ଝାରର୍ ମଲି ଝାରେ ଫୁଟିକରି ଝଡ଼ି ଯାଏସି। କିହେ ପାଇ ନାଇଁ ପାରନ୍ ତାର୍ ମହକନ୍। ହେଲେ ଫୁଟ୍‌ବାର୍‌ଟା ଆର୍ ମହକିବାର୍‌ଟା ତାର୍ ଧରମ୍ ଆଏ । ହେନ୍ତା ଇ ଦୁନିଆଁ ଭିତ୍‌ରେ କେତ୍‌ନିଟେ ଲୋକ୍ ଅଛନ୍, ଯେନ୍‌ମାନ୍‌କର୍ ପାଖେ କିଛି ନା କିଛି ପ୍ରତିଭା ଅଛେ। ହେଲେ ଦୁନିଆଁକେ ଜନେଇ ହେବାର୍ ଲାଗିର୍ ତାକର୍ ପାଖେ ସୁଯୋଗ୍ ଆର୍ ସୁବିଧା ନାଇଁ ଥାଏ। ଯେନ୍‌ଥିର୍ ଲାଗି ସେମାନେ ଆଗ୍‌କେ ବଢ଼ି ନାଇଁ ପାରନ୍‌ । ହେନ୍ତା ପ୍ରତିଭା ମାନ୍‌କୁ ଖୁଜିନୁରି କରି ଦୁନିଆଁ ସାମ୍‌ନାକେ ଆନ୍‌ବାର୍‌ କାଯେ *ଉଜାଲାସମିଆଁ* ର ଲକ୍ଷ୍ୟ ଆଏ।

@ujalasamiya


Ujala Samiya

ମନ୍ଦିର କଳାର ସ୍ପର୍ଶ ଦେଇ ଦେବଦେବୀଙ୍କ ସୁନ୍ଦର ରୂପକୁ ଜୀବନ୍ତ କରୁଥିବା ମହାନ ମନ୍ଦିର ଶିଳ୍ପୀ ଓ ପ୍ରଚ୍ଛଦପଟ୍ଟ କଳାକାର #Murali_Biswal ଙ୍କୁ #ଉଜାଲା_ସମିୟା ତରଫରୁ ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭକାମନା । ତାଙ୍କର ଅପାର ପରିଶ୍ରମ, ନିଷ୍ଠା ଓ ଅଦ୍ଭୁତ କଳାଦକ୍ଷତା ହଜାର ହଜାର ମନ୍ଦିର ଶିଳ୍ପକଳାକୁ ଅଧିକ ସୁନ୍ଦର, ଆକର୍ଷଣୀୟ ଓ ଜୀବନ୍ତ କରୁଛି। ଭାରତୀୟ ସଂସ୍କୃତି ଓ ପରମ୍ପରାକୁ ସୁନ୍ଦର ଶିଳ୍ପରେ ପ୍ରକାଶ କରି ସମାଜକୁ ଗର୍ବିତ କରୁଥିବା ମୂରଳି ବିଶ୍ବାଲ, ନଅଗାଁ (ଖ) ରେ ଜନ୍ମ।

Ujala Samiya

2 months ago | [YT] | 5

Ujala Samiya

⚜️⚜️रोग के अनुसार आसन⚜️⚜️
🌼⚜️आसनोपयोगी नियम⚜️🌼

3 months ago | [YT] | 2

Ujala Samiya

⚜️⚜️रोग के अनुसार आसन⚜️⚜️
🌼⚜️आसनोपयोगी नियम⚜️🌼
1.समय ⚜️ आसन प्रातः सायं दोनों समय कर सकते हैं। यदि दोनों समय नहीं कर सकते, तो प्रातः काल का समय उत्तम है। प्रातःकाल मन शान्त रहता है। प्रातः शौचादि से निवृत्त होकर खाली पेट तथा दोपहर के भोजन के लगभग 4 घण्टे बाद सायंकाल आसन कर सकते हैं। आसन करने से पहले शौच आदि से निवृत्त होना चाहिए। यदि कब्ज रहता है तो प्रातः काल ताँबे या चाँदी के बर्तन में रखे हुए पानी को पीना चाहिए। उसके पश्चात् थोड़ा भ्रमण करें। इससे पेट साफ हो जाता है। अधिक कब्ज हो, तो त्रिफला चूर्ण सोते समय गर्म पानी से लें। प्रातःकालीन उठकर पतंजलि आंवला एवं एलोवेरा जूस 4-4 चम्मच गर्म पानी में पीने से कब्ज, गैस, पाचन तन्त्र के रोग नेत्ररोग, धातुरोग दूर होते हैं तथा इम्युनिटी बढ़ती है।

2. स्थान ⚜️ स्वच्छ, शान्त एवं एकान्त स्थान आसनों के लिए उत्तम है। यदि वृक्षों की हरियाली के समीप, बाग, तालाब या नदी का किनारा हो, तो सर्वोत्तम है। खुले वातावरण एवं वृक्षों के नजदीक ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में होती है, जो स्वास्थ्य के लिए उत्तम है। यदि घर में आसन प्राणायाम करें, तो घी का दीपक या गुग्गुलु आदि जलाकर उस स्थान को सुगन्धित करना चाहिए। योगासन व प्राणायाम के लिए स्वच्छ वायु युक्त, हवादार स्थान सर्वोत्तम होता है। (अधिक सर्दी के समय अपनी सहनशक्ति के अनुसार कमरे के न्यूनतम तापमान पर अभ्यास कर सकते हैं।

3. वेशभूषा ⚜️ आसन करते समय शरीर पर वस्त्र कम और सुविधाजनक होने चाहिए। पुरुष हाफ पैण्ट और बनियान का उपयोग कर सकते है। माताएँ और बहनें सलवार-कुर्ता व ट्रैकसूट आदि पहनकर आसन, प्राणायाम आदि का अभ्यास करें।

4. योगाभ्यास एवं मात्रा ⚜️ भूमि पर बिछाने के लिए मुलायम दरी या कम्बल का प्रयोग करना उचित है। खुली जमीन पर आसन न करें। अपने सामर्थ्य के अनुसार व्यायाम करना चाहिए। आसनों का पूर्ण अभ्यास एक घण्टे में, मध्यम अभ्यास 30 मिनट में तथा संक्षिप्त अभ्यास 15 मिनट में होता है। आधा घण्टा तो प्रत्येक व्यक्ति को योगासन करना ही चाहिए। तथा 30 से 45 मिनट कम से कम प्राणायाम और अन्त में 5 मिनट का ध्यान व थोड़ी देर के शवासन के साथ प्रतिदिन के योगाभ्यास समापन करना चाहिए।

5. आयु ⚜️ मन एकाग्र कर प्रसन्नता एवं उत्साह के साथ अपनी आयु, शारीरिक शक्ति और क्षमता का पूरा ध्यान रखते हुए यथाशक्ति अभ्यास करना चाहिए। तभी वह योग से वास्तविक लाभ उठा सकेगा। वृद्ध एवं दुर्बल व्यक्तियों को आसन एवं प्राणायाम अल्प मात्रा में करने चाहिए। 3 वर्ष की आयु से प्राणायाम व सूक्ष्म व्यायाम का अभ्यास प्रारम्भ करके प्रत्येक आयु वर्ग के सभी स्त्री पुरुष अपने सामर्थ्य के अनुसार योगाभ्यास अवश्य करें। योग को अपना स्वभाव बनाएं। दस वर्ष से अधिक आयु के बालक सभी यौगिक अभ्यास कर सकते हैं। गर्भवती महिलाएँ कठिन आसनादि न करें। वे केवल शनैः शनै दीर्घ श्वसन, भस्त्रिका, अनुलोम-विलोम, भ्रामर, प्रणव-नाद एवं गायत्री आदि पवित्र मन्त्रों द्वारा ध्यान करें।

6. अवस्था एवं सावधानियाँ ⚜️ सभी अवस्थाओं में आसन एवं प्राणायाम किये जा सकते हैं। इन क्रियाओं से स्वस्थ व्यक्ति का स्वास्थ्य उत्तम बनता है। वह रोगी नहीं होता और रोगी व्यक्ति स्वस्थ होता है। परन्तु फिर भी कुछ ऐसे आसन हैं। जिनको रोगी व्यक्ति को नहीं करना चाहिए, यथा जिनके कान बहते हों, नेत्रों में लाली हो, स्नायु एवं हृदय दुर्बल हो, उनको शीर्षासन नहीं करना चाहिए। हृदय दौर्बल्यवाले को अधिक भारी आसन जैसे पूर्ण शलभासन, धनुरासन आदि नहीं करना चाहिए। अण्डवृद्धिवालों को भी वे आसन नहीं करने चाहिए जिनसे नाभि के नीचे वाले हिस्से पर अधिक दबाव पड़ता है। उच्च रक्तचापवाले रोगियों को सिर के बल किये जाने वाले शीर्षासन आदि तथा महिलाओं को ऋतुकाल में 4-5 दिन आसनों का अभ्यास नहीं करना चाहिए। इन दिनों महिलायें सूक्ष्म व्यायाम, ध्यान आदि अवश्य करें। जिनको कमर और गर्दन में दर्द रहता हो, वे आगे झुकने वाले आसन न करें। सभी यौगिक क्रियाओं का अभ्यास विधि व समयबद्ध रूप से मध्यम गति व शारीरिक क्षमतानुसार करना चाहिए, अत्यधिक जोर नहीं लगाना चाहिए। डिस्क संबंधी समस्या में एवं कमर व पीठ के दर्द की स्थिति में आगे झुकने वाले आसनों का अभ्यास नहीं करना चाहिए। हार्निया, पेट की सर्जरी/ चोट के पश्चात् तीव्र हृदयरोग व अन्य अल्सर आदि जीर्ण रोगों से ग्रसित व्यक्तियों को पीछे झुकने वाले या पेट में खिंचाव या दबाव पैदा करने वाले अभ्यासों को नहीं करना चाहिए।

7. भोजन ⚜️ भोजन योगाभ्यास के लगभग आधे घण्टे स्नानकर आहार ले सकते हैं। भोजन में सात्त्विक पदार्थ हों। तले हुए गरिष्ठ पदार्थों के सेवन से जठर विकृत हो जाता है। आसन के बाद चाय नहीं पीनी चाहिए। एक बार चाय पीने से यकृत् आदि कोमल ग्रन्थियों के लगभग 50 सेल्स निष्क्रिय हो जाते हैं। इससे आप स्वयं अनुमान कर सकते हैं कि चाय से कितनी हानि है। यह भी स्वास्थ्य की एक भयंकर शत्रु है, जो शरीर रूपी पावन मन्दिर को विकृत कर देती है। इसमें एक प्रकार का नशा होता है, निरन्तर लेने से व्यक्ति इसका अभ्यस्त (आदी) हो जाता है। जठराग्नि को मन्द करने एवं अम्लपित्त, गैसे कब्जादि रोगों को उत्पन्न करने में चाय का सबसे अधिक योगदान होता है। यकृत् को विकृत करने में भी चाय और अंग्रेजी दवा दोनों की हानिकारक भूमिका होती है। शाकाहार, सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार ही उत्तम स्वास्थ्य के लिए सर्वाधिक उपयोगी होता है।

8. श्वास-प्रश्वास का नियम ⚜️ आसन करते समय सामान्य नियम है कि आगे की ओर झुकते समय श्वास बाहर निकालते हैं तथा पीछे की ओर झुकते समय श्वास भरकर रखते हैं। श्वास नासिका से ही लेना और छोड़ना चाहिए, मुख से नहीं; क्योंकि नाक से लिया हुआ श्वास फिल्टर होकर अन्दर जाता है। तथा स्वर-तन्त्र का सन्तुलन बना रहता है। किसी एक आसन में जब लम्बे समय तक स्थिर होते हैं तो श्वासों की गति सामान्य हो जाती है। सूक्ष्म व्यायाम व व्यायाम के समय लम्बे श्वासों का अभ्यास करना चाहिए।

9. दृष्टि ⚜️ आँखे बन्दर करके योगासन करने से मन की एकाग्रता बढ़ती है, जिससे मानसिक तनाव एवं चंचलता दूर होती है। सामान्यतः आसन एवं प्राणायाम आँखें खोलकर भी कर सकते हैं।

10. क्रम ⚜️ कुछ आसन एक पार्श्व करने होते हैं। यदि कोई आसन दायीं करवट करें तो उसे बायीं करवट भी करें। इसके अतिरिक्त आसनों का एक ऐसा क्रम निश्चित कर लें कि प्रत्येक अनुवर्ती आसन से विघटित दिशा में भी पेशियों और सन्धियों का व्यायाम हो जाये। उदाहरणतः शीर्षासन के उपरान्त ताड़ासन, सर्वांगासन के उपरान्त मत्स्यासन, मण्डूकासन के उपरान्त उष्ट्रासन, वज्रासन के उपरान्त सुप्तवज्रासन, मयूरासन के उपरान्त उष्ट्रासन, उत्तानपादासन के उपरान्त पवनमुक्तासन, चक्रासन के उपरान्त पश्चिमोत्तानासन, पश्चिमोत्तानासन के उपरान्त धनुरासन किया जाये। नवाभ्यासी शुरू में 2-4 मांसपेशियों और सन्धियों में पीड़ा अनुभव करेंगे। अभ्यास जारी रखें। पीड़ा स्वत शांत हो जायेगी। जैसी जिसको अनुकूलता हो, तद्नुसार लेटकर किये जाने वाले आसन एवं प्राणायाम को ध्यान से पहले भी कर सकते हैं तथा बाद में भी। शीतकाल में पहले थोड़ा व्यायाम व आसन करने से अनुकूलता रहती है तथा गर्मी की ऋतु में प्राणायाम व ध्यान करने से पहले मन की प्रसन्नता व आनन्द अधिक रहता है। लेटी अवस्था में किये गये आसनों के बाद जब भी उठा जाए बायीं करवट लेकर उठना चाहिए। योगाभ्यास के अन्त में शवासन 3-5 मिनट के लिए अवश्य करें, ताकि अंग प्रत्यंग शिथिल हो जायें।

11. विश्राम ⚜️ आसन करते हुए जब-जब थकान हो, तब-तब शवासन या मकरासन में विश्राम करना चाहिए। थक जाने पर बीच में भी विश्राम कर सकते हैं।

12. गुरु ⚜️ गुरूपदिष्टमार्गेण योगमेव समभ्यसेत्। योग की सिद्ध गुरुकृपा और गुरु-उपदिष्ट मार्ग से ही होती है। इसलिए योगासन, प्राणायाम, ध्यान आदि का अभ्यास प्रारम्भ में गुरु के सान्निध्य में ही करना चाहिए।

13. यम-नियम ⚜️ योगाभ्यासियों को यम-नियम का पालन पूरी शक्ति के साथ करना चाहिए। बिना यम-नियमों के पालन के बिना कोई भी व्यक्ति योगी नहीं हो सकता।

14. शरीर का तापमान ⚜️ शरीर का तापमान अधिक उष्ण होने या ज्वर होने की स्थिति में योगाभ्यास करने से तापमान बढ़ जाये तो चन्द्रस्वर यानी बाई नासिका से श्वास अन्दर खींचकर (पूरक कर), सूर्य-स्वर, यानी दायीं नासिका से रेचक (श्वास बाहर निकालना) करने की विधि बार-बार करके तापमान सामान्य कर लेना चाहिए।

15. पेट की सफाई ⚜️ पेट की ठीक से सफाई न होती हो, कब्ज और अपच की शिकायत रहती हो तो कुछ दिन प्रारम्भ में कोई सौम्य रेचक हरड़ या त्रिफलादि चूर्ण रात को सोते समय ले लें। अन्यथा पेट साफ न होने की स्थिति में आँख, मुख, सिर में एवं स्नायु-मण्डल में कमजोरी होने की शिकायत हो सकती है। अतः पेट का साफ होना, कब्ज-रहित होना अपच न होना, रात को समय से सोकर पूरी नींद लेना और उचित आहार-विहार करना बहुत ही आवश्यक है।

16. कठिन आसन ⚜️ जिन व्यक्तियों का कभी अस्थिभंग हुआ हो, वे कठिन आसनों का अभ्यास कभी नहीं करें, अन्यथा उसी स्थान पर हड्डी दोबार टूट सकती है। वृद्धावस्था व किसी बड़े ऑपरेशन के बाद भी कठिन आसन न करें।

3 months ago | [YT] | 0

Ujala Samiya

🌀 ଆୟୁର୍ବେଦ: ଯେତେବେଳେ ‘ତ୍ରିଦୋଷ’ (ବାତ, ପିତ୍ତ, କଫ) ଏକାସାଥି ଅସନ୍ତୁଳିତ ହୋଇଯାଏ, ତେବେ କଣ କରିବେ?
ଆୟୁର୍ବେଦ ଅନୁସାରେ ସବୁଠାରୁ ଚ୍ୟାଲେଞ୍ଜିଙ୍ଗ୍ ପରିସ୍ଥିତି ହେଉଛି, ଯେତେବେଳେ ଶରୀରର ତିନୋଟି ମୂଳ ସ୍ତମ୍ଭ—ବାତ, ପିତ୍ତ ଓ କଫ—ଏକାସାଥି ଅସନ୍ତୁଳିତ ହୋଇଯାଏ। ଏହାକୁ ‘ସନ୍ନିପାତ’ କୁହାଯାଏ।
ଅନେକ ସମୟ ଗୋଟିଏ ଦୋଷକୁ ଠିକ୍ କରିବା ଚେଷ୍ଟାରେ ଆମେ ଅନ୍ୟ ଦୋଷକୁ ଆଉ ଅଧିକ ବିଗାଡ଼ିଦେଉ।
ଆଜି ଆମେ ସେହି ୫ଟି ବୈଜ୍ଞାନିକ ଆୟୁର୍ବେଦିକ ସିଦ୍ଧାନ୍ତ ବିଷୟରେ କଥା ହେବୁ, ଯାହା ଶରୀରକୁ ପୁଣିଥରେ ସଠିକ୍ ରାସ୍ତାରେ ଆଣିପାରେ।
⚠️ ସମସ୍ୟାର ମୂଳ କାରଣ: ଦୁର୍ବଳ ଜଠରାଗ୍ନି
ତ୍ରିଦୋଷ ବିଗଡ଼ିବାର ମୁଖ୍ୟ କାରଣ ଔଷଧର ଅଭାବ ନୁହେଁ, ବରଂ ଜଠରାଗ୍ନି (Digestive Fire) ମନ୍ଦ ହୋଇଯିବା।
ଯେତେବେଳେ ଅଗ୍ନି ଦୁର୍ବଳ ହୁଏ, ଶରୀରରେ ‘ଆମ’ (ବିଷାକ୍ତ ତତ୍ତ୍ୱ) ସଂଚୟ ହୁଏ, ଯାହା ରୋଗର ଚେନ୍ ରିଆକ୍ସନ୍ ଆରମ୍ଭ କରେ।
ସିଦ୍ଧାନ୍ତ: ଚିକିତ୍ସା ସବୁବେଳେ ଅଗ୍ନି ସୁଧାରଣରୁ ଆରମ୍ଭ ହେବା ଉଚିତ, ଔଷଧରୁ ନୁହେଁ।
🛠️ ରିକଭରିର ୩ଟି ମୁଖ୍ୟ ପର୍ଯ୍ୟାୟ
1️⃣ ଲଂଘନ (Detoxification)
ଶରୀରକୁ ନିଜେ ନିଜକୁ ସଫା କରିବାର ସୁଯୋଗ ଦିଅନ୍ତୁ।
୩ ଦିନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କେବଳ ଗୁନଗୁନା ପାଣି ଏବଂ ମୁଗ ଡାଲିର ପତଳା ଖିଚୁଡ଼ି ନିଅନ୍ତୁ।
ଏହା ଶରୀର ପାଇଁ ‘ଫ୍ୟାକ୍ଟରୀ ରିସେଟ୍’ ଭଳି କାମ କରେ।
2️⃣ ବାତକୁ ଶାନ୍ତ କରିବା (ସବୁଠାରୁ ପ୍ରଥମେ)
“ବାୟୁନା ବିନା ଦୋଷାଣାଂ ଗତିର୍ନାସ୍ତି” —
ଅର୍ଥାତ୍ ବାତ ଛଡ଼ା ପିତ୍ତ ଓ କଫ ମଧ୍ୟ ଚଳନ କରିପାରେ ନାହିଁ।
ଉପାୟ: ତିଳ ତେଲରେ ହାଲୁକା ମାଲିଶ।
ଏହା ଶୁଷ୍କତା କମାଇ ନର୍ଭସ୍ ସିଷ୍ଟମ୍‌କୁ ଶାନ୍ତ କରେ।
3️⃣ ପିତ୍ତ ଓ କଫର ପରିଚାଳନା
ପିତ୍ତ ପାଇଁ ଘିଅ: ଦେଶୀ ଘିଅ ପିତ୍ତର ତାପକୁ ଶାନ୍ତ କରେ, କିନ୍ତୁ ପାଚନ ଅଗ୍ନିକୁ କମାଏ ନାହିଁ।
କଫ ପାଇଁ ମଧୁ ଓ ଗତି: କାଚା ମଧୁ କଫକୁ କାଟେ ଏବଂ ହାଲୁକା ବ୍ୟାୟାମ ଶରୀରର ଜଡତାକୁ ଦୂର କରେ।
🥣 ତ୍ରିଦୋଷ-ନାଶକ ଆହାର: ଆପଣଙ୍କ ଥାଲିରେ କଣ ରହିବା ଉଚିତ?
ତିନୋଟି ଦୋଷ ବିଗଡ଼ିଥିବା ସମୟରେ ଆହାର ନ ଅତ୍ୟଧିକ ଠଣ୍ଡା, ନ ଅତ୍ୟଧିକ ଗରମ ହେବା ଉଚିତ। ଏହାକୁ ‘ସାଧାରଣ ଆହାର’ କୁହାଯାଏ।
1️⃣ ଧାନ୍ୟ (ହାଲୁକା ଓ ସୁପାଚ୍ୟ)
ଭାରୀ ଗହୁଁ ରୁଟି କମ୍ କରନ୍ତୁ।
ପୁରୁଣା ଚାଉଳ, ଯବ ଓ ମୁଗ ଡାଲି ନିଅନ୍ତୁ।
👉 ମୁଗ ଡାଲି ହେଉଛି ଏକମାତ୍ର ଡାଲି, ଯାହା ବାତ–ପିତ୍ତ–କଫ ତିନୋଟିକୁ ସମତୁଳିତ କରେ।
2️⃣ ଶାକସବ୍ଜି (ସବୁବେଳେ ପକାଇ)
କାଚା ପିଆଜ ଓ ସାଲାଦ୍ ଏବେ ବନ୍ଦ କରନ୍ତୁ—ଏହା ବାତ ବଢ଼ାଏ।
ଲାଉ, ତୋରେଇ, କୁମ୍ହଡ଼ା, ପଟଳ ପକାଇ ଖାଆନ୍ତୁ—ଏଗୁଡ଼ିକ ହାଲୁକା ଓ ସହଜ ପାଚ୍ୟ।
3️⃣ ଫଳ (ସମସ୍ତ ଫଳ ଠିକ୍ ନୁହେଁ)
ଅତି ଖଟା କିମ୍ବା ଅତି ମିଠା ଫଳ ଏଡ଼ାନ୍ତୁ।
ସବୁଠାରୁ ସୁରକ୍ଷିତ ଫଳ—ଡାଳିମ୍ବ (ଅନାର) ଓ ପପିତା।
4️⃣ ମସଲା (ପାଚନର ମିତ୍ର)
ଲାଲ ଲଙ୍କା ବନ୍ଦ କରନ୍ତୁ।
ଜିରା, ଧନିଆ ଓ ସଉଁଫ ବ୍ୟବହାର କରନ୍ତୁ—ଏଗୁଡ଼ିକ ପିତ୍ତ ବଢ଼ାଇନଥାଇ ପାଚନ ଶକ୍ତି ବଢ଼ାଏ।
5️⃣ ରନ୍ଧନ ତେଲ (ଦେଶୀ ଘିଅ କାହିଁକି?)
ରିଫାଇନ୍ ତେଲ ଛାଡ଼ନ୍ତୁ।
ଶୁଦ୍ଧ ଦେଶୀ ଘିଅ ବାତକୁ ସ୍ନିଗ୍ଧତା ଦିଏ, ପିତ୍ତକୁ ଶାନ୍ତ କରେ ଓ କଫକୁ ଜମିବାକୁ ଦେଉନାହିଁ।
🌿 ତିନୋଟି ଜାଦୁଇ ଔଷଧ (Tri-Dosha Balancing Herbs)
ଆଁବଳା: ପିତ୍ତକୁ ଠଣ୍ଡା, ବାତକୁ ଶାନ୍ତ ଓ କଫକୁ ଶୁଷ୍କ କରେ।
ଗିଲୋୟ: ‘ତ୍ରିଦୋଷ ଶାମକ’ ଭାବେ ପରିଚିତ; ରକ୍ତ ସଫା କରି ଶରୀରରେ ସମତୁଳନ ଆଣେ।
ତ୍ରିଫଳା:
ବାତ ଓ ପିତ୍ତ ପାଇଁ—ରାତିରେ ଗୁନଗୁନା ପାଣି ସହ।
କଫ ପାଇଁ—ମଧୁ ସହ।
🚫 ସାବଧାନ: ଏହି ଭୁଲଗୁଡ଼ିକୁ ଏଡ଼ାନ୍ତୁ (ବିରୁଦ୍ଧ ଆହାର)
ଦୁଧ ସହ ନମକ କିମ୍ବା ଖଟା ଫଳ ନ ନିଅନ୍ତୁ।
ରାତିରେ ଦହି ସେବନ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ।
ବରଫ ଥଣ୍ଡା ପାଣି—ତୁରନ୍ତ ବନ୍ଦ କରନ୍ତୁ; ଏହା ବାତ ଓ କଫର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ଶତ୍ରୁ।
🕒 ଜୀବନଶୈଳୀର ସୁବର୍ଣ୍ଣ ନିୟମ
ନିଦ୍ରା: ରାତି ୧୦ଟା ପୂର୍ବରୁ ଶୋଇଯାଆନ୍ତୁ।
ପ୍ରାଣାୟାମ: ୧୫ ମିନିଟ୍ ଅନୁଲୋମ–ବିଲୋମ।
ବ୍ରହ୍ମ ମୁହୂର୍ତ୍ତ: ସୂର୍ଯ୍ୟୋଦୟ ପୂର୍ବରୁ ଉଠିବାର ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତୁ।
ନିଷ୍କର୍ଷ
ତ୍ରିଦୋଷର ଚିକିତ୍ସା ଧୈର୍ୟ ଚାହିଁ। ସଠିକ୍ ଦିଗରେ କରାଯାଇଥିବା ଛୋଟ ଛୋଟ ପରିବର୍ତ୍ତନ ମଧ୍ୟ ଶରୀରକୁ ଦୀର୍ଘକାଳୀନ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ଦେଇପାରେ।

3 months ago | [YT] | 1

Ujala Samiya

*👉ଦଶଟି ପ୍ରାଚୀନ ଭାରତୀୟ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ସୂତ୍ର🚩*

*୧. ଅଜୀର୍ଣ୍ଣେ ଭୋଜନଂ ବିଷମ୍ --*
*ଅଜୀର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଥିବା ବେଳେ ଖାଦ୍ୟ ଖାଇବା ବିଷ ସମାନ କାର୍ଯ୍ୟ କରେ। ଯେତେବେଳେ ପୂର୍ବ ଭୋଜନ ପାଚନ ହୋଇନାହିଁ, ସେତେବେଳେ ନୂତନ ଭୋଜନ ଗ୍ରହଣ କଲେ ଶରୀରରେ ବିଷ ତୁଲ୍ୟ ପ୍ରଭାବ ପଡେ।*

*୨. ଅର୍ଧରୋଗ ହରୀ ନିଦ୍ରା -- ସୁନିଦ୍ରା ଅଧା ରୋଗକୁ ହରଣ କରିଦିଏ। ଶରୀର ସ୍ବସ୍ଥ ଓ ମନ ପ୍ରସନ୍ନ ରଖିବା ପାଇଁ ସୁନିଦ୍ରା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆବଶ୍ୟକ। ସ୍ବସ୍ଥ ଶରୀର ଓ ପ୍ରସନ୍ନ ମନ ରୋଗ ଦୁରେଇ ରଖେ।*

*୩. ମୁଦ୍ଦାଳୀ ଗଦବ୍ୟାଳୀ --*
*ମୁଗ ଡାଲି ରୋଗକୁ ସେହିପରି ନାଶ କରେ, ଯେପରି ଗୋଖର ସାପ ମଣିଷକୁ ନାଶ କରେ। ଏହା ରୋଗନାଶକ ଗୁଣ ଥିବା ଏକ ଉତ୍ତମ ଆହାର।*

*୪. ଅତି ସର୍ବତ୍ର ବର୍ଜୟେତ୍ --*
*ଯେ କୌଣସି କାମ ଅତିରେକ କରାଯିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ଅତି ଭୋଜନ, ଅତି ନିଦ୍ରା, ଅତି କାର୍ଯ୍ଯ - ଏ ସବୁ ଅନର୍ଥ କାରକ।*

*୫. ନାସ୍ତି ମୂଳମନୌଷଧମ୍ --*
*ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗଛର ଅନେକ ଔଷଧୀୟ ଗୁଣ ଥାଏ। ପୃଥିବୀ ଉପରେ ଏମିତି କୌଣସି ଗଛ ନାହିଁ ଯାହା କୌଣସି ରୋଗର ଉପଚାର ପାଇଁ ଉପଯୋଗୀ ନୁହେଁ।*

*୬. ନ ବୈଦ୍ୟଃ ପ୍ରଭୁରାୟୁଷଃ--*
*ବୈଦ୍ୟ କେବଳ ରୋଗର ଉପଚାର କରିପାରେ, କିନ୍ତୁ ସେ ଜୀବନ ଦେଇପାରିବେ ନାହିଁ। ଆୟୁଷ୍ୟ ଭଗବାନଙ୍କ ହାତରେ ଅଛି।*

*୭. ଚିନ୍ତା ବ୍ୟାଧିପ୍ରକାଶାୟ --*
*ଅତ୍ୟଧିକ ଚିନ୍ତା ଶରୀର ଓ ମନରେ ରୋଗ ଉତ୍ପନ୍ନ କରେ। ଏଣୁ ଜୀବନ ରେ ଶାନ୍ତ ଓ ଧୈର୍ୟଧାରଣ କରିବା ଜରୁରୀ।*

*୮. ବ୍ୟାୟାମଶ୍ଚ ଶନୈଃ ଶନୈଃ --*
*ବ୍ୟାୟାମ କରିବା ସମୟରେ ଧୀରେ ଧୀରେ ଶରୀରକୁ ସୁହାଇବା ପରି ବଢ଼ାଇବା ଉଚିତ। ଅତି ତୀବ୍ର ବ୍ୟାୟାମ ଶରୀର ପାଇଁ ହାନିକାରକ ହୋଇପାରେ।*

*୯. ଅଜବତ୍ ଚର୍ବଣଂ କୁର୍ୟାତ୍ --*
*ଛେଳି ଯେପରି ଭଲଭାବରେ ଘାସ କୁ ଚୋବାଇ ପାକୁଳାଇ ଥାଏ, ସେହିପରି ଆମେ ମଧ୍ୟ ଖାଦ୍ୟକୁ ଭଲ ଭାବରେ ଚୋବାଇ ଖାଇବା ଉଚିତ। ଏହା ଜିର୍ଣ୍ଣ ଓ ପାଚନ ଶକ୍ତି ବଢ଼ାଏ।*

*୧୦. ସ୍ନାନଂ ନାମ ମନଃ ପ୍ରସାଧନକରଂ ଦୁଃସ୍ୱପ୍ନ- ବିଧ୍ୱଂସନମ୍ --*
*ସ୍ନାନ କେବଳ ଶରୀର ସ୍ବସ୍ଥ ରଖେନାହିଁ, ଏହା ମନକୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସନ୍ନ କରେ। ଏହା ଭୟାନକ ସ୍ବପ୍ନ କିମ୍ବା ମନୋବିକ୍ଷେପକୁ ମଧ୍ୟ ଦୂର କରିଥାଏ।*

11 months ago (edited) | [YT] | 0