Advocate Brahamdatt

नमस्कार दोस्तों,
मैं Advocate Brahamdatt (Agra) इस चैनल के माध्यम से आपको कानून से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सरल हिंदी में बताता हूँ।
इस चैनल पर आपको मिलेंगे:
✔️ नए कानूनों की जानकारी
✔️ कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले
✔️ IPC / BNS / CrPC / BNSS की जानकारी
✔️ मोटर व्हीकल एक्ट के नियम
✔️ आम लोगों के कानूनी अधिकार
मेरा उद्देश्य है कि हर व्यक्ति को अपने अधिकारों और कानून की सही जानकारी मिले।
📍 प्रैक्टिस: जिला एवं सत्र न्यायालय, आगरा
📍 उच्च न्यायालय: Allahabad High Court
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Legal Helpdesk

⚖️ शिकायत खारिज (Dismissal of Complaint) करने वाले आदेश को पुनरीक्षण (Revision) में चुनौती दिए जाने पर, जिन व्यक्तियों के पक्ष में वह आदेश कार्य करता है, उन्हें धारा 401(2) CrPC के अंतर्गत सुनवाई का अवसर प्रदान करना अनिवार्य है; बिना सुनवाई के पारित पुनरीक्षण आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा : सुप्रीम कोर्ट

🏛️ मामला : M/s Prime Impex Ltd. & Ors. v. M/s P.E.C. Ltd. & Anr.
📌 Criminal Appeal No. 480 of 2013 (Arising out of SLP (Crl.) No. 6102 of 2012)
📅 निर्णय दिनांक : 18 मार्च 2013
⚖️ पीठ : माननीय न्यायमूर्ति एच. एल. दत्तु एवं माननीय न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर
🏛️ न्यायालय : भारत का सर्वोच्च न्यायालय

⚖️ संक्षिप्त तथ्य

मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायत वाद (Complaint Case No.4060 of 2011) में शिकायत को खारिज कर दिया गया था। उक्त आदेश को शिकायतकर्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition No.456 of 2011) द्वारा चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट के आदेश में हस्तक्षेप किया, किन्तु ऐसा करते समय उन व्यक्तियों को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया, जिनके पक्ष में मजिस्ट्रेट का आदेश कार्य कर रहा था।

इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई।

⚖️ सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने कहा—

> धारा 401(2) CrPC यह स्पष्ट रूप से अनिवार्य करती है कि पुनरीक्षण न्यायालय कोई ऐसा आदेश पारित नहीं करेगा जो किसी अभियुक्त अथवा अन्य व्यक्ति के प्रतिकूल हो, जब तक उसे सुनवाई का अवसर न दिया जाए।

न्यायालय ने Manharibhai Muljibhai Kakadia v. Shaileshbhai Mohanbhai Patel, (2012) 10 SCC 517 के निर्णय पर भरोसा किया।

⚖️ Pre-Process Stage में भी सुनवाई का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा—

> यह तथ्य कि मजिस्ट्रेट द्वारा अभी तक प्रक्रिया (Process) जारी नहीं की गई थी, सुनवाई के अधिकार को समाप्त नहीं करता।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—

> यदि शिकायत खारिज होने के आदेश को पुनरीक्षण में चुनौती दी जाती है, तो उस आदेश से लाभान्वित व्यक्तियों को सुनवाई का अधिकार प्राप्त हो जाता है, क्योंकि पुनरीक्षण में आदेश पलटने से शिकायत पुनर्जीवित (Revive) हो सकती है।

⚖️ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने पुनः स्थापित किया—

> Audi Alteram Partem अर्थात् "दूसरे पक्ष को भी सुना जाए" प्राकृतिक न्याय का मूलभूत सिद्धांत है।

न्यायालय ने कहा कि—

> किसी व्यक्ति के पक्ष में कार्यरत आदेश को बिना उसे सुने निरस्त करना न्यायसंगत प्रक्रिया के विपरीत है।

⚖️ धारा 401(2) CrPC की व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने कहा—

> धारा 401(2) CrPC के अंतर्गत 'Other Person' शब्द का दायरा व्यापक है और इसमें वे व्यक्ति भी शामिल हैं जिनके विरुद्ध शिकायत की गई थी, भले ही उनके विरुद्ध अभी तक समन जारी न हुआ हो।

न्यायालय ने कहा कि—

> सुनवाई का अधिकार केवल इस कारण समाप्त नहीं किया जा सकता कि मामला अभी Pre-Summoning Stage पर है।

🎯 अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि—

✅ हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका का निर्णय करते समय अपीलकर्ताओं को सुनवाई का अवसर नहीं दिया;

✅ ऐसा करना धारा 401(2) CrPC एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था।

फलस्वरूप—

✅ दिल्ली हाईकोर्ट के दिनांक 13.10.2011 के आदेश को निरस्त कर दिया गया;

✅ मामला पुनः हाईकोर्ट को विधि के अनुसार नए सिरे से निर्णय हेतु वापस भेज दिया गया;

✅ सभी पक्षों के तर्क खुले रखे गए।

🎯 विधिक सिद्धांत (Ratio Decidendi)

> यदि शिकायत खारिज करने वाले आदेश को पुनरीक्षण में चुनौती दी जाती है, तो शिकायत में नामित व्यक्तियों को धारा 401(2) CrPC के अंतर्गत सुनवाई का अधिकार प्राप्त होता है।

> Pre-Process Stage होने मात्र से सुनवाई का अधिकार समाप्त नहीं होता।

> पुनरीक्षण न्यायालय किसी व्यक्ति के पक्ष में कार्यरत आदेश को बिना उसे सुने निरस्त नहीं कर सकता।

> प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत आपराधिक पुनरीक्षण कार्यवाहियों पर समान रूप से लागू होते हैं।

🏛️ व्यावहारिक महत्व

✅ यह निर्णय धारा 401(2) CrPC / धारा 442 BNSS, 2023 से संबंधित मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह निर्णय पुनः स्थापित करता है कि—

> "Right of Hearing In Revision Is A Valuable Statutory Right."

> "शिकायत खारिज होने के बाद यदि पुनरीक्षण दायर किया जाता है, तो संभावित अभियुक्तों को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।"

> "बिना सुनवाई के शिकायत पुनर्जीवित करने वाला आदेश विधि की दृष्टि में टिकाऊ नहीं होगा।"

> "प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत Pre-Summoning Stage पर भी लागू होते हैं।"

⚠️ अस्वीकरण (Disclaimer): यह सारांश माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय M/s Prime Impex Ltd. & Ors. v. M/s P.E.C. Ltd. & Anr., Criminal Appeal No.480 of 2013, निर्णय दिनांक 18.03.2013, पर आधारित है। किसी भी न्यायिक कार्यवाही में इस निर्णय पर निर्भर होने से पूर्व मूल निर्णय का अध्ययन अवश्य किया जाना चाहिए।

13 hours ago | [YT] | 1

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पत्नी अपने पति पर 498A और घरेलू हिंसा का केस ठोकती है, खुद को अबला और पीड़ित बताकर कोर्ट से हर महीने ₹30,000 का मेंटेनेंस वसूलती है। और फिर? उसी पति की गाढ़ी कमाई के पैसों से ओयो होटल में अपने यार के साथ आशिकी फरमाते हुए रंगे हाथों दबोची जाती है।
आगरा की इस सनसनीखेज खबर ने पूरे देश के पतियों के कलेजे को कंपा कर रख दिया है।

जरा उस पति के दर्द की कल्पना कीजिए। वह शख्स हर महीने खून-पसीना एक करके ₹30,000 जुटाता होगा ताकि कोर्ट के आदेश की अवमानना न हो, पुलिस उसे उठा न ले जाए। वह भूखा सो जाता होगा, अपनी इच्छाएं मार देता होगा। उसे क्या पता था कि जिस पैसे को वह अपनी बर्बाद जिंदगी का टैक्स समझकर भर रहा है, उसी पैसे से उसकी पत्नी अपने प्रेमी के साथ अय्याशी के बिल चुका रही है!

यह सिर्फ एक धोखा नहीं है, यह एक सीधे-साधे पुरुष की आत्मा की हत्या है।

1. ये कानून सुरक्षा के लिए हैं या उगाही के लिए? महिलाओं की हिफाजत के लिए बने 498A और DV एक्ट जैसे सख्त कानून आज कुछ शातिर दिमागों के लिए 'फिक्स्ड डिपॉजिट' और 'मंथली सैलरी' का जरिया कैसे बन गए?
2. पुरुष के आंसुओं की कीमत क्या है? अगर पति की सैलरी कम हो तो कोर्ट उसे कमा कर लाने का हुक्म देता है, चाहे उसे मजदूरी ही क्यों न करनी पड़े। लेकिन जब पत्नी उस पैसे का ऐसा घिनौना इस्तेमाल करे, तो क्या उस पुरुष को उसकी मानसिक प्रताड़ना और सामाजिक बदनामी का हर्जाना मिलेगा?

ऐसी ही कुछ चंद औरतें पूरे समाज को गंदा करती हैं। इनकी वजह से उन असली पीड़ित महिलाओं पर भी कोई भरोसा नहीं करता जो सच में न्याय के लिए दर-दर भटक रही हैं। जब कानून का ऐसा सरेआम तमाशा बनता है, तो आम आदमी का सिस्टम से भरोसा उठ जाता है।

भारतीय कानून (BNSS / CRPC 125(4)) साफ कहता है कि अगर पत्नी व्यभिचार (Adultery) में है, तो वह एक ढेला भी पाने की हकदार नहीं है। उम्मीद है अदालत इस मामले में सिर्फ मेंटेनेंस बंद नहीं करेगी, बल्कि इस ब्लैकमेलिंग के खेल पर ऐसी सख्त मिसाल कायम करेगी कि दोबारा कोई कानून को अपनी अय्याशी का जरिया बनाने की हिम्मत न करे।

दहेज और घरेलू हिंसा के नाम पर पुरुषों का यह लीगल मर्डर अब बंद होना चाहिए!

आपकी इस घिनौने खेल पर क्या राय है? क्या ऐसे झूठे केस करने वालों को सीधे जेल नहीं होनी चाहिए? नीचे कमेंट में अपनी बेबाक राय दर्ज करें।

#AgraNews #MenToo #498AMisuse #FalseCases #LegalSystem #CrimeUpdate #nonfollowers

18 hours ago | [YT] | 7

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6 days ago | [YT] | 18

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भगोड़े की तलाश के नाम पर रिश्तेदारों को प्रताड़ित करना असंवैधानिक: हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भगोड़े अपराधी को पकड़ने के उद्देश्य से उसके परिजनों को परेशान करना संवैधानिक ढांचे के विपरीत है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि अपराधियों की तलाश के लिए उनके रिश्तेदारों को थाने बुलाकर मानसिक दबाव बनाना औपनिवेशिक युग की कार्यपद्धति है, जिसका आधुनिक विधिक व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है।

यह आदेश कानपुर नगर निवासी सेवानिवृत्त कैप्टन मंगल सिंह की याचिका पर पारित किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके पुत्र संदीप तोमर को पंजाब में एक हत्या के मामले में दोषी करार दिया गया था, जिसके पश्चात वह सजा की घोषणा के बाद से फरार चल रहा है। याचिकाकर्ता का कहना था कि पंजाब पुलिस की सूचना के आधार पर कानपुर पुलिस बार-बार उनके आवास पर छापेमारी कर रही है तथा उन्हें पुलिस चौकी एवं थाने बुलाकर बार-बार पूछताछ के नाम पर प्रताड़ित कर रही है।

न्यायालय ने दोनों पक्षों को सुनने के पश्चात कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में जब पुलिस विभाग के पास किसी फरार व्यक्ति का पता लगाने हेतु उन्नत तकनीकी संसाधन उपलब्ध हैं, ऐसी स्थिति में परिजनों को बार-बार तलब कर उत्पीड़ित करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। न्यायालय ने इसे संविधान की भावना के प्रतिकूल बताते हुए पुलिस को याचिकाकर्ता के आवास पर दबिश देने अथवा उन्हें किसी प्रकार से परेशान करने पर रोक लगा दी।

यह निर्णय विवेचना प्रक्रिया में नागरिकों की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

1 week ago | [YT] | 3

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1 month ago | [YT] | 1

Legal Helpdesk

1 month ago | [YT] | 22

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अगर किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की किसी टिप्पणी से बेरोजगार युवाओं, मीडिया, RTI एक्टिविस्ट या वकीलों को अपमानित महसूस होता है, तो लोकतंत्र में उस पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार है। लेकिन किसी भी बयान को उसके पूरे संदर्भ और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर समझना ज़रूरी होता है।
किसी भी राजनीतिक दल या सरकार पर यह आरोप लगाना कि वह “बेरोजगार युवाओं को कुचलना चाहती है”, एक गंभीर राजनीतिक निष्कर्ष है, जिसे तथ्यों, नीतियों और घटनाओं के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।
भारत में बेरोजगार युवा, वकील, पत्रकार और RTI एक्टिविस्ट लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।
उनकी आवाज़ उठाना, विरोध करना, सवाल पूछना और न्याय मांगना संवैधानिक अधिकार है।
उन्हें “कीड़े-मकोड़े” या “कॉकरोच” जैसे शब्दों से संबोधित करना यदि हुआ है, तो स्वाभाविक रूप से लोगों में आक्रोश पैदा हो सकता है।
जहाँ तक कॉलेजियम सिस्टम का सवाल है —
कॉलेजियम व्यवस्था वह प्रक्रिया है जिसके तहत उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति की सिफारिश वरिष्ठ जज करते हैं। इस सिस्टम को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है। कुछ लोग इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए जरूरी मानते हैं, जबकि कुछ लोग इसमें पारदर्शिता की कमी बताते हैं।
लोकतंत्र में किसी भी संस्था — चाहे सरकार हो, न्यायपालिका हो या मीडिया — पर सवाल उठाना गलत नहीं है, लेकिन भाषा और आरोप तथ्यात्मक और संयमित होने चाहिए ताकि बहस मजबूत बने, सिर्फ टकराव नहीं।

1 month ago | [YT] | 40

Legal Helpdesk

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1 month ago (edited) | [YT] | 12