हमारा मकसद ज्ञान, बोध का प्रकाश फैलाना है। पर्यावरण संरक्षण करना, पशु क्रूरता कम करना, महिला शक्ति को मज़बूत बनाना, मानव मात्र का मानसिक विकास करना और अंधविश्वास, पाखंडवाद, जातिवाद, पुरुष सत्तात्मक सोच, अन्याय, शोषण के खिलाफ़ आवाज़ उठाना है।
हमारा मकसद किसी व्यक्ति विशेष, लिंग, जाति, धर्म, मज़हब, समुदाय आदि को नीचा दिखाना नहीं समग्र के उत्थान का प्रयास है।
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अनुगामी
जैसा दिखा वैसा लिखा : पढ़िएगा
सत्य बड़ा या रिश्ता?
सत्य बड़ा या रिश्ता?
चलो बात करते हैं
आहिस्ता—आहिस्ता।
विभीषण ने झूठे रावण को तजा,
और सत्यमुखी राम को भजा,
पर हमने विभीषण को ही दी सज़ा,
माने झूठ में ही है हमारी रज़ा....
झूठ में ही है हमारी रज़ा....
भीष्म झूठे रिश्ते से तार जोड़ते हैं,
क्रूर कौरव खातिर पांडव से मुख मोड़ते हैं।
सत्य, न्याय, अहिंसा छोड़ते हैं,
झूठ की रक्षा वास्ते दौड़ते हैं।
दानवीर कर्ण भी कृष्ण तजते हैं,
दुष्ट दुर्योधन को ही भजते हैं।
यदि हम ज़रा भी सत्यमुखी होते,
तो होलिका नहीं, प्रहलाद पूजते।
हम सत्य से ऐसे नहीं भगते,
बच्चे का नाम विभीषण भी रखते।
झूठ ही बड़ा है हमारे जहाँ में,
सत्य छूटता है लालच की राह में।
आख़िर रिश्ता जीत जाता है,
सत्य हार जाता है,
इंसाँ स्वार्थ की ख़ातिर,
सत्य को भूल जाता है...
इंसाँ स्वार्थ की ख़ातिर,
सत्य को भूल जाता है...
~ अनुगामी अशोक
3 weeks ago | [YT] | 58
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अनुगामी
नमस्ते,
आचार्य जी अक्सर कहते हैं कि शब्द कहीं और से नहीं जीवन से आते हैं।
जैसा हमारा चुनाव होता है, ठीक वैसा ही हमारा जीवन होता है।
बुक स्टॉल और अपने चहुँओर की दीदीओं को लेकर अवलोकन को काव्यात्मक रूप में बनाया है। जैसा दिखा, वैसा लिखा। पढ़िएगा......
नारी: रूप या विवेक?
दीदी, तू बनी पापा की परी,
भाई की लाडली बहिनी,
साजन की प्रिय सजनी,
और संतानों की जननी।
पर बता, इसमें कहाँ हैं
तेरे अपने कौशल और करनी?
कितना उचित है जीवन भर
अपेक्षाएँ दूसरों पर धरनी?
तुझे यह भी ज्ञात नहीं—
यह सच्चा संबल नहीं,
भविष्य भी उज्ज्वल नहीं,
यदि जीवन में आत्मबल नहीं।
आज की यह देह-सुंदरता
कल क्षीण हो जाएगी,
बिना बल और बुद्धि के
तू स्वयं को कुंठित पाएगी,
दूसरों के आगे हाथ फैलाएगी,
बच्चे संग जग हेतु क्रूर हो जाएगी,
फिर केवल किस्मत का आलाप गाएगी?
आज की तेरी मक्कारी
कल बन सकती लाचारी,
फिर भटकेगी मारी-मारी,
और बनेगी सबकी बीमारी।
इसलिए रूप नहीं, विवेक को पहचान दे,
केवल शरीर नहीं, समझ पर ध्यान दे।
स्वयं को बल, बुद्धि और ज्ञान दे—
यही अपने आप को सच्चा वरदान दे।
यही अपने आप को सच्चा वरदान दे।
~ अनुगामी अशोक
1 month ago | [YT] | 65
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अनुगामी
नमस्कार,
आम आदमी और उसके चुनाव पर आचार्य प्रशांत जी के सत्रों की सीख को काव्यात्मक रूप में ढालने का प्रयास किया है। पढ़िएगा ―
एक मूढ़ मतदाता
मैं आम आदमी हूँ, सड़क से बोल रहा हूँ,
आज सरेआम, अपनी ही पोल खोल रहा हूँ।
मेरा अपना न वजूद, न पहचान है,
सत्ता की मंशा ही मेरी जुबान है।
बाबाजी मुझे बहुत बहलाते हैं,
अंधविश्वास और पाखंड में उलझाते हैं।
विज्ञान को अज्ञान कह इठलाते हैं,
इक्कीसवीं सदी में पाषाणवी भेष बनाते हैं।
चालाकी से जमीनी सवाल छिनवाते हैं,
बाबाजी मुझे तीसरे लोक ले जाते हैं।
बाबाजी-सेठजी-नेताजी एक हैं,
भीतर से खोखले, लेकिन बाहर से नेक हैं।
मुझमें जरा भी न विवेक है,
मेरा वोट बस मद का पेग है।
तीनों मिल मुझ पर राज करते हैं,
कामना जगा, मुझे बेपनाह छलते हैं।
ये तीनों मुझसे ही आते हैं,
मेरी ही ताकत से चलते हैं,
मेरी अज्ञानता की गोद में पलते हैं।
मैं एक मूढ़ मतदाता,
मुझे शर्ट तक चुनना नहीं आता,
तो कैसे चुनता सही नेता,
मेरा मत मुझे ही खाता।
मैं बिकता भी हूँ, मैं डरता भी हूँ,
मैं अपने ही कातिल की खातिर मरता हूँ।
बेड़ियों में भी खुद को स्वतंत्र कहता हूँ,
तानाशाही चुन, लोकतंत्र-लोकतंत्र करता हूँ।
मैं आम आदमी हूँ, सड़क से बोल रहा हूँ,
आज सरेआम, अपनी ही पोल खोल रहा हूँ।
~ अनुगामी अशोक
1 month ago | [YT] | 95
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अनुगामी
नमस्कार,
बुक स्टॉल पर दीदियाँ ख़ूब आती हैं, वो बुक भी पढ़ना चाहती हैं लेकिन अक़्सर दुसरों पर निर्भर होती हैं।
कभी उनका भाई, पिता-पति साथ होता है तो कभी दोस्त। जब दीदी क़िताब ख़रीदने का प्रयास करती है तो वो उसे स्टॉल से खींचकर ले जाते हैं, नाना प्रकार के ताने मारकर। वो विरोध भी नहीं कर पाती।
दीदी की बेबसी और मक्कारी से रोज़ ही परिचय होता है। उसी अवलोकन को काव्यात्मक रूप में लिखने का प्रयास किया है। पढ़िएगा ―
*ओ लड़की, तू ऐसी क्यों है?*
ओ लड़की, तू ऐसी क्यों है?
बचपन बीता पिता-भ्रात संग,
यौवन सखा और साजन संग,
भीड़ में खोया अपना ही रंग,
अपनों में भी तू पराई क्यों है?
ओ लड़की, तू ऐसी क्यों है?
न खेल के मैदान में दिखती,
न लहरों से लड़ना सीखती,
न कलम की ऊँची उड़ान उड़ती,
पर बाज़ारों में तू खूब बिकती!
स्वयं से तू इतनी दूर क्यों है?
ओ लड़की, तू ऐसी क्यों है?
तू पति पर ही आश्रित रहती,
शोषण भी मूक होकर सहती,
सहनशीलता की ओट में छिपती,
मुँह से उफ़्फ़ भी न कहती!
मज़बूरी की तू मूरत क्यों है?
ओ लड़की, तू ऐसी क्यों है?
दफ़्तर-दुकान का तू 'शो-पीस' बनती,
अपने ही घर में 'मेहमान' बनती,
हैवान के सम्मुख लाचार बनती,
तू क्यों न स्वयं 'पहलवान' बनती?
तेरी शक्ति अब सुप्त क्यों है?
ओ लड़की, तू ऐसी क्यों है?
तू सरस्वती बन, ज्ञान अर्जन कर,
तू दुर्गा बन, असुर-मर्दन कर,
चंडी बन चांडालों से लड़,
जो बेड़ियाँ तुझको बांधना चाहें,
उनका तू मस्तक हर!
ओ लड़की, अब उठ और लड़!
ओ लड़की, अब उठ और लड़!
~अनुगामी अशोक
अप्रैल 28, 2026 || 22:00
#AcharyaPrashant #Poems #WomenEmpowerment
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2 months ago | [YT] | 145
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अनुगामी
नमस्ते,
पिछले गीता सत्र में हमने श्रीकृष्ण को स्वयं का स्वयं से परिचय करवाने वाली दिशा जाना।
इसके उलट समाज ने उन्हें कैसे जाना और क्या माना। इस पर आधारित काव्य आपके साथ साझा है ―
*“आस्था या अभिनय?”*
हम कृष्ण-कृष्ण खूब करते हैं,
पर गीता से कोसों दूर रहते हैं।
बालगोपाल बना भजते हैं,
छलिया कहकर छलते हैं,
ग्वाला बना तकते हैं,
गीता के कृष्ण से भगते हैं।
कान्हा-कान्हा बुलाते हैं,
दूध-माखन खूब खिलाते हैं,
बछड़े को नहीं पिलाते हैं,
दूध निचोड़ गाय को भगाते हैं।
अपने किए से तनिक न अघाते हैं,
ऐसे हम कृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं।
लड्डू-लड्डू उन्हें बुलाते हैं,
अपने हाथों से खिलाते हैं।
बाप को बच्चे की भाँति नहलाते हैं,
पालनहार को पालना झुलाते हैं,
डलिया में घुमाते हैं।
गीता पढ़ाने वाले को
बुत बना स्कूल में पढ़वाते हैं,
मनमुताबिक मूर्ति गढ़वाते हैं,
अपनी गीता उनके मुख से बुलवाते हैं।
कृष्ण को खिलौना बना
नाना-नाच नचवाते हैं।
निराकार को आकार देते हैं,
योगी को भोगी बनाते हैं,
निश्छल को छलिया बुलाते हैं,
गीताकार को भुलाते हैं।
— अनुगामी अशोक
#AcharyaPrashant
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3 months ago | [YT] | 48
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अनुगामी
नमस्कार 🙏
पिछली नवरात्रि से हमारा बुक स्टॉल लगभग रोज़ ही लग रहा है। 📚✨
नवंबर-दिसंबर में तो हमने हमारे ही रिकॉर्ड ही तोड़ दिए — 50 दिनों में लगभग 800 पुस्तकें वितरित कर, बोध के हज़ारों नव दीप प्रज्वलित किए। 🪔🔥
यहीं से हमारी हिम्मत और बढ़ी। 💪
शिवा ने अपनी बैलगिरी (नौकरी) छोड़कर पूरे समय बुक स्टॉल को चुनने का साहस दिखाया — जबकि उन्हें बुक स्टॉल से जुड़े हुए 6 महीने भी नहीं हुए थे।
👉 ये मेरे मुँह पर तमाचे जैसा है।
और मैं… 😔
बरसों से बुक स्टॉल, अनुलेखन, कंटेंट राइटिंग मिशन से जुड़ा होने के बाद भी बैलगिरी नहीं छोड़ पाया। अभी भी प्रयास जारी है...
कारण — मेरे स्वार्थ ज़्यादा हैं:
👶 बच्चे की पढ़ाई
🏠 घर खर्च
💸 कर्ज़ आदि
खैर...
---
🚨 कहानी पलटती है अब...
16 मार्च, रात 12:00 बजे
हम रोज़ की तरह बुक स्टॉल से घर लौट रहे थे। 🚶♂️
स्पीड भी बस 30–35 km/h — आराम से, बातें करते हुए...
घर से सिर्फ 2 किलोमीटर दूर थे कि अचानक एक कार ने ज़ोरदार टक्कर मार फ़रार हो गई। 💥🚗
पलक झपकते ही हम और गाड़ी कई पलटियाँ खा गए। 😳
मैंने हेलमेट पहना था, पर शिवा ने नहीं।
वो सड़क पर टकरा रहा था… उसकी आवाज़ मैं सुन रहा था…
एक पल को लगा — अब नहीं बचेंगे। 🥺
जब मैंने शिवा को उठाया तो लगा उसका सिर फट गया है।
सिर, मुँह, नाक, हाथ — सब जगह खून था। 🩸
वो अचेत हो गई।
---
मैंने तुरंत 108 पर कॉल किया 🚑
हम एम्स अस्पताल पहुँचे।
कुछ ही देर में समझ आ गया:
👉 मेरा पैर तीन जगह से फ्रैक्चर 😓
👉 शिवा को गंभीर चोटें 🤕
रात के 1 बज चुके थे
हमने किसी को परेशान करना उचित नहीं समझा —
अपना काम खुद किया। 💪
एक सज्जन ने मदद की 🙏
दवा-पानी लाकर दिया।
---
🏥 अगला दिन...
शिवा का सिर अभी भी सुन्न था
आँखें सूजकर नीली पड़ गई थीं 😢
डॉक्टर ने तीन अलग-अलग CT-Scan करवाया गया
👉 खुशी की बात: कोई गंभीर समस्या नहीं मिली 🙏✨
दवाइयाँ जारी हैं
पर शिवा की सूजन अभी भी कम नहीं हुई 😔
---
😄 पूरे घटनाक्रम में "मौज" में कोई कमी नहीं रही...
इलाज के दौरान भी हम साहब कबीर के दोहे गा रहे थे:
_"जिस मरनी से जग डरे, मेरो मन आनंद।" 🎶_
मैं अपनी व्हीलचेयर खुद चला रहा था 🦽
और शिवा — बिलिंग से लेकर इलाज तक सब खुद 😄
---
📸 फोटो लेने की बारी आई तो...
फ़ोटो देख आप ही समझ सकते हैं! 😄
जब मैं व्हीलचेयर चला रहा था, शिवा ने कहा:
👉 “भाई, तुम तो गाड़ी-गाड़ी खेल रहे हो, मुझे भी चलाने दो ना!” 😂
मैंने दे दी!
और मज़ाक में कहा:
👉 “ठोक मत देना!” 😅
वो बोली: “नहीं भाई, अभी जीना है!” 😄
---
एक भाई ने पूछा: क्या हुआ?
शिवा बोली:
👉 “खंडहर अपनी कहानी खुद बता रहा है, तुम्हें समझ नहीं आ रहा!” 😂🔥
---
😔 अब स्थिति...
❌ बुक स्टॉल बंद
😞 हम हताश, निराश...
---
🌟 लेकिन फिर उम्मीद...
कल एक पुराने स्वयंसेवक डॉ. राहुल जी का फोन आया ☎️
👉 “क्या मैं बुक स्टॉल लगा सकता हूँ?”
ये सुनकर तो मन खुश हो गया 😄
अंधे को और क्या चाहिए — 👀✨
👉 राहुल जी पिछले 2 दिनों से अकेले स्टॉल लगा रहे हैं
बहुत-बहुत धन्यवाद राहुल जी! 🙏❤️
---
🔔 आप सभी से निवेदन
जो भी कर सकते हो —
👉 अभी सही और ऊँचा काम चुन लीजिए
क्योंकि आगे…
👉 चाहकर भी नहीं कर पाओगे।
⚠️ ये मैं नहीं…
👉 मेरी टूटी टांग बोल रही है। 🦵💔
---
🙏 हमें सांत्वना देने से पहले
👉 अपने सही चुनाव को बल अवश्य दीजिएगा।
*इस दुनिया को आचार्य जी के काम की बहुत-बहुत ज़रूरत है। यदि उस कार वाले तक आचार्य जी की शिक्षा पहुँची होती तो शायद ये हादसा न होता और होता तो वो कम से कम भागता तो नहीं।*
---
सधन्यवाद ❤️
#AcharyaPrashant
Posted by अनुगामी अशोक on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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3 months ago | [YT] | 201
View 26 replies
अनुगामी
नमस्कार,
अब आपके साथ लगातार कविताएँ साझा होती रहेगी। कविताओं के माध्यम से मैं समाज की गंदगी सामने लाने का प्रयास करता हूँ।
4 months ago (edited) | [YT] | 9
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अनुगामी
समाज कहूँ कि साँप?
हाय रे समाज! कैसा ये तेरा राज़ है,
ख़ौफ से तेरे मानव पलटता काज है।
तू कैसा दिखता? रहता कहाँ है?
तेरे से काँपता क्यों जहाँ है?
तू कैसे बना खलनायक है?
सच तजवाता, तू इस लायक है?
कुंती तेरे ख़ातिर प्रेमी को छुपाती है,
सूरज से सुत को नदी में बहाती है।
कुंती-प्रेमी संग संतान ― एक तरुवर हैं,
सजीव जड़-मूल-शाखा, न कि पत्थर हैं।
तरु, जड़-मूल-डाली को कैसे तज सकता है,
कोई सत्य को तज समाज कैसे भज सकता है?
कुंती स्व-सच से अलग कैसे जीती है,
तू ही बता उस पर क्या-क्या बीती है?
सत्य से बड़ा समाज नहीं हो सकता है,
आमजन को ये क्यों नहीं पचता है?
सत्यप्रेमी को समाज क्यों डसता है?
ज़रा विचारो! ये खेल कौन रचता है?
~ अनुगामी अशोक
फरवरी 13, 2026 || 10:11
4 months ago | [YT] | 50
View 3 replies
अनुगामी
नमस्कार,
जिन लोगों की हम इज्जत कर रहे हैं, वह क्या सोचेंगे इससे डर रहे हैं, उनकी नजर में अच्छा दिखना चाह रहे हैं, उनसे सम्मान चाह रहे हैं; एक नजर उनकी ओर देख लो ईमानदारी से, उनको सच्चाई को लेकर के कितना प्रेम है।
*समाज की सच्चाई प्रत्येक्ष देखना हो तो बुक स्टॉल सबसे अच्छा माध्यम है।*
समाज और सच्चाई को लेकर के हमारे साथ घटी घटना को काव्यात्मक रूप में आपके सामने रखने का प्रयास है ―
*सच समाज का*
कल का दिन था मतवाला,
समाज ने शिक्षा का विरोध कर
दिखाया अपना मुँह काला।
हम सफ़ाई को निकले थे,
ले साहब कबीर का प्रेम-प्याला,
समाज स्वयं है एक गंदा नाला,
यहाँ समर्थन का रहता हमेशा लाला।
हमें धमकाकर, भगाकर,
समाज चाहता है—
सही शिक्षा के साहस पर
जड़ दे ताला।
समाज ने केवल आज ही
सही ज्ञान का विरोध थोड़े ही किया,
अज्ञान सदा से रहा है उसका पिया।
कल अभियान की योद्धा थी स्त्री,
उसमें झलक रही थी
बाई सावित्री।
अकेली डटी,
जूझ रही थी निरंतर,
तथ्यों पर तथ्य रख,
स्थिर थी अंदर ही अंदर।
वो तनी थी
तमाम कमज़ोरियाँ भूलाकर,
डर को स्वयं से जुदाकर।
संयोग से मैं पहुँचा होले होले—
मानो जैसे आ गए ज्योतिबा फूले।
हमने क्रूर समाज से
आँखों में आँखें डाल
बराबर युद्ध किया,
चलते संघर्ष के बीच
दो ग्रंथ
हाथों-हाथ
लोगों को दिया।
हम ऐसे हार मानने वाले नहीं,
जब तक चेतन हैं—
तब तक चुनाव करेंगे
सही-सही।
~ अनुगामी अशोक
दिसम्बर 07, 2025 || 24:15
5 months ago | [YT] | 393
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अनुगामी
*हमारा ख़सम?*
हर समस्या का हल मत पूछो,
सभी झुन्नूओं (मूढ़) से,
दीये रोशनी नहीं माँगते
कभी जुगनुओं से।
निष्काम कलम
हर बात पर बोलेगी,
समाज में व्याप्त
मूर्खता को खोलेगी,
सच के आईने में
हर परत को तोलेगी।
झूठ के आगे
जो मौन पाए जाएँगे,
वे कमजोर नहीं,
कायर कहलाएँगे।
जो मिथ्यात्व के आगे
मुँह खोलेंगे,
हम उनसे प्रेरणा लेंगे,
स्वयं को सत्य की
तराज़ू पर तोलेंगे।
जो होगा सत्यमुखी अहंकार,
हम उससे ही करेंगे प्यार,
सत्य है ―
हमारा ख़सम, हमारा यार,
झूठ की कभी
न करेंगे जय-जयकार।
~ अनुगामी अशोक
दिसम्बर 19, 2025 || 15:54
6 months ago | [YT] | 687
View 17 replies
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