श्रीभगवान् बोले - इस समत्वरूप बुद्धि योग से सकाम कर्म अत्यंत ही निम्न श्रेणी का है। इसलिये हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ़ अर्थात् बुद्धि योग का ही आश्रय ग्रहण कर; क्योंकि फल के हेतु बननेवाले अत्यंत दीन हैं।
श्रीभगवान् बोले - हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर समत्व ही योग कहलाता है।
श्रीभगवान् बोले - तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिये तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
श्रीभगवान् बोले - सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्त्व से जाननेवाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है।
श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करनेवाले हैं; इसलिये। तू उन भोंगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित, योगक्षेम को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्त:करण वाला हो।
श्रीभगवान् बोले - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करते हैं जो कि जन्म रूप कर्मफल देनेवाली एंव भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं का वर्णन करनेवाले है , उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है , जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यंत आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती।
NamaJape
श्रीभगवान् बोले - इस समत्वरूप बुद्धि योग से सकाम कर्म अत्यंत ही निम्न श्रेणी का है। इसलिये हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ़ अर्थात् बुद्धि योग का ही आश्रय ग्रहण कर; क्योंकि फल के हेतु बननेवाले अत्यंत दीन हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 49)
4 hours ago | [YT] | 3
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NamaJape
श्रीभगवान् बोले - हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर समत्व ही योग कहलाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 48)
1 day ago | [YT] | 6
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NamaJape
श्रीभगवान् बोले - तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिये तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 47)
2 days ago | [YT] | 7
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श्रीभगवान् बोले - सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्त्व से जाननेवाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 46)
3 days ago | [YT] | 8
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श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करनेवाले हैं; इसलिये। तू उन भोंगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित, योगक्षेम को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्त:करण वाला हो।
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 45)
4 days ago | [YT] | 6
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श्रीभगवान् बोले - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करते हैं जो कि जन्म रूप कर्मफल देनेवाली एंव भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं का वर्णन करनेवाले है , उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है , जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यंत आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती।
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 44)
5 days ago | [YT] | 7
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NamaJape
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 43)
6 days ago | [YT] | 253
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NamaJape
श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 42)
1 week ago | [YT] | 7
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NamaJape
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 41)
1 week ago | [YT] | 192
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NamaJape
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 40)
1 week ago | [YT] | 175
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