के साथ धर्मक्षेत्र में प्रवेश कर गये तब नरक नहीं सीधे निगोद लेकर जायेंगे ।
🌿 धर्मक्षेत्र में पवित्रता और मर्यादा बनाये रखना ही पहली पूजा - भक्ति ( धर्माराधना ) है।

✍️ – ऋषभ

3 days ago | [YT] | 38

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3 days ago | [YT] | 97

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4 days ago | [YT] | 140

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_श्रुतपंचमी से जुड़ा *मेरी जीवनयात्रा* का एक अंश_

मुझे सदा अपने बड़े भाइयों की पुरानी पुस्तकें या रद्दी में मिली पुरानी पुस्तकें ही पढ़ने को मिलती थीं। कक्षा चार में एक दिन अध्यापिका ने कहा कि तुम्हारी पुस्तक कहां है? मैंने कहा कि मेरे पास ही है। अध्यापिका- निकालो उसे, बस्ते में क्यों रखी है? मैंने झिझकते हुए पुस्तक निकाल तो ली, लेकिन उसमें उस दिन का पाठ नहीं था, क्योंकि मेरी पुस्तक में प्रारम्भ के तीन अध्याय नहीं थे, और कक्षा में उस दिन दूसरा अध्याय चल रहा था। उस दिन जो मुझे ग्लानि हुई, घर पर आकर मैंने कहा कि मुझे नई पुस्तक चाहिए। पिताजी बोले- पड़ौसी के बालक से पुस्तक लेकर उसमें से तीन अध्याय हाथ से नये लिख लो, चाहो तो उन पृष्ठों को अपनी पुस्तक के आरम्भ में चस्पा कऱ सकते हैं, इसतरह तुम्हारी पुस्तक पूर्ण हो जायेगी।

इसप्रकार सदा पुरानी पुस्तकों से पढते-पढ़ते जब मैं कक्षा 10 में आया, तब मुझे ‘सामाजिकविज्ञान’ की पुस्तक पुरानी भी न मिल सकी और इसकी मुझे बहुत खुशी हुई कि अब मुझे यह नई पुस्तक मिलेगी। मैंने बाजार से उसे न केवल खरीदा, बल्कि उस पर बहुत सुंदर एक जिल्द (बाइंडिंग) भी बनाई। मेरी किताब का श्रृंगार देखकर मेरे सहपाठी उसे अपनी पुस्तक से बदलने का अनुरोध करने लगे। मैं भी उस पुस्तक को इस डर से कि, वह गन्दी न हो जाये, खोलकर पढ़ता ही नहीं था। अन्त में जब परीक्षा आई तो सामाजिकविज्ञान के प्रश्नपत्र में मुझे कोई भी उत्तर न आता था। जैसे-तैसे कुछ लिखा। परीक्षक ने भी कृपा करते हुए मुझे मात्र उत्तीर्णांक ही दिये।

उस दिन यह समझ में आया कि पुस्तकों की असली सेवा-पूजा उनका अध्ययन करना ही है। साज-सज्जा करना भी अच्छी बात है, किन्तु वह उनकी असली पूजा नहीं। आज जब भी मैं श्रुतपंचमी पर्व के अवसर पर मंदिरों में शास्त्रसज्जा करते तथा जिनवाणी पूजा के अर्हुघ्य चढ़ाते हुए लोगों को देखता हूं तो उनके भोलेपन पर मुझे बहुत तरस आता है। ऐसे लोग शास्त्र को नमस्कार करेंगे, अर्घ्य चढ़ायेंगे, लेकिन उनको कभी खोलकर पढ़ने की जहमत नहीं उठाते। ज्ञान की वास्तविक सार सम्भाल को भूलकर केवल बाह्य सजावट में रचे-पचे समाज को देखकर एक बार महात्मा गांधी को कहना पड़ा कि ‘‘यदि चोरी का पाप न लगता हो तो मैं इन ज्ञान उपादानों को जैन समाज से छीन लूं, क्योंकि वे केवल सजाना जानते हैं, ज्ञानोपासना नहीं।’’

प्रत्येक पूजा एक जैसी अर्घ्य चढ़ाने और दीपक से आरती उतारने वाली नहीं होती है। जिसकी पूजा है, उसके अनुसार ही होती है। शास्त्रों की पूजा उनका अध्ययन है। लक्ष्मी (धन) की पूजा उसका सदुपयोग और मितव्ययता है, वाहन की पूजा उसे नियमित चलाना है, न कि फूल-चंदन आदि से पूजा करना। इसी प्रकार माता-पिता की पूजा उनकी आज्ञा का पालन और सेवा करना है।

*डाॅ. शुद्धात्म प्रकाश जैन, मुम्बई*

6 days ago | [YT] | 78

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Happy mother's day (श्रुत अवतरण दिवस)

1 week ago | [YT] | 229

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1 week ago | [YT] | 223

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1 week ago | [YT] | 153

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*आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस* की अपने जीवन में उतनी ही घुसपैठ होने दें, जिससे कि हमारी *इंटलीजेंस आर्टिफिशियल* न होने पाये।

1 week ago | [YT] | 18