Sonam Singer(विद्रोही)

Hello friends 👋
एक नई पहल मेरी तरफ से कि कुछ अलग किया जाय तो क्यों न शुरू हो एक नई शुरुआत तो Guys मेरे channel पर मेरे गाने, खासकर मेरे खुद के लिखे हुए,मेरी कविता,एक्टिंग,डांस,शायरी,मोटीवेशनल वीडियो,सोशल इश्यू(जिसमें खासकर सभी को न्याय दिलाना)इन सबसे सम्बंधित वीडियो आपको मिलेंगे,सोंचा कुछ नया निर्माण करु तो सबके साथ साझा करूं हर पल कुछ नया हो तो हर नयेपन में खूबसूरती आ जाती है|
UPSC aspirant होने के साथ-साथ कुछ अपने सपनों को समय दूं वैसे ऐसा about तो आप पहली बार पढ़ रहे होंगे Smile pleaseक्योंकि हंसाना भी अपना शौक है👈
सारी बुराइयों के उन्मूलन का नया चेहरा हूँ मैं खासकर जातिवाद,दहेज़ प्रथा👈
मेरी पहचान-हरफ़नमौला,निडर,बेबाक,घोर आध्यात्मिक...किसी भी बुराई(लोभ,मोह,काम,क्रोध,कोई भी कुप्रथा, पुरानी घिसी-पिटी परंपरा)से ग्रसित लोग हमसे दूर रहें।👈
मुझे समाज और दुनिया से प्रशंसा और इज़्ज़त नहीं चाहिए👈भाड़ में जाओ तुम,तुम्हारी इज़्ज़त और तुम्हारी तारीफें।मैं इज़्ज़त को अपनी पॉकेट में रखकर चलती हूँ।किसी की दी हुई तारीफ और इज़्ज़त के गुलाम नहीं हैं हम👈
💗Student Of Acharya Prashant 💗👈


Sonam Singer(विद्रोही)

जब आते हैं हम तुम्हारे दर पर
तो एक ही बात सदा याद आती है
कोई इतना कैसे दुनिया से प्रेम कर सकता है
सूली देखकर हमेशा आँख भर आती है
कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है भला
ये बात बार-बार मेरे मन में सदा आती है
ये बेरहम दुनिया खूबसूरती को क्यों मिटाती है
क्यों मसीहा को ये दुनिया सूली पर चढ़ाती है
क्यों मसीहा को ये दुनिया सूली पर चढ़ाती है😔
❤️✝️❤️
Written by-Sadhana(Sonam)

6 months ago | [YT] | 28

Sonam Singer(विद्रोही)

https://youtu.be/ewPKWzr94qs?si=gQ3e0...
अपने भाई सागर का चैनल जरूर सब्सक्राइब करें💯💞🔥🙏👌

9 months ago | [YT] | 1

Sonam Singer(विद्रोही)

आज विजयादशमी और गाँधी जयंती दोनों साथ में पड़ गई।संयोग देखिए कि गाँधी जी ने हमेशा "राम जी"को माना और उनके आखिरी शब्द थे"हे राम"ये सुंदर संयोग इस त्योहार और जयंती को और सुंदर बना रहा है।सत्य के पुजारी" गाँधी जी" और स्वयं "सत्य"आज एक हो गए हैं।ये सुंदर संयोग सबके जीवन में सुंदरता लेकर आया है आज का दिन जो सिखा रहा है उसे सीखकर हम सब "राम"अर्थात् सत्य तक पहुंचने का प्रयास कर सकते हैं।
सत्य हमेशा से जीता हुआ है लेकिन माया मतलब अहंकार जिसे रावण कहते हैं उसने सत्य को ढंक दिया है।यहाँ रावण का अर्थ एक व्यक्ति से नहीं है बल्कि हम सबसे है जो लोभ,मोह,काम,क्रोध,ईर्ष्या आदि अन्य बुराइयों से भरा है वही रावण है।बार-बार रावण का पुतला क्यों जलाते हो?वो कार्य तो राम जी ने कर दिया था।विजयादशमी का मतलब है कि अपने अंदर की सारी बुराइयों का दहन करो।जब अपने अंदर कि बुराइयों का दहन करोगे तो सच प्रत्यक्ष दिखाई देगा।
लोग रावण का दहन करते हैं हर बार पर वो सब अज्ञानी हैं।त्योहार का सही अर्थ नहीं समझते हैं और पहुँच जाते हैं मेला देखने।अरे आज खुद के मन की सफाई का त्योहार है अपने अंदर देखो,खुद में ही हजारों रावण को पनाह दिए हुए हो और बार-बार रावण का पुतला फूँकने पहुंच जाते हो।गजब का इंसान है पुतला फूंककर दूसरों पर दोष मढ़कर अपने अहंकार को ही पोषित करता है।
राम जी रावण को मारकर मतलब असत्य पर सत्य की विजय करके घर वापस आए थे लेकिन आजकल लोग बाहर रहते हैं तो घर वापस लौटते हैं मँहगे कपड़े,गहने,मिठाइयों के साथ👈अब यहीं देख लीजिए कि सभी उपभोगवादी हैं।राम जी ने तो इन सबका त्याग कर दिया था।अज्ञानता हटाइए "राम"को समझिए।अभी आप राम को नहीं समझते हैं और उनके नाम से डीजे,डांस,धमाचौकड़ी, मिठाइयां और कपड़े,फूहड़पन यही सब करते हैं।इन सबसे हटकर पहले राम को समझ लीजिए।
Written by-Sadhana(Sonam)

9 months ago | [YT] | 1

Sonam Singer(विद्रोही)

आज नवरात्रि का अंतिम दिन है।सब कन्या पूजन कर रहें हैं,जी हाँ जिस देश में कन्याभ्रूण हत्या होती है इसी देश की बात कर रही हूँ।बहुत महान देश है एक तरफ कन्यापूजन दूसरी तरफ भ्रूणहत्या।स्त्री को देवी माना और सबसे ज्यादा शोषण उसी का हुआ।क्या आप लोगों को पता है कि जिन चीजों की पूजा करते हैं उन्हीं का शोषण ज्यादा करते हैं हम सब👈नदियां,पेड़,स्त्री,गाय इनकी पूजा बहुत होती है इन्हीं की दुर्दशा है बहुत ज्यादा।पूजनीय बना दिया तो मतलब शोषण शुरू👈ये दोहरा चरित्र क्यों?लोग अंदर से कुछ और बाहर से कुछ और हैं।ऊपर से लोगों को दिखाएंगे कि बहुत अच्छे हैं पर अंदर ही अंदर जलन,क्रोध,लोभ,कामवासना बजबजाती रहती हैं।अंदर से इतना सड़े और बाहर से महान इंसान बने रहते हैं सब,हाँ मतलब कुछ लोग तो जैसे लगता है भगवान हैं बस पैर पकड़कर कदमों में बैठने की देर है।🤣
वैसे एक बात पूँछू👈 कितना साफ किए मन को नौ दिनों में जितना कूड़ा भरा था वो निकला?नौ दिन काफी नहीं है क्योंकि पूरे साल का कचरा नौ दिन में कैसे साफ हो सकता है भला?नौ दिन में ही और ज्यादा भर गया होगा।मेरी बातें फालतू लगेंगी पर हाँ अपने मन के अंदर झाँककर देखिए खुद ही समझ जाएंगे अपने बारे में।अगर मन में सच्चाई,करुणा और प्रेम आया है तो आपकी नवरात्रि सफल रही।अगर ऐसा नहीं हुआ है तो देवी माँ आपसे अभी भी कुपित हैं।राक्षसों का वध करके माँ ने पृथ्वी को रहने लायक बनाया,देवताओं को मुक्ति दिलाई👈वर्तमान में सबसे बड़ा दानव इंसान है जो पृथ्वी को दूषित कर रहा है, मानवजनित आपदाएं बढ़ती ही जा रही हैं,तापमान में वृद्धि से वैश्विक ऊष्मन जैसी समस्या बढ़ती जा रही है।जनसंख्या कार्बन उत्सर्जन करने के लिए इतनी परेशान है कि उपभोग रुक ही नहीं रहा है।मेरा यही उद्देश्य रहता है कि सबको जागरूक करती चलूँ,शायद कुछ ही बात समझ आ जाए लोगों को।बात नहीं समझ में आएगी तो"दुर्गा माँ"हैं वो तो विनाश करेंगी ही अगर प्रकृति को छेड़ा गया तो।
Written by-Sadhana(Sonam)

9 months ago | [YT] | 1

Sonam Singer(विद्रोही)

🙏सिद्धिदात्री माँ🙏
आश्चर्य है मुझे कि नवरात्रि इस बार दस दिन की है तब तो "दसरात्रि"होनी चाहिए मतलब इंसान देवी जी को भी अपने अनुसार चला रहा है।जो पंडित,पुरोहित बोल दिए वही लकीर बन गई,इंसान पता नहीं कब सबकुछ अपने दिमाग से सोंचेगा🤔सब यहाँ दूसरों के दिमाग के चलाए चल रहे हैं,एक कदम भी अपनी इच्छा से कहाँ बढ़ा रहा है कोई?अब "सोनम वांगचुक"सर को सत्ताधारियों ने देशद्रोह का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया।जिस व्यक्ति ने भारत और लद्दाख के लिए सबसे अच्छा कार्य किया,पर्यावरण को बचाने का अथक प्रयास किया उसी व्यक्ति को जेल में डाल दिया गया।नेता ठहरे एक नंबर के अनपढ़,अपवादस्वरूप कुछ पढ़े-लिखे लोग भी हैं।कुछ लोगों को छोड़कर सब रेपिस्ट तो भरे हैं वो शिकार का इंतजार करते होंगे और वहीं भारत के लिए इतना महान कार्य करने वाले"सोनम वांगचुक"सर को झूठे आरोपों में फँसाकर जेल में डाल दिया गया।
जो सही कार्य करे वो जेल में और जो गलत कार्य करे वो बाहर बैठा मलाई मार रहा है।अंधभक्तों का कहना ही क्या वो तो सत्ताधारियों के पैर चाटने के लिए पैदा हुए हैं👈अगर उनके नेता को कुछ कह दो तो तड़तड़,तड़तड़ गोली बरसा देंगे आप पर,कहेंगे मालिक का नमक खाया है,नमक हरामी थोड़ी न करेंगे,उनके शब्द-"हमार नेता हमार माई-बाप हैं कौनौं बीच में आए त टपकाई देब,चाहे होई जेल चाहे होई बेल"अरे गौर से देखो "अंधभक्ति"शब्द में सबसे पहले "अंध" लगा है मतलब अंधा अगर ये शब्द न समझ आए तो अर्थ है"आँधर"अब समझ आया होगा।गजब का प्रचलन चल पड़ा है।
त्योहार एक दिन में होते थे अब हर त्योहार दो,तीन दिन पड़ने लगा🤣लोगों को त्योहार के नाम से इतनी ज्यादा मौज चाहिए कि त्योहार दस दिन तक बढ़ा दिए गए,त्योहार का मर्म क्या है ये समझना नहीं है,पकवान,मिठाई,कपड़े बस इसी में त्योहार सिमट जा रहे हैं।न जाने कब सुधरेंगे उपभोग के पुजारी।
Written by-Sadhana(Sonam)

9 months ago | [YT] | 1

Sonam Singer(विद्रोही)

🙏महागौरी माँ🙏
नवरात्रि के बाद क्या होगा वही न कि मूर्तियों का विसर्जन।तो क्या सच में विसर्जन यही है?कि कहानी जो बना दी गई उसी का अनुसरण करते आ रहे हो।सबकुछ तो बताया गया है,आपका हर विचार तो दूसरों से लिया गया है,हर इच्छा तो बाहरी है तो विसर्जन मतलब भी बाहरी प्रभाव से जो आपके मन में भरा गया वही है,है न?
"विसर्जन" मतलब जो मन में कूड़ा भरा है चाहे वो कहीं से भी आया हो उसको छोड़ना और मन की सफाई करना👈कुछ लोग तो तैयार होंगे कि नवरात्रि बीते फिर तुरंत मुर्गे और बकरे की बोटी चबाएँ क्योंकि नौ दिन में उनकी तो मीट के बिना जान सूख गई है बेचारे👈हो सकता है कि उनमें से कुछ लोग व्रत भी हों फिर दशहरे के बाद उनकी जीभ और मुँह मीट में मिलेगा मतलब धंसा देंगे वो अपना मुँह उसमें,फिर कहेंगे कि इतने मुर्गे,बकरे पैदा हो रहे हैं खाओ क्योंकि खाने के लिए ही तो पैदा हुए हैं वो।वाह रे इंसान सोंचो अगर तुम्हें ऐसे कोई काटकर खाता तो भी तुम ऐसा ही कहते?घिन आती है ऐसे लोगों से मैं तो ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहती हूँ और धीरे-धीरे ऐसे लोगों को कॉनटैक्ट लिस्ट से भी हटा देना है।क्योंकि जो बेजुबानों पर हिंसा करते हैं वो हिंसक प्रकृति के होते हैं।अभी वो मुर्गा,बकरा चबा रहे हैं वक्त आने पर आपको भी चबाएंगे।
विसर्जन मतलब हर बुरी चीज को छोड़ दो उसका त्याग कर दो।पर लोकधर्मी तो माँ को ही डुबोए पड़े हैं।ऊपर से कोई मूर्ति के साथ गंगा में डूबकर मर गया तो लोग कहते हैं देवी जी की मर्जी थी ले गईं उसे।कसम से इस बात पर इतनी हँसी आती है कि क्या ही बताऊँ🤣वाह रे लोकधर्मियों कसम से🤣🤣🤣
Written by-Sadhana(Sonam)

9 months ago | [YT] | 1

Sonam Singer(विद्रोही)

🙏जय माँ कालरात्रि🙏
सब एक-दूसरे के प्रभाव में आकर सबकुछ कर रहे हैं,लोग एक-दूसरे को देखकर दौड़ लगा रहे हैं पर जाना कहाँ है किसी को नहीं पता।पूँछो तो लोग कहते हैं वो दौड़ रहा है तो मैं भी दौड़ रहा हूँ,दूसरे को देख-देख सब पागल हुए पड़े हैं।बचपन से जो दिमाग में भरा गया व्यक्ति उसी से निर्मित हो गया।अपना तो कुछ है ही नहीं व्यक्ति के पास,खुद के विचार भी नहीं हैं क्योंकि जो विचार मन में बचपन से बैठाया गया वही नींव बन गई और हम सब बड़े होकर जाँच-पड़ताल तक नहीं किए उसी पर जीते गए,कठपुतली की तरह थोपे गए विचारों पर नाचते गए,एक भी विचार हम सब अपने भीतर नहीं पाते हैं जो खुद का हो,सब भरा गया है ये कहकर कि"ऐसा तो करना ही होता है"हमेशा सिखाया गया कि बड़ों की बात मानों पर क्या कभी सोंचा कि बड़ा मतलब क्या?बड़ा अपने रीति-रिवाज,वही घिसी-पिटी आदर्श की बातें भरे जिसका वर्तमान में कोई उपयोग नहीं,तो क्या तब भी वही मानेंगे हम सब?
मुनि अष्टावक्र,नचिकेता इन्हें कभी जाना?कम उम्र में ये सब ग्रंथों की गहरी समझ रखते थे,बड़े-बड़े विद्वानों को इन्होंने परास्त किया।भगतसिंह जो कम उम्र में स्वतंत्रता सिखा गए,देश के लिए प्रेम सिखा गए उन्हें सब भूल गए।यहाँ तो ये देखने को मिल रहा है कि कम उम्र के लोगों ने देश को सही दिशा दिखाई, बात सिर्फ़ ज्ञान की होनी चाहिए उम्र की नहीं,ज्ञान की पूजा ही "सत्य"की पूजा है,बिना बोध के कोई एक कदम आगे नहीं बढ़ा सकता क्योंकि "चेतना"को सिर्फ़ बोध से प्रेम है वो प्रेम और मुक्ति चाहती है।मुक्त चेतना सबको मुक्त कर देती है।
भारत ने महान ग्रंथ दिए उसकी उपेक्षा से ही आज भारत प्रलय के कगार पर है,जनसंख्या चीन से ज्यादा है लेकिन जनसंख्या में"बोध"नहीं है।मानव एक संसाधन है वो अपना उपयोग असीमित कर सकता है सही राह और सही उद्देश्य चुनकर लेकिन भटकाव भी इतने हैं कि लोग भटकाव की ओर आकर्षित हो जाते हैं।नीचे गिरने में मेहनत नहीं लगती लेकिन ऊपर उठने में बहुत मेहनत लगती है।बुरे कार्य व्यक्ति बिना सीखे ही करना सीख जाता है लेकिन अच्छे कार्य में मेहनत लगती है इसलिए व्यक्ति अच्छे कार्य से कतराता है।उदाहरण-आजकल गंदी रील्स,भद्दे गाने पर डांस जल्दी वायरल होते हैं लोगों को फेम मिलने लगता है लेकिन अच्छी बातें कभी वायरल नहीं होती,एड़ी चोटी एक करके अच्छी बातें सब तक पहुँचानी पड़ती है।
Written by-Sadhana(Sonam)

9 months ago | [YT] | 1

Sonam Singer(विद्रोही)

🙏जय माँ कात्यायनी🙏
अब तो शादियों का सीजन आ गया,खूब पैसे उड़ाए जाएंगे कभी दहेज़ के नाम से कभी ढ़ेर सारे सामान,मँहगे कपड़े,मँहगे गहने,बैंक्वेट हॉल आदि आदि में👈मोटी रकम चलेगी तभी तो"बिग फैट वेडिंग"होगी।कितना चस्का होता है लोगों को पैसा और समय बर्बाद करने में हद है।चीजें शांति से भी हो सकती हैं,अपनी मर्ज़ी से दो लोग साथ रहें,दुनिया को बताने की क्या जरूरत?ढ़ोल पीट-पीटकर गाते हो कि लो जी अब बिस्तर एक होने जा रहा है अब सेक्स होने जा रहा है।क्या जरूरत है इतनी निजी बातें,अपनी व्यक्तिगत बातें दूसरों से बताने की?लेकिन वही है कि रीति-रिवाज है,सड़े संस्कार हैं जो कि इंसान ने ही बनाया है और इंसान ही कहता है कि धर्म के नाम से ऐसा होता ही है और ऐसा करना ही होता है, चीजें बदलनी चाहिए लेकिन हो उल्टा रहा है।हर चीज में व्यक्ति परिवर्तन चाहता है पर इन सब में परिवर्तन नहीं हो रहा है।
दूसरे लोगों की बात ही क्या कहूँ?लोग उतावले हैं दूसरों की शादियों में डांस करने को,पूडी-सब्जी खाएंगे और दूसरों की शादी में मजे करेंगे।ऊपर से ये ताकाझाँकी अलग से कि क्या मिला, कितना मिला लड़के और लड़की की तरफ से।ये शादी की संस्था तो सड़ती जा रही है मेरा मतलब है ये गंधाती हुई चीज हो गई है जिसमें से बदबू तो उठ रही है पर लोग गंदगी सूँघने के आदी हो गए हैं।
अभी कल ही एक रील्स देखी,कल ही क्या हर रोज मेरे सामने रील्स आती है, दहेज़ के लिए ससुराल में इतना मारा गया था लड़की को कि पूरे सिर से खून निकल रहा था जहाँ माँग भरी जाती है वहाँ फट गया था,आँख के पास फट गया था और कमेंट में दोहरे चरित्र वाले,दोमुंहे समाज की सान्त्वना थी।
अभिभावकों को कुछ कहना चाहती हूँ कि बेटी को पढ़ाओ और जो पैसा लड़की के दहेज़ के लिए इकट्ठा करते हो उससे बेटी को एक घर दीजिए,उसका अपना घर हो क्योंकि मायका और ससुराल में यही सुनने को मिलता है कि ये तुम्हारा घर नहीं है👈अपना घर रहेगा तो वो अपने हिसाब से जी लेगी नहीं तो मारी ही जाएगी और माँ-बाप,भाई-बहन कहेंगे कि बेटा एडजस्ट कर लो सब ठीक हो जाएगा कुछ ठीक नहीं होगा क्योंकि बेटी लोभी के हाथ में गई तो उसकी लाश ही वापस आएगी।बेटी को एक घर दीजिए दहेज़ के लिए जो इकट्ठा करते हैं।न मायका न ससुराल उसका अपना एक घर हो।बेटी को देवी मानते हो तो उसको अपना एक अलग मंदिर(घर) दीजिए जिसपर सिर्फ़ बेटी का अधिकार हो।
Written by-Sadhana(Sonam)

9 months ago (edited) | [YT] | 1

Sonam Singer(विद्रोही)

🙏जय माँ स्कंदमाता🙏
आज मैं देश में होने वाली आत्महत्याओं पर बोलना चाहती हूँ क्योंकि हर व्यक्ति माँ के ही दायरे में आता है।बचपन से बच्चों पर थोपा जाता है कि ये करो,वो करो सब अपनी इच्छाएँ उसपर लादते जाते हैं।घर में,समाज में,रिश्तेदार ये सब उस बच्चे पर अपने विचार इस कदर थोपते हैं कि वो बच्चा उन विचारों तले दबकर एक दिन मर जाता है।पढ़ाई का बोझ इतना रहता है,नौकरी लेने का बोझ इतना रहता है कि तंग आकर आत्महत्या कर लेता है कि अगर नंबर अच्छे नहीं आए या नौकरी न मिली तो घर,परिवार, रिश्तेदार नोच खाएंगे इसलिए वो अपना आखिरी कदम आत्महत्या की तरफ बढ़ा लेता है।
दूसरे नंबर पर किसान जो कर्ज के मकड़जाल में फँसते जाते हैं और कर्ज लेते जाते हैं, घर में बेटी की शादी करनी होती है किसान दहेज़ के लिए पैसे कहाँ से लाए वो भी एक दिन इसी वजह से फंदे को चुनता है मर जाता है।कोई स्कीम, समाज, दुनिया उस किसान का साथ नहीं देती।
तीसरा जो लड़कियाँ दहेज़ के लिए मारी जा रही हैं,जो अंतिम फैसले में आत्महत्या को चुन रही हैं उनका क्या?वो खुद से आत्महत्या नहीं की उसके लिए उसका घर,समाज और ये दुनिया जिम्मेदार है।घर में तो समाज के दबाव में,रिश्तेदारों के दबाव में शादी तो कर दिया पर जब बेटी ससुराल में मर गई तो समाज आया न्याय दिलाने?नहीं वो सिर्फ़ सान्त्वना देता है दो आँसू बहा देता है फिर निकल लेता है।कृपया सभी माँ-बाप इस समाज नामक बीमारी से दूर रहें उनकी बात पर न चलें अपने बच्चे की पसंद और नापसंद समझें उसपर कुछ थोपें नहीं।
Written by-Sadhana(Sonam)

9 months ago | [YT] | 1

Sonam Singer(विद्रोही)

🙏जय माँ कूष्मांडा🙏
कहीं त्योहारों में मुक्ति की जगह और बंधन में तो नहीं जा रहे हो?त्योहार तो मुक्ति और आत्मज्ञान का प्रतीक हैं।कहीं पकवान, मिठाई, झुमके, घाघरा-चोली,गहनें इनमें तो नहीं फँसे हो?खुद सोंचिए क्या उपभोग की चीजें आपको मुक्ति तरफ ले जाएंगी या और बंधन में?बंधनों से इतना प्यार कि ऐसे बंधे हैं सभी कि अंतिम साँस तक उसे ढ़ोना है।क्या इन नौ दिनों में कोई उँची,बोध को बढ़ाने वाली किताबें आप पढ़ेंगे?क्या जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहे खतरों के खिलाफ कुछ बोलेंगे?क्या अच्छा करने वाले हैं इस नवरात्रि में क्या लिस्ट बनाया है सभी ने कि क्या करना है?लोभ,मोह,काम,क्रोध इनको छोड़ने को सोंचा है?क्या लोगों से ईर्ष्या करना, दिखावा करना, चापलूसी करना आप इस नवरात्रि में छोड़ रहे हैं?
कहीं दानवों की तरह और उपभोग करने का तो नहीं सोंच रहे हैं सब?माँ ने क्या किया था?दानवों को मार डाला👈हम सब दानव हैं जो सिर्फ़ उपभोग किए पड़े हैं जिससे जलवायु परिवर्तन, अपराध, हत्या ये सब बढ़ रहे हैं, हम सब पृथ्वी को दूषित कर रहे हैं पर दिखेगा कहाँ मन में तो कामना भरी है कि और इकट्ठा कर लो चीजें जिससे सुकून मिलेगा।जब माँ ने दानवों को मारा था तो आसमान साफ हो गया था,नदियाँ स्वच्छ हो गई थीं,हवा साफ हो गई थी।ऐसे ही हम सबका भी विनाश करेंगी अगर हम सब दानव ही बने रहे तो।"दुर्गा सप्तशती"पढ़िए सभी सबकुछ उसमें साफ-साफ लिखा है क्या हुआ था परिणाम।
Written by-Sadhana(Sonam)

9 months ago | [YT] | 1