Tarun Verma - Clinical Psychologist

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Tarun Verma - Clinical Psychologist

वैज्ञानिकों ने कम्पल्सिव बिहेवियर (जैसे बार-बार हाथ धोना) के पीछे एक नई वजह खोजी है। पहले माना जाता था कि यह एक 'बुरी आदत' है जो अपने आप (ऑटोपायलट पर) होती है, लेकिन नई रिसर्च के अनुसार इसके पीछे दिमाग की सूजन (inflammation) हो सकती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी की इस रिसर्च से पता चला है कि दिमाग के खास हिस्से (striatum) में सूजन होने पर व्यवहार 'स्वचालित' होने के बजाय और भी ज़्यादा 'सोच-समझकर' (deliberate) किया जाने लगता है। यह बदलाव एस्ट्रोसाइट्स नामक कोशिकाओं के बढ़ने के कारण होता है, जो दिमाग के संदेश भेजने वाले रास्तों में रुकावट डालती हैं। इसका मतलब है कि ओसीडी (OCD) जैसी समस्याओं में व्यक्ति अपना नियंत्रण खोता नहीं है, बल्कि उसका दिमाग ज़रूरत से ज़्यादा पर गलत दिशा में कोशिश करने लगता है। इस खोज से भविष्य में सूजन कम करने वाली दवाओं, कसरत और बेहतर नींद जैसे नए इलाजों की उम्मीद जागी है।

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2 months ago | [YT] | 42

Tarun Verma - Clinical Psychologist

Northwestern University की नई रिसर्च ने Schizophrenia के इलाज में एक बड़ी सफलता हासिल की है। वैज्ञानिकों ने Cacna2d1 नामक एक protein biomarker की पहचान की है, जिसकी कमी से दिमाग के सर्किट्स बहुत ज़्यादा सक्रिय (overactive) हो जाते हैं।
इस कमी को दूर करने के लिए शोधकर्ताओं ने SEAD1 नामक एक सिंथेटिक प्रोटीन बनाया है।
चूहों पर हुए परीक्षण में, इस प्रोटीन के एक इंजेक्शन ने दिमाग के खराब सर्किट्स को ठीक कर दिया और व्यवहार में सुधार लाया, वह भी बिना किसी साइड इफेक्ट के।
यह तकनीक दिमाग की plasticity को बढ़ाकर नए कनेक्शन बनाने में मदद करती है।
वैज्ञानिकों का लक्ष्य भविष्य में एक blood test विकसित करना है जिससे सही मरीजों की पहचान हो सके।
इसके बाद उन्हें Ozempic की तरह हफ्ते में एक बार इंजेक्शन दिया जा सकेगा, जिससे उनकी सोचने-समझने की क्षमता (cognitive functions) बेहतर होगी और वे समाज में घुल-मिल सकेंगे।

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2 months ago | [YT] | 50

Tarun Verma - Clinical Psychologist

MIT की नई रिसर्च के अनुसार, Schizophrenia का संबंध एक खास जीन म्यूटेशन से है जिसे grin2a कहते हैं। यह म्यूटेशन दिमाग के उस सर्किट को प्रभावित करता है जो नई जानकारी के आधार पर हमारी पुरानी मान्यताओं (prior beliefs) को अपडेट करता है।
सामान्य तौर पर, हमारा दिमाग हकीकत को समझने के लिए नई सूचनाओं का इस्तेमाल करता है, लेकिन सिज़ोफ्रेनिया में मरीज पुरानी धारणाओं पर ही ज़्यादा निर्भर रहते हैं, जिससे वे वास्तविकता से कट जाते हैं
। वैज्ञानिकों ने पाया कि यह समस्या मुख्य रूप से mediodorsal thalamus और prefrontal cortex के बीच के सर्किट में खराबी के कारण होती है, जो निर्णय लेने की क्षमता को नियंत्रित करता है।
अच्छी खबर यह है कि शोधकर्ताओं ने optogenetics तकनीक का उपयोग करके चूहों में इस व्यवहार को ठीक करने में सफलता पाई है
। यह खोज भविष्य में ऐसी दवाइयां विकसित करने की उम्मीद जगाती है जो मरीजों की सोचने और निर्णय लेने की क्षमता (cognitive functions) को बेहतर बना सकें।

#schizophrenia #psychosis #delusion #genetics #beliefs #cbt

3 months ago | [YT] | 37

Tarun Verma - Clinical Psychologist

हालिया रिसर्च के अनुसार, मानसिक बीमारियों के इलाज में भांग (Cannabis) आधारित दवाइयां उम्मीद के मुताबिक असरदार नहीं पाई गई हैं। 'द लांसेट' में छपी एक स्टडी ने 54 क्लीनिकल ट्रायल्स की समीक्षा की और पाया कि एंग्जायटी (चिंता), PTSD और साइकोटिक विकारों के लिए इनके इस्तेमाल का कोई ठोस सबूत नहीं है।
हैरानी की बात यह है कि डिप्रेशन के लिए भांग के असर की जांच करने वाला कोई भी रैंडमाइज्ड ट्रायल नहीं मिला
। हालांकि, कुछ छोटे फायदों के संकेत मिले हैं, जैसे अनिद्रा (insomnia) में सुधार या ऑटिज्म के कुछ लक्षणों में कमी, लेकिन इनका वैज्ञानिक आधार अभी बहुत कमजोर है
। एक्सपर्ट्स का कहना है कि बेहतर रिसर्च होने तक मानसिक स्वास्थ्य के लिए इन दवाओं का नियमित इस्तेमाल सही नहीं है। यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि लोकप्रिय होने के बावजूद, ये उत्पाद कई स्थितियों में काम नहीं करते।

#cannabis #weed #psychosis #anxiety #ptsd #tics #insomnia

3 months ago | [YT] | 21

Tarun Verma - Clinical Psychologist

अल्जाइमर होने के लिए सिर्फ पारिवारिक इतिहास होना ही ज़रूरी नहीं है, लेकिन अगर माता-पिता या भाई-बहन को यह बीमारी है, तो जोखिम बढ़ सकता है
। इसके पीछे मुख्य रूप से दो तरह के जीन होते हैं: 'रिस्क जीन' (जैसे APOE-e4) जो बीमारी की संभावना बढ़ाते हैं, और 'डिटरमिनिस्टिक जीन' जो सीधे तौर पर बीमारी का कारण बनते हैं, हालांकि ये बहुत कम (1% से भी कम) मामलों में पाए जाते हैं।
जीन के अलावा, जीवनशैली के कारक जैसे नींद की कमी, धूम्रपान, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज भी इस खतरे को और बढ़ा सकते हैं
। जेनेटिक टेस्टिंग के विकल्प मौजूद हैं, लेकिन विशेषज्ञों की सलाह है कि टेस्ट कराने से पहले डॉक्टर या काउंसलर से बात ज़रूर करें
। वर्तमान में कुछ नई दवाएं दिमाग में जमा होने वाले 'एमाइलॉयड' प्रोटीन को हटाकर बीमारी के असर को धीमा करने में मदद कर रही हैं।

#alzheimer #genetics #dementia #hereditary

3 months ago | [YT] | 24

Tarun Verma - Clinical Psychologist

वैज्ञानिकों ने PA-915 नाम का एक नया मॉलिक्यूल विकसित किया है, जो डिप्रेशन और एंग्जायटी (चिंता) के इलाज में क्रांतिकारी साबित हो सकता है
। यह मॉलिक्यूल दिमाग में 'PAC1' रिसेप्टर्स को ब्लॉक करता है, जो तनाव और घबराहट पैदा करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
चूहों पर हुई रिसर्च में पाया गया कि PA-915 का असर बहुत तेज़ और लंबे समय (लगभग 8 हफ़्तों) तक रहता है
। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें दूसरी दवाओं की तरह साइड इफेक्ट्स नहीं देखे गए, जैसे कि याददाश्त की कमी, बहुत अधिक छटपटाहट या नशे की लत लगना।
इस मॉलिक्यूल का असर 'केटामाइन' जैसी दवाओं के समान पाया गया है। हालांकि अभी यह परीक्षण जानवरों पर हुआ है, लेकिन भविष्य में यह इंसानों के लिए तनाव से जुड़ी बीमारियों का एक सुरक्षित और बेहतर इलाज बन सकता है।

#anxiety #vaccine #depression #stress

3 months ago | [YT] | 40

Tarun Verma - Clinical Psychologist

Synapsy के वैज्ञानिकों ने पाया है कि व्यायाम के दौरान बनने वाला लैक्टेट (lactate) अणु डिप्रेशन से लड़ने में प्रभावी है। यह मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस में नए न्यूरॉन्स के उत्पादन (neurogenesis) को पुनर्जीवित करता है, जो तनाव या डिप्रेशन के कारण बाधित हो जाता है। शोध से पता चला है कि लैक्टेट के रूपांतरण से उत्पन्न NADH अणु अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों के माध्यम से न्यूरॉन्स की रक्षा करता है।
यह खोज स्पष्ट करती है कि शारीरिक गतिविधि मानसिक स्वास्थ्य के लिए क्यों फायदेमंद है। यह उन 30% रोगियों के लिए उपचार के नए विकल्प खोल सकता है जिन पर मौजूदा एंटीडिप्रेसेंट दवाएं असर नहीं करतीं। लैक्टेट विशेष रूप से एनहेडोनिया (anhedonia) यानी खुशियों में रुचि की कमी जैसे गंभीर लक्षणों को कम करने में सक्षम है।

#lactate #exercise #depression #antidepressant #neurogenesis #anhedonia

5 months ago | [YT] | 30

Tarun Verma - Clinical Psychologist

वर्जीनिया कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी (VCU) के शोधकर्ताओं ने नवजात शिशुओं के डीएनए (DNA) में ऐसे संकेतों की पहचान की है जो भविष्य में स्किज़ोफ्रेनिया (schizophrenia) विकसित होने के जोखिम को दर्शा सकते हैं। इस अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में स्वीडन के 333 शिशुओं के जन्म के तुरंत बाद लिए गए रक्त के नमूनों का विश्लेषण किया गया, जिसमें 2.4 करोड़ मिथाइलेशन मार्क्स की जांच की गई।
इन निष्कर्षों की पुष्टि 595 मस्तिष्क के नमूनों और हजारों वयस्कों के रक्त डेटा के साथ की गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, डीएनए मिथाइलेशन वह प्रक्रिया है जिसमें पर्यावरणीय कारक यह तय करते हैं कि कौन से जीन सक्रिय होंगे। इस शोध का मुख्य उद्देश्य बायोमार्कर विकसित करना है ताकि बीमारी का जल्दी पता (early detection) लगाया जा सके और समय पर उपचार शुरू किया जा सके, जिससे रोगियों और समाज पर इसके गंभीर प्रभाव को कम किया जा सके।

#schizophrenia #psychosis #neonate #infant #earlyintervention #dna #genetics

5 months ago | [YT] | 22

Tarun Verma - Clinical Psychologist

RCSI यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसिन एंड हेल्थ साइंसेज के एक नए शोध के अनुसार, किशोरों के रक्त में ओमेगा-3 फैटी एसिड का उच्च स्तर भविष्य में मनोविकृति (psychosis) के जोखिम को कम करने में सहायक हो सकता है। 'चिल्ड्रन ऑफ द 90s' अध्ययन के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि 17 साल की उम्र में DHA (एक प्रकार का ओमेगा-3) के उच्च स्तर वाले किशोरों में 24 साल की उम्र तक मानसिक विकार विकसित होने की संभावना 56% कम पाई गई।
शोधकर्ताओं के अनुसार, ओमेगा-3 सूजन (inflammation) को कम करता है, जबकि ओमेगा-6 इसे बढ़ा सकता है। अध्ययन यह सुझाव देता है कि तैलीय मछली या सप्लीमेंट्स के माध्यम से ओमेगा-3 का सेवन बढ़ाने से शुरुआती वयस्कता में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को रोकने में मदद मिल सकती है। यह प्रभाव मस्तिष्क में सूजन कम करने या तंत्रिका कनेक्शनों के उचित प्रबंधन से संबंधित हो सकता है।

#schizophrenia #psychosis #omega3 #omega6 #dha #scfa

5 months ago | [YT] | 24

Tarun Verma - Clinical Psychologist

ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के एक नए शोध के अनुसार, सात घंटे से कम की नींद आपकी उम्र को कम कर सकती है,। शोधकर्ताओं ने पाया कि नींद की कमी, खराब आहार, व्यायाम की कमी या अकेलेपन की तुलना में जीवन प्रत्याशा (life expectancy) को अधिक प्रभावित करती है,। अध्ययन के अनुसार, केवल धूम्रपान ही उम्र को प्रभावित करने वाला इससे बड़ा कारक है।
2019 से 2025 के डेटा के विश्लेषण से पता चला है कि स्वस्थ और लंबे जीवन के लिए 7 से 9 घंटे की नींद लेना अनिवार्य है,। नींद न केवल शरीर को आराम देती है, बल्कि यह हृदय स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधक क्षमता (immune function) और मस्तिष्क की कार्यक्षमता के लिए भी महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का मानना है कि हमें नींद को आहार और व्यायाम के समान ही प्राथमिकता देनी चाहिए।

#insomnia #sleep #lifeexpectancy #longevity #immunity

5 months ago | [YT] | 22